उत्तराखंड के मंदिरों में ड्रेस कोड! देश में किन मंदिरों में था पहले से लागू

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उत्तराखंड में हरिद्वार, देहरादून और ऋषिकेश के मंदिरों में छोटे कपड़ों में मंदिर आने वाले भक्तों को प्रतिबंधित यानी बैन लगा दिया गया है, ये ऐलान किया है महानिर्वाणी पंचायती अखाड़ा ने... हालांकि सोशल मीडिया पर बीते काफी समय से मंदिरों में छोटे कपड़े पहन कर जाने के मुद्दे पर बहस छिड़ी हुई थी, जिसपर भांति भांति के लोगों की अपनी प्रक्रियाएं हैं। आज हम बात करेंगे कि क्यों बना ये नियम और इससे पहले देश के किन मंदिरों में ये   नियम लागू है।

उत्तराखंड के तीन मंदिरों में 'उपयुक्त कपड़े' ना पहनने वाले भक्तों को एंट्री नहीं मिलेगी। इनमें हरिद्वार में स्थित दक्ष प्रजापति मंदिर, देहरादून के टपकेश्वर महादेव मंदिर और ऋषिकेश के नीलकंठ महादेव मंदिर शामिल हैं। अखाड़ा परिषद के मुताबिक, मंदिरों में प्रवेश करने से पहले पुरुष-महिलाओं को अपना शरीर ढकना होगा। इसका पर्सेंटेज भी तय किया गया है। महानिर्वाणी पंचायती अखाड़ा की तरफ से कहा गया है कि मंदिर प्रवेश के लिए महिला और पुरुष अपना शरीर 80 फीसदी ढक कर पहुंचें। कम कपड़े पहनकर आने वालों को भगवान के दर्शन नहीं होंगे, क्योंकि उन्हें मंदिर में घुसने ही नहीं दिया जाएगा। बीते 4 जून को महानिर्वाणी अखाड़ा के सचिव,  हरिद्वार में कनखल दक्षेश्वर महादेव मंदिर के परमाध्यक्ष और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष स्वामी रवींद्र पुरी ने कहा कि 'यदि स्त्री-पुरुष मंदिरों में आ रहे हैं तो उनका 80 प्रतिशत शरीर ढका होना चाहिए। सभी को मर्यादा का ख्याल रखना चाहिए। केवल उन महिलाओं के इन मंदिरों में प्रवेश करने दिया जाएगा जिन्होंने अपने शरीर को 80 प्रतिशत तक ढका होगा।'

ऐसा पहली बार है जब उत्तर भारत के किसी मंदिर में इस तरह ड्रेस कोड लागू किया गया है, दक्षिण के कई मंदिरों में पहले से ये व्यवस्था लागू है। बात करें इस नियम के बनने को लेकर तो इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रवींद्र पुरी का कहना है कि दक्ष प्रजापति मंदिर भगवान शिव का ससुराल माना जाता है, यहां दुनिया भर से लोग आते हैं और सोमवार को मंदिर में भक्तों की भीड़ लगी होती है। आज के युवा, मंदिर में ऐसे कपड़े पहनकर आते हैं जो मंदिर की पवित्रता के प्रति उनके घोर अनादर को दर्शाते हैं। कभी-कभी मंदिरों में आने वाले लोग इतने कम कपड़े पहनते हैं कि उन्हें देखने में भी शर्म आती है। इस तरह के कपड़े भक्तों की धार्मिक भावनाओं को आहत करते हैं और वो अक्सर शिकायत दर्ज कराने के लिए मंदिर समिति के पास आते हैं। उन्हीं शिकायतों के निवारण के लिए नया नियम बनाया गया है. प्रतिबंध का उल्लंघन करने वालों से सख्ती से निपटा जाएगा।

आइए जानते हैं कि इससे पहले किन मंदिरों में इस तरह का नियम लागू है। दक्षिण भारत के कई मंदिरों में पहले से ये सिस्टम अप्लाई है जहां महिलाओं और पुरूषों के ड्रेस कोड तय हैं। 

महाबलेश्वर मंदिर : कर्नाटक के गोकर्ण जिले में स्थित ये शिवमंदिर दुनिया भर में प्रसिद्ध है, इसके कर्नाटक के सात मुक्तिस्थलों में से एक माना जाता है, यहां पर पुरुष सिर्फ धोती पहनकर जा सकते हैं, महिलाओं को यहां साड़ी और सलवार सूट पहनकर जाना होता है।

तिरुपति बालाजी : तिरुमाला में स्थित तिरुपति बालाजी मंदिर में भी कोई भी टीशर्ट या बरमूडा पहनकर दाखिल नहीं हो सकता। महिलाओं के लिए भी यहां साड़ी या सलवार सूट और पुरूषों के लिए पारंपरिक वस्त्र ही निर्धारित हैं।

गुरुवायुर कृष्ण मंदिर केरल में स्थित गुरुवायुर कृष्ण मंदिर में भी भक्तों के लिए ड्रेस कोड लागू है, यहां महिलाओं को पारंपरिक परिधान यानी साड़ी या सलवार सूट में जाना होता है, वहीं पुरुष धोती धारण करते हैं।

महाकाल मंदिर : मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित महाकाल मंदिर में दर्शन के लिए भारी तादाद में लोग पहुंचते हैं, यहां भी भक्तों के लिए ड्रेस कोड की व्यवस्था है, खास तौर से गर्भग्रह में जाने के लिए पुरुषों को धोती तथा महिलाओं के लिए साड़ी या सलवार सूट अनिवार्य है।

घृष्णेश्वर या घुश्मेश्वर महादेव मंदिर : घृष्णेश्वर महादेव मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद से 11 किमी दूर है, ये बारह ज्योतिर्लिंगों में शामिल है, कुछ लोग इसे घुश्मेश्वर महादेव के नाम से भी जानते हैं, यहां भी ड्रेस कोड का पालन कराया जाता है, महिलाएं यहां पर ट्रेडिशनल कपड़े पहनी हैं। पुरुषों को धोती धारण करनी होती हैं।

हालांकि शास्त्रों की मानें तो पूजा पाठ के लिए स्त्री और पुरुष सभी के लिए एक समान नियम होते हैं। इसलिए पूजा के दौरान स्त्री और पुरुष दोनों को ही सिर ढकना जरूरी हो जाता है, क्योंकि गरूण पुराण में लिखा है कि पूजन या किसी भी शुभ कार्य को करते समय सिर ढका हुआ हुआ होना चाहिए, क्योंकि इससे चंचल मन भटकता नहीं और पूरा ध्यान पूजा पर ही केंद्रित रहता है।

 

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