जैन मुनियों की महासमाधि : डोली में क्यों निकाली जाती है अंतिम यात्रा ?

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पिछले दिनों जैन धर्मगुरु आचार्य विद्यासागर जी महाराज ने महा समाधि ली और अपना देह त्याग दिया। आखिर क्या है जैन मुनियों की अंतिम साधना। जैन धर्म में इसके लेकर क्या बताया गया है?

 

न कोई बैंक अकाउंट खुलवाया और न ही कोई बनाया ट्रस्ट 

साल 1972 अपने गुरु आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज से दीक्षा लेने के बाद कठोर तपस्या की। घर-परिवार छोड़ दिया। मौसम कोई भी हो बिना बिस्तर के सख्त तख्त पर सोया करते। पैदल ही पूरे देश का भ्रमण किया। दिन भर में सिर्फ एक बार एक अंजुल पानी पीते। खाने में सीमित मात्रा में सादी दाल और रोटी लेते। नमक, चीनी, फल, तेल, हरी सब्जियां, दूध, दही, मेवे नहीं खाया। ताउम्र सांसारिक और भौतिक सुख छोड़ दिए। दान-दक्षिणा में किसी से पैसे नहीं लिए। न कोई बैंक अकाउंट खुलवाया और न ही कोई ट्रस्ट बनाया। ऐसा कहा जाता है कि इन्होंने पैसे को कभी हाथ तक नहीं लगाया। उनके नाम पर अगर कोई दान देता भी तो वो उसे समाज सेवा के लिए दे देते। ये अकेले ऐसे मुनि हैं, जिन्होंने पूरे भारत में करीब 350 से ज्यादा लोगों को दीक्षा दी। कई भाषाओं में पारंगत, हिन्दी-संस्कृत में कई धार्मिक किताबें लिखे।

क्या है जैन मुनियों की अंतिम साधना 

ये जैन धर्मगुरु आचार्य विद्यासागर जी महाराज थे। जिन्होंने पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़-राजनंदगांव चन्द्रगिरि तीर्थ में आचार्य पद का त्याग करने के बाद तीन दिन का उपवास और मौन धारण कर महा समाधि ली और अपना देह त्याग दिया। साल 2023 में भी जैन मुनि समर्थ सागर और जैन मुनि सुज्ञेय सागर जी महाराज ने भी महासमाधि लेकर अपने प्राण त्याग दिए। अब सवाल उठता है कि क्या है जैन मुनियों की अंतिम साधना और जैन धर्म में इसके लेकर क्या बताया गया है। कैसे होता है अंतिम संस्‍कार। इस प्रक्रिया के दौरान उनकी अंतिम यात्रा डोली में क्यों निकाली जाती है। अंतिम यात्रा में करोड़ों रुपये की बोली क्यों लगाई जाती है।

संथारा या सल्लेखना प्रथा

सबसे पहले संथारा या सल्लेखना प्रथा का उल्लेख मिलता है। प्रथा के मुताबिक जैन मुनियों को जब इस बात का आभास होने लगता है कि उनकी मृत्यु अब नजदीक है। तब वो अपनी इच्छा से भोजन-पानी का त्याग कर देते हैं। इस प्रथा को अपनी इच्छा से मृत्यु का वरण करना माना जाता है। ये जैन मुनियों के जीवन की अंतिम साधना होती है। संथारा या सल्लेखना प्रथा का उल्लेख जैन संतों के पवित्र ग्रंथ तत्वार्थ सूत्र में मिलता है जिसे वो अपना देह त्याग देने का आदेश मानते है।

जबरन बंद नहीं कराया जा सकता भोजन-पानी 

ग्रंथ के मुताबिक, जैन मुनि का भोजन और पानी, कोई दबाव डालकर या जबरन बंद नहीं कराया जा सकता। ये मुनि की स्वेच्छा पर निर्भर होता है। जैन मुनि अपनी इच्छा से चरण दर चरण तरीके से भोजन-पानी बंद करते हैं। ग्रंथ तत्वार्थ के मुताबिक जैन मुनि को जो भोजन दिया जाता है। उसे एक समय के बाद धीरे-धीरे बंद कर किया जाता है। इसके बाद जैन मुनि प्राण त्‍याग करने तक भोजन ग्रहण नहीं करते हैं। प्राण त्यागने वाले मुनियों की अंतिम यात्रा डोली में निकाली जाती है। इस दौरान उन्हें लकड़ी के एक तख्ते पर प्रार्थना के मुद्रा में बैठाकर ले जाया जाता है। दरअसल, जैन धर्म ग्रंथों में संतों के लिए मृत्यु को पाना भी साधना का ही हिस्सा कहा गया है। इसलिए उन्हें साधना की अवस्‍था में यानी पद्मासन की अवस्था में बैठाकर तख्ते से अंतिम यात्रा पर ले जाया जाता है।

अंतिम यात्रा में लगाई जाती हैं करोड़ों रुपये की बोलियां

इसमें से कुछ के लिए बोलियां करोड़ों रुपये तक में जाती हैं। जैन समाज के लोग अंतिम संस्कार के हर चरण में बोली लगाकर सामाजिक कामों में अपना अंशदान देते हैं। बोलियों से इकट्ठा होने वाला पैसा मंदिरों को बनवानेगरीबों की सहायता के साथ अन्य समाज सेवा के कामों के लिए दिया जाता है। जैन मुनियों का अंतिम यात्रा के बाद जैन मंत्रों का उच्चारण कर पार्थिव देह को मुखाग्नि दी जाती है। इस दौरान तीर्थंकर और मुक्ता आत्मा का स्मरण करते हुए मृतात्मा के आध्यात्मिक उत्थान की कामना भी की जाती है। जैन संतों या मुनियों की अस्थियों के विसर्जन की परंपरा नहीं है। अगर किसी संत की समाधि बनाई जाती है तो उनकी अस्थियों को कलश में रखकर जमीन में गाड़ा जाता है और समाधि बना दी जाती है।

डिसक्लेमर : ये जानकारी प्रामाणिकता और विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। कई तरह के माध्यम से संकलित करके ये सूचना आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ जानकारी देना है।

 

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