देश की राजनीति में ‘शक्ति’ शब्द पर मचा बवाल, जानिए हिंदू धर्म में ‘शक्ति’ के क्या हैं मायने ?

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अभी कुछ दिनों पहले राहुल गांधी ने मुंबई में हुई INDIA गठबंधन की एक रैली में मंच से कहा था कि 'मैं और इंडिया गठबंधन के लोग, हम एक व्यक्ति, बीजेपी या पीएम मोदी के खिलाफ नहीं लड़ रहे हैं। हिंदू धर्म में शक्ति शब्द होता है। हम एक शक्ति से लड़ रहे हैं।' राहुल गांधी ने ये किस अर्थ में कहा ये अलग बात है,लेकिन उन्होंने हिंदु धर्म में शक्ति होने की बात कही, हिंदु धर्म में शक्ति के मायने क्या हैं, शक्ति क्या है... क्योंकि अब नवरात्रि शुरु हो चुके हैं, और इन दिनों शक्ति स्वरुपा मां दुर्गा की पूजा की जाती है।


जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भारत में सबसे प्राचीन चार वेद हैं। ये चारों वेद केवल धार्मिक किताबें नहीं हैं , बल्कि मानव जीवन की पूर्णता के लिए वैदिक शिक्षा या विद्या है, जो मानव जीवन के अनिवार्य चार पुरुषार्थ मानव मूल्यों पर ही आधारित हैं। इन वेदों में लिखे देवता चमत्कारी शक्तियों वाले नहीं हैं, बल्कि उनके त्याग और सामर्थ्य के आधार पर वैदिक काल में लोगों ने उन्हें सम्मानित करार दिया है। ये देवता सूर्य, चंद्र, वर्षा, तूफान, अग्नि, जल और सामर्थ्य के आधार पर वैदिक काल में लोगों ने जिन जरुरी तत्वों को जीवन के तौर पर समझा, उन्हें देवता माना और उनकी पूजा की। यही कारण है वैदिक देवों की तुलना में पौराणिक देवताओं के कुछ अलग होने का...


वेदों के आधार पर ही पौराणिक कथाओं के लिए देवताओं का ईश्वरीय वर्णन किया गया और वो चमत्कारी शक्तियों वाले बन गए। यहां 'शक्ति' शब्द मुख्य है,  देवताओं की ताकत और उनके बल का वर्णन करने के लिए 'शक्ति' शब्द का प्रयोग होता है और व्याकरण में भी इसका अर्थ ताकत से जुड़ा है, लेकिन वेदों और पुराणों में ये शब्द इतना अधिक महत्व इसलिए रखता है क्योंकि वैदिक काल से पंथ परंपरा चली आ रही हैं, जिनमें शैव और वैष्णव मुख्य परंपराएं मानी जाती है, लेकिन इसके अलावा एक और परंपरा प्रचलित है, जिसे शाक्त परंपरा कहा जाता है। शाक्त परंपरा में देवी की उपासना का महत्व है, उन्हें भगवती, दुर्गा, अंबा, भवानी जैसे नाम दिए हैं। सभी देवताओं की शक्तियों का कारण यही शक्ति देवी ही हैं, बल्कि शाक्त परंपरा कहती है कि सारा संसार जिसके कारण और जिसकी इच्छा से चलायमान है, वो यही 'शक्ति' देवी हैं।
शक्ति को देवी रूप में कैसे गढ़ा गया, इन सभी का वर्णन वेदों से इतर पुराणों में अधिक मिलता है, खास तौर पर शैव परंपरा के प्रसिद्ध मार्कंडेय पुराण में इसका विस्तार से वर्णन है। इस वर्णन को देवी महात्म्य कहा गया है। इस महात्म्य में 700 श्लोक हैं और इसी वजह से इसे इसका प्रचलित नाम सप्तशती मिला है। इसे ही श्रीदुर्गा सप्तशती कहते हैं।


हिंदु धर्म के जानकार बताते हैं कि दुर्गा सप्तशती की कथा के दो आधार हैं एक चक्रवर्ती सम्राट और दूसरा एक वैश्य जिनका नाम था समाधि... राजा सुरथ और समाधि वैश्य अपने कष्टों और मोह के बंधन से मुक्ति के निवारण की खोज में महर्षि मेधा से मिले। महर्षि मेधा उन्हें समझाया कि मन चंचल और चलायमान होता है। उसे जिस शक्ति से नियंत्रण किया जा सकता है, वो विद्या है। यही विद्या आदि शक्ति का प्रथम स्वरूप है। इसी विद्या को जानना ज्ञान है। इसी ज्ञान को समझ पाना मोक्ष है। यही विद्या कभी ब्रह्मांड का निर्माण करती है, और कभी ब्रह्मा की शक्ति ब्राह्मी बन जाती है। यही योगनिद्रा बनकर विष्णु के ध्यान केंद्र में रहती है और यही शिव की शक्ति बनकर संहार भी करती है। ये विद्या वैसे तो निर्गुण है, निराकार है लेकिन साकार शब्दों में यही आदि शक्ति है और देवी कहलाती है।


राजा सुरथ और समाधि वैश्य की कथा ही श्रीदुर्गा सप्तशती का आधार है। दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं जिन्हें तीन चरित्र में बांटा गया है। ये तीन चरित्र कथाओं के तीन हिस्सों में बंटे हैं। प्रथम चरित्र जिंसमें मधु कैटभ वध की कथा है। मध्यम चरित्र में सेना सहिेत महिलषासुर के वध की कथा है और उत्तर चरित्र में शुम्भ- निशुम्भ वध और राजा सुरथ और समाधि वैश्य को मिले देवी के वरदान की कथा है। ये तीनों चरित्र मिलाकर सप्तशती में 700 श्लोक हैं और ये श्लोक कथाओं के आधार पर 13 अध्यायों में बंटे हुए हैं। हर अध्याय के पाठ का अलग-अलग फल मिलता है और देवी के प्राकट्य और अवतारों की अलग-अलग कथा भी इसमें वर्णित है। प्रथम चरित्र की देवी महाकाली, मध्यम चरित्र की देवी महालक्ष्मी और उत्तम चरित्र की देवी महासरस्वती हैं। इसमें भी देवी काली के महात्म्य में एक अध्याय, देवी लक्ष्मी की स्तुति में तीन अध्याय और देवी सरस्वती की स्तुति नौ अध्यायों में हुई है। सरस्वती ही आदि शक्ति का विद्या और ज्ञान रूप में प्रमुख स्वरूप है। 

 
 

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