2023 चुनाव: राजस्थान और मध्य प्रदेश की रानियां राजनीति में बड़ा रोल निभा रहीं हैं | Manchh न्यूज़

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राजस्थान और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में राजघरानों की रानियां बन गई हैं राजनीति के बीच चर्चा का केंद्र। जानिए कौन हैं ये महिलाएं और उनके रोल Manchh न्यूज़ पे विस्तार से

इस साल राजस्थान और मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं, ये वो राज्य हैं जहां कि राजनीति में रजवाड़ों का खासा दखल रहा हैं। इन्हीं राजपरिवारों से आई कई रानियां राजनीति में काफी एक्टिव रही, तो आज हम इन्हीं रानियों के बारे बताएंगे, जो राजनीति में बड़ा रोल निभा रहीं हैं।

धौलपुर राजपरिवार

राजस्थान की पॉलिटिक्स में वसुंधरा राजे सिंधियां सबसे पॉवरफुल महिला नेताओं में से एक हैं, वसुंधरा राजे सिंधियां ग्वालियर राजघराने के जीवाजीराव सिंधिया की बेटी और मध्य प्रदेश के कांग्रेस नेता माधवराव सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया की बहन हैं। वसुंधरा राजे की शादी धौलपुर के महाराज राणा हेमंत सिंह से हुई थी, लेकिन एक साल बाद ही दोनों अलग हो गए। राजे 1984 में राजनीति में शामिल हुईं, वो दो बार क्षेत्रफल के हिसाब से देश के सबसे बड़े सूबे राजस्थान की मुख्यमंत्री बन चुकी हैं। सबसे पहले साल 2003 में वो राजस्थान की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी थी, फिर साल 2013 से 2018 तक दोबारा मुख्यमंत्री रहीं। वसुंधरा राजे सिंधियां 5 बार सांसद और अटल बिहारी वाजपेई की सरकार में मिनिस्टर भी रह चुकीं हैं। 70 साल की वसुंधरा राजे झालरापाटन सीट से बीजेपी के लिए चुनाव लड़ रही है, इस सीट पर साल 2008 से लगातार उन्होंने जीत हासिल की है और इस बार भी वो राजस्थान मांगे परिवर्तन और आओ फिर से साथ चलें के नारो के साथ चुनाव क्षेत्र में मजबूती से मौजूद हैं।

सिंधिया राजपरिवार 

मध्य प्रदेश के ग्वालियर का सिंधिया परिवार राजनीति में धाक रखने वाला परिवार है। इसी परिवार से यशोधरा राजे सिंधिया शिवपुरी विधानसभा सीट से 4 बार से विधायक हैं। यशोधरा राजे सिंधिया जीवाजीराव सिंधिया की बेटी हैं। यशोधरा राजे सिंधिया ने साल 1998 में बीजेपी के साथ मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ा। साथ ही वो मध्य प्रदेश में पर्यटन, खेल और युवा कल्याण के लिए कैबिनेट मंत्री के तौर पर काम किया। वो साल 2018 में शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र से 24 हजार 282 वोट से जीती थीं, और इस बार भी प्रबल दावेदारी सामने रख रही हैं।

जयपुर राजपरिवार 

जयपुर के राजघराने की राजकुमारी दीया कुमारी राजस्थान की राजनीति में एक अलग पहचान रखती हैं। जयपुर राजघराने की बात करें तो जयपुर की महारानी गायत्री देवी सी. राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी में शामिल हो गईं। 1962 के लोकसभा चुनावों में, उन्होंने जयपुर क्षेत्र से सबसे बड़ी जीत हासिल की। बाद में 1967 में उनकी पार्टी ने जनसंघ से हाथ मिला लिया। महारानी ने 1970 के दशक के मध्य में राजनीति से संन्यास ले लिया था। गायत्री देवी के सौतेले बेटे भवानी सिंह भी राजीव गांधी के अनुरोध पर, 1989 का लोकसभा चुनाव लड़े, हालांकि वो गिरधारी लाल भार्गव से हार गए थे। इसके बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया। भवानी सिंह की बेटी दीया कुमारी ने 2013 में राजनीति में कदम रखा और बीजेपी में शामिल हो गई। कुमारी सवाई माधोपुर निर्वाचन क्षेत्र से राजस्थान विधान सभा की सदस्य हैं।

भरतपुर राजपरिवार 

राजस्थान के भरतपुर शाही परिवार से ताल्लुक रखने वाली कृष्णेंद्र सिंह दीपा पिछले दो दशकों से राजनीति में सक्रिय हैं। राजा मानसिंह की बेटी कृष्णेंद्र सिंह दीपा ने साल 1985 में अपना सियासी सफर शुरू किया। कृष्णेंद्र सिंह दीपा वसुंधरा राजे सरकार में पर्यटन मंत्री भी रही चुकी हैं।

करौली राजपरिवार 

विधानसभा क्षेत्र करौली की पॉलिटिक्स में भी रॉयल कनेक्शन का दबदबा रहा है। यही वजह है कि रियासत से सियासत के सफर में भी करौली के पूर्व राजपरिवार को लोकतंत्र में भी छह बार जीत मिल चुकी है। करौली राजपरिवार से महाराजा कृष्ण चंद्र पाल  की पत्नी रोहिणी कुमारी राजनीति में एक्टिव हैं, करौली से साल 2008 के चुनाव में निर्वाचित हुई रोहिणी कुमारी को पहली महिला प्रत्याशी और विधायक बनी थीं, इस बार भी वो करौली से निर्वाचित हो सकती हैं।

बीकानेर राजपरिवार 

बीकानेर राजपरिवार से सिद्धि कुमारी भाजपा विधायक हैं और राजनीति में एक्टिव हैं। बीकानेर के आखिरी राजा, करणी सिंह ने 1952 में एक निर्दलीय के रूप में राजनीति में कदम रखा और 25 वर्षों तक बीकानेर से सांसद रहे और अब उनकी पोती सिद्धि कुमारी भाजपा से विधायक हैं।

चौमू राजघराना 

जयपुर के चौमू राजघराने से रानी रक्ष्मणी कुमारी चौमू विधानसभा सीट से दावेदारी रख रही हैं। वो कांग्रेस पार्टी के साथ जुड़ी हैं। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान वो राहुल गांधी से मिली थीं। रक्ष्मणी कुमारी जयपुर से 20 किमी दूर चौमू राजघराने की रानी है। रक्ष्मणी कुमारी की शादी महाराजा आदित्य कुमार के साथ हुई थी, जो साल 2011 में जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन के दौरान शहीद हो गए थे।

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