Lok Sabha Elections 2024: क्या होती है आचार संहिता, आम लोगों पर क्या होगा असर?

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देश में आदर्श आचार संहिता भी लागू हो गई है और नतीजे आने तक लागू रहती है। ऐसे में चाहे आप कितने भी बड़े नेता हो, मंत्री हो या प्रधानमंत्री हर किसी को आचार संहिता का डर लगा रहता है। इस दौरान कई कामों पर प्रतिबंध लग जाता है।

करीब 97 करोड़ वोटर्स के लिए सरकार चुनने का वक्त आ गया है। इलेक्शन कमीशन (Election Commission) ने देश के चुनावी महाकुंभ (Lok Sabha Election 2024) की तारीखों का ऐलान कर दिया है। 543 लोकसभा सीटों के साथ ओडिशा, सिक्किम, अरुणाचल और आंध्र की 413 विधानसभा सीटों पर चुनाव होगा। देश में आदर्श आचार संहिता भी लागू हो गई है और नतीजे आने तक लागू रहती है। ऐसे में चाहे आप कितने भी बड़े नेता हो, मंत्री हो या प्रधानमंत्री हर किसी को आचार संहिता का डर लगा रहता है। इस दौरान कई कामों पर प्रतिबंध लग जाता है। सरकार के कामकाज में भी कई अहम बदलाव हो जाते हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर आदर्श चुनाव संहिता (Model Code of Conduct) क्या है? इसे क्यों लगाई जाती है और इसके लागू होते ही किन-किन चीजों पर पाबंदी लग जाती है।  

आचार संहिता क्या होती है? 

देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग कुछ नियम बनाता है। चुनाव आयोग के इन नियमों को आचार संहिता कहा जाता है। लोकसभा/विधानसभा चुनाव के दौरान इन नियमों का पालन करना सरकार, नेताओं और राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी होती है।

आचार संहिता कब लागू होती है?  

चुनाव की तारीख के ऐलान के साथ ही आचार संहिता लागू हो जाती है। देश में हर 5 साल में लोकसभा चुनाव होते हैं। अलग-अलग राज्यों के विधानसभा चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं। ऐसे में चुनाव आयोग के चुनाव कार्यक्रमों का ऐलान करते ही आचार संहिता लागू हो जाती है।

आचार संहिता कब ख़त्म होती है?

चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक आचार संहिता लागू रहती है। चुनाव की तारीख की घोषणा होते ही देश में आचार संहिता लागू हो जाती है और वोटों की गिनती तक जारी रहती है।

क्या हैं चुनाव आचार संहिता के नियम? 

चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद कई नियम भी लागू हो जाते हैं। इस दौरान सरकारें कोई नीतिगत फैसला नहीं ले सकती है। किसी योजना का उद्घाटन नहीं हो सकता। अगर पहले ही कोई काम शुरू हो गया है तो वो जारी रह सकता है। सरकारी कर्मियों का ट्रांसफर और प्रमोशन नहीं होगा। प्रचार में सरकारी वाहन/कर्मी का इस्तेमाल वर्जित है। धार्मिक स्थल का इस्तेमाल प्रचार में नहीं कर सकते हैं। सभा/रैली के लिए पुलिस की परमिशन लेनी होगी। किसी व्यक्ति के घर-दुकान, जमीन या परिसर आदि में बिना मंजूरी बैनर-पोस्टर नहीं लगा सकते। किसी भी चुनावी रैली में धर्म या जाति के नाम पर वोट नहीं मांगे जाएंगे।  

 ट्रांसफर भी नहीं कर सकती सरकार  

मंत्री अपने आधिकारिक दौरे को चुनाव प्रचार के साथ मिला नहीं सकते हैं। केंद्र सरकार के अधिकारी-कर्मचारी चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक चुनाव आयोग के कर्मचारी की तरह काम करते हैं। आचार संहिता में सरकार किसी भी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी का ट्रांसफर या पोस्टिंग नहीं कर सकती। अगर किसी अधिकारी ट्रांसफर या पोस्टिंग जरूरी भी हो तो आयोग की परमिशन लेनी होगी।

सरकारी पैसे का नहीं कर सकते इस्तेमाल 

आचार संहिता के दौरान सरकारी पैसे का इस्तेमाल विज्ञापन या जन संपर्क के लिए नहीं किया जा सकता। अगर पहले से ही ऐसे विज्ञापन चल रहे हों तो उन्हें हटा लिया जाएगा। अगर किसी तरह की कोई प्राकृतिक आपदा या महामारी आई हो तो ऐसे वक्त में सरकार कोई मदद करना चाहती है तो पहले चुनाव आयोग की परमिशन लेनी होगी। 

प्रचार-प्रसार से जुड़े नियम और प्रतिबंध 

1- मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा या किसी भी धार्मिक स्थल का इस्तेमाल चुनाव प्रचार के लिए नहीं हो सकता। 

2- प्रचार के लिए राजनीतिक पार्टियां कितनी भी गाड़ियां (टू-व्हीलर भी शामिल) इस्तेमाल कर सकती हैं, लेकिन पहले रिटर्निंग ऑफिसर की अनुमति लेनी होगी।

3- किसी भी पार्टी या प्रत्याशी को रैली या जुलूस निकालने या चुनावी सभा करने से पहले पुलिस की परमिशन लेनी होगी।

4- रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक डीजे का इस्तेमाल नहीं हो सकता। अगर कोई रैली भी होनी है, तो सुबह 6 बजे से पहले और रात 10 बजे के बाद नहीं होगी। 

5- इलेक्शन कमीशन के मुताबिक विश्राम गृहों, डाक बंगलों और अन्य सरकारी आवासों पर सत्तारूढ़ दल या उसके उम्मीदवारों का एकाधिकार नहीं होना चाहिए। लेकिन किसी भी पार्टी द्वारा चुनाव प्रचार के लिए प्रचार कार्यालय के रूप में या सार्वजनिक बैठकें आयोजित करने के लिए उनका उपयोग करना प्रतिबंधित है।

चुनाव के दिन भी लागू होते हैं कुछ जरूरी नियम 

1- मतदान के दिन और उससे पहले के चौबीस घंटों के दौरान शराब परोसने या बांटने पर रोक।

2- मतदान केंद्रों के पास राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों की ओर से लगाए गए शिविरों के पास गैर-जरूरी भीड़ जमा करने पर रोक।

चुनाव आयोग बन जाता है ‘बाहुबली’ 

आचार संहिता के दौरान मंत्री-मुख्यमंत्री-विधायक पर कई तरह की पाबंदी लग जाती है। अगर सरकार कुछ भी करना चाहती है तो उसे पहले आयोग को बताना होगा और उसकी परमिशन लेनी होगी। केंद्र या राज्य का कोई भी मंत्री चुनाव प्रक्रिया में शामिल किसी भी अधिकारी को नहीं बुला सकता।  

आचार संहिता के उल्लंघन पर क्या होगा?    

1- अगर कोई भी प्रत्याशी आचार संहिता का उल्लंघन करता है, तो उसके प्रचार करने पर रोक लगाई जा सकती है।

2- आचार संहिता का उल्लंघन करने पर 1860 का भारतीय दंड संहिता, 1973 का आपराधिक प्रक्रिया संहिता और 1951 का लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम प्रयोग में लाया जा सकता है।

3- उल्लंघन करने पर प्रत्याशी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जा सकता है। इतना ही नहीं, जेल जाने का प्रावधान भी है।

4- इसके अलावा इलेक्शन कमीशन के पास 1968 के चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश के पैराग्राफ 16ए के तहत किसी पार्टी की मान्यता को निलंबित करने या वापस लेने का अधिकार है।

कब हुई थी आचार संहिता की शुरुआत? 

आदर्श आचार संहिता की शुरुआत साल 1960 में केरल में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान हुई थी, जब प्रशासन ने राजनीतिक दलों के लिए एक आचार संहिता बनाने की कोशिश की थी। आदर्श आचार संहिता पहली बार भारत के चुनाव आयोग द्वारा न्यूनतम आचार संहिता के शीर्षक के तहत 26 सितंबर, 1968 को मध्यावधि चुनाव 1968-69 के दौरान जारी की गई थी। इस संहिता को 1979, 1982, 1991 2013 में संशोधित किया गया।

पिछले 10 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं। वैश्विक और राजनीतिक के साथ-साथ ऐसी खबरें लिखने का शौक है जो व्यक्ति के जीवन पर सीधा असर डाल सकती हैं। वहीं लोगों को ‘ज्ञान’ देने से बचता हूं।

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