कभी पूर्वांचल में कायम था बाहुबलियों का रसूख, अब चुनाव में खत्म हो रहा है क्रेज

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एक दौर था जब उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में भी बाहुबलियों का बोलबाला था। विधानसभा हो या लोकसभा चुनाव पूर्वाचल की सियासत में बाहुबलियों की हनक समय के साथ बढ़ती रही है। कोई भी उनके खिलाफ चुनावी मैदान में उतरना नहीं चाहता था। लेकिन, समय ने करवट बदली। योगी सरकार आई। पिछले सात सालों में उत्तर प्रदेश में बाहुबल खत्म होता नजर आया है। आइए जानते हैं पूर्वांचल के ऐसे बाहुबली नेताओं के बारे में जिनकी एक समय में तूती बोलती थी लेकिन यूपी के बदलते हालात के बाद अब या तो बाहुबली इस दुनिया में नहीं हैं और जो हैं वो सलाखों के पीछे हैं।

भारतीय राजनीति के इतिहास में पंडित हरिशंकर तिवारी जेल से चुनाव जीतने वाले पहले बाहुबली नेता थे। वो गोरखपुर की चिल्लूपार सीट से चुनाव जीतकर 22 सालों तक विधानसभा के सदस्य रहे। मुलायम सिंह यादव, राम प्रकाश गुप्ता, राजनाथ सिंह और मायावती की सरकार में उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया। तो वहीं ईडी के शिकंजे में घिरे बाहुबली हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी अपने पिता के निधन के बाद श्रावस्ती या संत कबीर नगर से समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। बता दें कि कैसरगंज सीट से बाहुबली बृजभूषण सिंह की दावेदारी को लेकर असमंजस की स्थिति है। माना जा रहा है कि उनका टिकट कटना लगभग तय है और ऐसे में अगर उनका टिकट कटा तो परिवार से ही दावेदारी आने की प्रबल संभावना है।

सियासत में अगर बाहुबलियों का जिक्र होगा तो मुख्तार अंसारी का जिक्र होना लाजमी है। पूर्वांचल की राजनीति में 1996 से 2017 तक लगातार पांच चुनावों में मऊ सदर सीट से विधायक बनने वाले मुख्तार अंसारी का दबदबा हुआ करता था। मऊ-गाजीपुर के हर छोटे-बड़े चुनावों में उसका दखल रहता था। वक्त बदला और मुख्तार की बांदा मेडिकल कॉलेज में इलाज के दौरान मौत हो गई। माफिया मुख्तार अंसारी के बड़े भाई अफजाल अंसारी इस बार समाजवादी पार्टी के टिकट पर गाजीपुर से चुनाव लड़ रहे हैं। हालांकि, मुख्तार एंड गैंग के खिलाफ हो रही कार्रवाइयों के बीच चुनाव में अफजाल को इस बार जीत मिलेगी या हार ये वक्त बताएगा। जबकि, पिछले लोकसभा चुनाव में माफिया मुख्तार अंसारी के करीबी अतुल राय मऊ की घोसी सीट से बसपा संसद हैं।

बात अगर आज़मगढ़ की करें तो यहां यादव बंधुओं रमाकांत यादव और उमाकांत यादव का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। रमाकांत यादव ने 90 के दशक में पूर्वांचल की राजनीति में कदम रखा और 1996, 1999, 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव में बड़े अंतर से जीतकर संसद पहुंचे। यादव वोटों पर मजबूत पकड़ रखने वाले चार बार के सांसद और पांच बार के विधायक बाहुबली नेता रमाकांत यादव फतेहगढ़ जेल में बंद हैं। इस बार चुनाव में उनका कोई प्रभाव नहीं रहेगा।

 

इतना ही नहीं 2004 के लोकसभा चुनाव में रमाकांत यादव का भाई उमाकांत यादव जौनपुर जिले की मछलीशहर लोकसभा सीट से चुनाव जीते। तीन बार विधायक और एक बार सांसद रहे उमाकांत यादव को आठ अगस्त 2022 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। बसपा के पूर्व सांसद उमाकांत यादव भी चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। इस बार लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ में किसी बाहुबली का दखल नहीं होगा।

बात अगर बाहुबलियों की हो तो एनडीए के घटक दल जेडीयू से टिकट की आस लगाने वाले बाहुबली धनंजय सिंह का जिक्र जरूर होगा। धनंजय सिंह जेडीयू के टिकट पर जौनपुर से चुनाव लड़ने की तैयारी में थे। लेकिन बीजेपी ने महाराष्ट्र के पूर्व गृह राज्य मंत्री और पूर्व कांग्रेसी कृपाशंकर सिंह को टिकट देकर कयासों पर विराम लगा दिया। हालांकि, धनंजय ने बीजेपी के टिकट की घोषणा के कुछ देर बाद ही सोशल मीडिया पर जौनपुर से चुनाव लड़ने की पोस्ट डालकर अपने समर्थकों को तैयार रहने का संदेश दे डाला। लेकिन तीन दिन बाद ही जौनपुर के एमपी-एएलए कोर्ट ने अपहरण, रंगदारी के मामले में पूर्व सांसद धनंजय सिंह को सात साल की सजा सुनाई है। 33 साल के आपराधिक इतिहास में पहली बार सजा मिलने के बाद धनंजय सिंह का 2024 लोकसभा चुनाव लड़ने का सपना, सपना ही रह गया। अब चर्चा है कि दो बार विधायक और एक बार सांसद रहे धनंजय सिंह अपनी पत्नी श्रीकला रेड्डी को जौनपुर से चुनाव लड़वा सकते हैं।

इसी तरह ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत, विधान परिषद और विधानसभा चुनाव में बृजेश सिंह से जुड़े लोगों का दबदबा है। उसका भतीजा सुशील सिंह विधायक है। ब्रृजेश एमएलसी रह चुके हैं और उनकी पत्नी अन्नपूर्णा सिंह अभी एमएलसी हैं। इस बार के आम चुनाव में चर्चा है कि ब्रृजेश सिंह खुद या उनके बेटे चुनाव में अपनी किस्मत आजमा सकते हैं।  

 एक समय था जब भदोही, मिर्जापुर और प्रयागराज की सियासत में विजय मिश्रा की तूती बोलती थी। आगरा जेल में बंद ज्ञानपुर के पूर्व विधायक विजय मिश्र का हत्या, लूट, अपहरण, दुष्कर्म, एके-47 की बरामदगी जैसे अपराधों से नाता रहा। चार बार विधायक रहे विजय मिश्र को वाराणसी की एक गायिका के साथ दुष्कर्म के मामले में 15 साल की सजा हो गई। उसके ऊपर कानून का शिकंजा इस कदर कस गया है कि उसका सियासी रसूख तहस-नहस हो गया है। ज्ञानपुर सीट से विधायक रहे विजय मिश्रा कभी मुलायम सिंह यादव के करीबी माने जाते थे, लेकिन अब उनके सितारे गर्दिश में हैं।

आज के प्रयागराज और तब के इलाहाबाद में माफिया अतीक अहमद और उसके परिवार ने भी कई सियासी पारियां खेली हैं। साल 2004 के चुनाव में अतीक अहमद सपा के टिकट पर फूलपुर सीट से सांसद चुना गया था। वो इलाहाबाद पश्चिम विधानसभा सीट से पांच बार विधायक रहा। 15 अप्रैल, 2023 को चेकअप के लिए अस्पताल ले जाते समय उसकी और उसके भाई अशरफ की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। अब उसके परिवार से चुनावी दावेदारी आना मुश्किल है। क्योंकि अतीक की पत्नी शाइस्ता उमेश पाल और दो सिपाहियों की हत्या में वांटेड है। तो वहीं दो बेटे उमर और अली जेल में हैं और भाई अशरफ की पत्नी फातिमा भी अंडरग्राउंड है।  

अयोध्या जिले की गोसाईंगंज विधानसभा यूपी की हॉट सीट में शुमार है। इसकी वजह रहे हैं बाहुबली अभय सिंह। राज्यसभा की 10वीं सीट के लिए मतदान में अभय ने भी सपा से पाला बदलकर बीजेपी के प्रत्याशी को वोट दिया था। अभय सिंह को मुख्तार अंसारी का दाहिना हाथ कहा जाता है। अभय सिंह का सबसे पहले नाम लखनऊ के जेलर आरके तिवारी हत्याकांड में आया। रेलवे के ठेकों में भी अभय सिंह का दखल रहा है। साल 2007-12 के बीच बसपा सरकार के दौरान परिवार कल्याण विभाग के सीएमओ विनोद आर्या की हत्या में भी अभय सिंह का नाम सामने आया। बता दें कि अभय सिंह पर 10 मुकदमे दर्ज हैं।

कवयित्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में सजा काट रहे बाहुबली नेता अमरमणि त्रिपाठी ने साल 2009 में जेल में रहते हुए अपने भाई अजीतमणि त्रिपाठी को महराजगंज सीट से मैदान में उतारा, लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी हर्षवर्धन के हाथों उन्हें भी हार मिली। इसके पहले 1996 में अमरमणि डुमरियागंज से तो वीरेंद्र शाही गोरखपुर से चुनाव लड़े, लेकिन दोनों को हार मिली। बाहुबली अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमन मणि त्रिपाठी ने हाल ही में कांग्रेस की सदस्यता ली है और इसके पीछे है टिकट मिलने की चाहत। टिकट मिलेगा या नहीं इस पर अभी भी संशय बरकरार है।

पिछले 10 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं। वैश्विक और राजनीतिक के साथ-साथ ऐसी खबरें लिखने का शौक है जो व्यक्ति के जीवन पर सीधा असर डाल सकती हैं। वहीं लोगों को ‘ज्ञान’ देने से बचता हूं।

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