Lok Sabha Elections 2024: पूर्वांचल की इन सीटों पर बीजेपी के लिए जीत नहीं आसान

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लोकसभा चुनाव अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। 1 अप्रैल को आखिरी और सातवें फेज में यूपी की 13 सीट के लिए मतदान हो रहा है। बीजेपी भले ही देश में 400 पार और यूपी में मिशन 80 का नारा दे रही है। लेकिन उसे भी पता है कि पूर्वांचल की सीटों पर जीत उसके लिए अभी भी आसान नहीं है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाराणसी से चुनाव लड़ने के बावजूद 2019 के लोकसभा और 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन एकतरफा नहीं रहा। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने काफी मशक्कत के बाद यहां तीन सीटें जीती थीं। वहीं, पूर्वांचल इलाके में 5 सीटों का नुकसान हुआ था। इसी तरह 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का कई जिलों में सूपड़ा ही साफ हो गया था। इसलिए इलाके की आठ सीटें आज भी बीजेपी के लिए चिंता का सबब बनी हुई हैं। आइए जानते हैं यूपी की वो 8 सीटें जहां नहीं होता मोदी लहर का भी असर। इस बार भी इन सीटों पर बीजेपी को है खतरा 

घोसी 

घोसी लोकसभा सीट कभी वामपंथ का गढ़ रही तो कभी कांग्रेस का भी यहां झंडा फहरा। 2014 में मोदी लहर में घोसी का भी मिजाज बदला और पहली बार कमल खिला। हरिनारायण राजभर संसद पहुंचे। 2019 में सपा-बसपा की एका ने जिताऊ समीकरण बनाया और मुख्तार के करीबी बसपा प्रत्याशी अतुल राय 1 लाख 22 हजार 568 वोटों से जीते। लेकिन इस बार घोसी लोकसभा सीट पर बीजेपी को कड़ी चुनौती देखने को मिल रही है। जहां एनडीए को ओर से ओम प्रकाश राजभर के बेटे अरविंद राजभर ताल ठोंक रहे हैं। तो वहीं राजीव राय समाजवादी पार्टी से और बालकृष्ण चौहान बसपा से उम्मीदवार हैं। यहां लड़ाई त्रिकोणीय दिख रही है।

गाजीपुर 

पूर्वांचल में वाराणसी के बाद दूसरी हॉट सीट गाजीपुर है। अंसारी परिवार के प्रभाव वाली ये सीट मुख्तार अंसारी की जेल में मौत के कारण पूरे देश में चर्चा में है। 2004 के लोकसभा चुनाव में अफजाल अंसारी ने बीजेपी के खिलाफ जीत दर्ज की तो साल 2009 में सपा के राधेमोहन सिंह जीते थे। इसके बाद साल 2014 में मोदी लहर में बीजेपी के मनोज सिन्हा जीते। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद बसपा प्रत्याशी अफजाल ने बीजेपी के मनोज सिन्हा को 1 लाख 19 हजार 392 वोटों के अंतर से हराकर चुनावी रणनीतिकारों को चौंका दिया था। इस बार अफजाल अंसारी सपा की टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं और बीजेपी से मनोज सिन्हा के खास पारसनाथ राय को टिकट मिला है। ऐसे में दोनों प्रत्याशियों के बीच रोचक मुकाबला है।

चंदौली 

पिछली बार पूर्वांचल की चंदौली लोकसभा सीट से बीजेपी के डॉ. महेंद्र नाथ पांडे जीते थे। हालांकि, यहां जीत का अंतर महज 13 हजार 959 था। जबकि साल 2014 के आम चुनाव में डॉ. पांडे ने इसी लोकसभा क्षेत्र से 1.5 लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी। इस बार बीजेपी के महेंद्र नाथ पांडे की हैट्रिक को सपा ने चुनौती देते हुए वीरेंद्र सिंह को टिकट दिया है और बसपा ने सतेंद्र कुमार मौर्य को अपना उम्मीदवार बनाया है। ऐसे में इस बार मुकाबला बेहद कड़ा है।

बलिया 

उत्तर प्रदेश की बलिया लोकसभा सीट भी देश को प्रधानमंत्री दे चुकी है। हम बात कर रहे हैं पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की। वो बलिया से ही चुनाव जीतकर देश के प्रधानमंत्री बने थे। अब बीजेपी ने इस लोकसभा सीट से उनके ही बेटे नीरज शेखर को सियासी रण में उतारा है। वहीं उनके सामने सपा के सनातन पांडेय और बसपा के ललन सिंह यादव मैदान में हैं। बलिया में 2019 के चुनाव में बीजेपी के वीरेंद्र सिंह मस्त सिर्फ 15 हजार 519 वोटों से जीते थे। शायद यही वजह है कि बीजेपी ने इस बार उन पर भरोसा नहीं जताया है। सियासी जानकारों का मानना है कि एम-वाई फैक्टर, जिसे सपा का कोर वोटर्स माना जाता है, अगर उनका वोट ब्राह्मणों के साथ सनातन पांडेय को जाता है तो फिर नीरज शेखर के लिए जीत की राह मुश्किल हो सकती है।  

जौनपुर 

गोमती नदी के किनारे बसा ऐतिहासिक रूप से चर्चित जौनपुर शहर की जनता जल्द परिवर्तन में विश्वास करती है। 2014 के चुनाव में ये सीट बीजेपी की झोली में आई तो 2019 के चुनाव में बसपा-सपा गठबंधन के बीच जीत का सेहरा बसपा के श्याम सिंह यादव के सिर पर बंधा। इस बार बीजेपी ने पूर्वांचल के लोकप्रिय नेता कृपाशंकर सिंह पर दांव खेला है। लेकिन, उनका मुकाबला समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे बाबू सिंह कुशवाहा से है। बाबू सिंह कुशवाहा बसपा में रहते हुए अतिपिछड़ों के कद्दावर नेता रहे हैं। ऐसे में इस सीट पर कांटे की टक्कर है।

आज़मगढ़ 

2019 के आम चुनाव में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आज़मगढ़ सीट से 2.5 लाख से ज्यादा वोटों से जीत हासिल की थी। यादव और मुस्लिम बाहुल्य इस संसदीय सीट पर एमवाई फॉर्मूला काम करता रहा है। हालांकि, अखिलेश के इस सीट को छोड़ने के बाद हुए उपचुनाव में अखिलेश यादव के भाई धर्मेंद्र यादव को यहां से करारी हार मिली। बीजेपी उम्मीदवार भोजपुरी एक्टर दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ ने जीत हासिल की थी। इस बार भी इस सीट पर बीजेपी से दिनश लाल यादव और सपा के धर्मेंद्र यादव के बीच मुकाबला है।

लालगंज 

इनके अलावा लालगंज सीट सुरक्षित सीट है। साल 2014 में मोदी लहर के बीच वोटर्स ने सपा-बसपा को दरकिनार करते हुए बीजेपी के पक्ष में वोट डाला और नीलम सोनकर ने ये सीट बीजेपी के लिए जीती। अगले पांच साल में वोटर्स का बीजेपी से मोहभंग हुआ तो 2019 में एक बार फिर बसपा ने बाजी मारी और संगीता आजाद ने जीत हासिल की। इस बार बीजेपी ने अपनी पुरानी प्रत्याशी नीलम सोनकर पर ही भरोसा जताया है। जबकि बसपा ने यहां से डॉ. इंदू चौधरी को मैदान में उतारा है। तो वहीं, समाजवादी पार्टी ने पुराने समाजवादी नेता दरोगा प्रसाद सरोज पर भरोसा जताया है।

मछली शहर 

यूपी की मछली शहर लोकसभा सीट पर 2019 के लोकसभा चुनाव में सबसे कम जीत का अंतर रहा था। बीजेपी प्रत्याशी बीपी सरोज महज 181 वोटों से जीतने में सफल रहे थे। एक बार फिर यहां से बीजेपी ने मौजूदा सांसद बीपी सरोज को अपना उम्मीदवार बनाया है। बीपी सरोज के पास जीत की हैट्रिक लगाने का मौका है और समाजवादी पार्टी ने प्रिया सरोज को चुना है। अब 4 जून को पता चल जाएगा कि दोनों उम्मीदवारों में से किसने इस बार आर-पार की लड़ाई में बाजी मारी है।

हालांकि इस बार यहां ऊंट किस करवट बैठता है ये तो 4 जून को चुनाव का परिणाम आने पर पता चलेगा।

 

पिछले 12 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं। वैश्विक और राजनीतिक के साथ-साथ ऐसी खबरें लिखने का शौक है जो व्यक्ति के जीवन पर सीधा असर डाल सकती हैं। वहीं लोगों को ‘ज्ञान’ देने से बचता हूं।

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