Loksabha Election 2024 में Mayawati ने खो दी अपनी सियासी जमीन, Vote Share में आई इतनी गिरावट !

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देश में एनडीए की सरकार बनने को है, इंडिया ब्लॉक ने भी अभी उम्मीदें नहीं छोड़ी हैं। जोड़तोड़ की राजनीति से लेकर तमाम बयान नेताओं के सामने आ रहे हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा जिस राज्य की हो रही है वो यूपी है जहां समाजवादी पार्टी ने ऐसा कमाल दिखाया है जिसने बीजेपी से लेकर बसपा चीफ मायावती की टेंशन बढ़ा दी है. हालांकि इस चुनाव में मायावती को दोहरा झटका लगा है एक वोट बैंक तो खिसका ही है साथ ही मुस्लिम और दलितों के सहारे जो सोशल इंजीनियरिंग इस चुनाव में सेट की वो फेल साबित होती हुई दिखी. मायावती ने एक प्रेस नोट जारी करते हुए मुस्लिमों पर हार का ठीकरा फोड़ा है। मायावती ने कहा कि भविष्य में सोच समझकर अवसर देंगी. बता दें मायावती ने इस बार सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए यूपी में 23 मुस्लिम और 15 ब्राह्मणों को टिकट दिया था. जिसमें सभी को करारी हार का सामना करना पड़ा. इसके साथ ही दलित वोटर्स ने भी मायावती को छोड़ दूसरे दलों पर विश्वास किया जिसके बाद से यूपी में दलित पॉलिटिक्स के नए नेता को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं क्योंकि राज्य में करीब 21 फीसदी दलित वोटर्स की संख्या है और इस समाज के वोटर्स पर सभी पार्टियों की नजर है.

खासतौर पर बसपा को यूपी में दलित पॉलिटिक्स के लिए ही जाना जाता है, लेकिन पिछले 12 साल से पार्टी राज्य की सत्ता से बाहर है और उसका बड़ा वोट बैंक भी धीरे-धीरे हाथ से छिटकते दिख रहा है. इस बीच, यूपी की राजनीति में चंद्रशेखर आजाद नए दलित चेहरा बनकर उभरे हैं. चंद्रशेखर को राजनीति में ना सिर्फ खुद को स्थापति करते देखा जा रहा है, बल्कि वो मजबूती से दलितों के हक में आवाज भी उठाते नजर आ रहे हैं. दबी आवाज में सियासी गलियारों में ये चर्चाएं भी उठ रही हैं कि मायावती ने पर्दे के पीछे रहकर बीजेपी का साथ दिया है. हालांकि इस दावे की मंच कोई पुष्टि नहीं करता है.


हां अगर एनालिसिस करें तो जिस उत्तर प्रदेश में कभी बसपा की सरकार हुआ करती थी, वहां उसका खाता भी नहीं खुला. लेकिन वो यहां पर बीजेपी के लिए मददगार जरूर रही. आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं. 16 सीटों पर बसपा को बीजेपी और उसकी सहयोगी दल की जीत के अंतर से ज्यादा वोट मिले. इसमें से 14 सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की. अगर ये सीटें इंडिया गठबंधन के खाते में चली जातीं तो एनडीए का आंकड़ा 278 पर ही रह जाता. यूपी में बीजेपी के खाते में 33 सीटें आई हैं, अगर इन 14 सीटों पर उसे हार मिलती तो उसकी सीटों की संख्या 19 ही रह जाती. जो एक बड़ा झटका होता. एक बार इन सीटों पर भी नजर डाल लेते हैं.

भदोही में इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार ललितेश त्रिपाठी करीब 45 हजार वोटों से बीजेपी के विनोद कुमार बिंद से हारे. लेकिन इस चुनाव में बसपा के हरिशंकर को 1 लाख 55 हजार वोट मिले. अगर यही वोट इंडिया के ललितेश त्रिपाठी के खाते में जाते तो उनकी जीत हो सकती थी.

कुछ ऐसा ही मिर्जापुर में भी हुआ. जहां अपना दल (सोनेलाल) की अनुप्रिया पटेल ने करीब 38 हजार वोटों से सपा के रमेश चंद बिंद को हराया. तीसरे नंबर पर बसपा के मनीष कुमार के खाते में 1 लाख 44 हजार वोट आए. बसपा के यही वोट अनुप्रिया की जीत में अहम साबित हुए.

इनके अलावा अकबरपुर में बीजेपी के देवेंद्र सिंह को 5 लाख 17 हजार 423 वोट मिले. जबकि सपा के राजाराम पाल को 4 लाख 73 हजार 78 वोट मिले. तीसरे नंबर पर बसपा रही. उसके खाते में 73 हजार 140 वोट आए. यानी यहां पर बीजेपी को जीत 44 हजार 345 वोटों से मिली. बसपा के वोट अगर सपा को कन्वर्ट होते तो बीजेपी की हार हो जाती.

अलीगढ़ में बीजेपी के सतीश गौतम को 15 हजार वोटों से जीत मिली. उन्होंने सपा के बिजेंद्र सिंह को हराया, जबकि बसपा तीसरे नंबर पर रही उसके खाते में 1 लाख 20 हजार से ज्यादा वोट पड़े यानी यहां पर भी अगर बसपा के वोट सपा को मिलते तो नतीजे बीजेपी के पक्ष में नहीं होते.

अमरोहा में बीजेपी को 28 हजार 670 वोटों से जीत मिली. बसपा के खाते में 1 लाख 64 हजार 99 वोट आए. इसमें से अगर बसपा के 30 हजार वोट भी सपा को मिलते तो बीजेपी की हार लगभग तय थी.

कुछ ऐसा ही बांसदांव में हुआ जहां बीजेपी को महज 3 हजार 150 वोटों से जीत मिली. बसपा के खाते में 64 हजार से ज्यादा वोट पड़े. अगर ये वोट सपा को मिलते तो उसकी भारी मतों से जीत होती.

इसके साथ कई ऐसे जिले जैसे- बिजनौर देवरिया, फर्रुखाबाद, फतेहपुर सिकरी, हरदोई, मेरठ, मिश्रिख, फूलपुर, शाहजहांपुर, उन्नाव रहे जहां अगर बसपा का साथ मिलता तो इंडिया गठबंधन बाजी मार सकता था. अब रिजल्ट तो सबके सामने आ चुके हैं वोट शेयर पर नजर डालें तो यूपी में बसपा का वोट प्रतिशत 9.39 है. वहीं, अगर देश की बात करें तो पूरे देश में बीएसपी का वोट प्रतिशत केवल 2.04 है.

ऐसा कहा जा रहा है कि मायावती पर विश्वास न करने का सबसे बड़ा कारण इंडिया गठबंधन के संविधान और आरक्षण पर खतरे के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया जाना रहा. दलितों के एक बड़े तबके को लगा कि इंडिया गठबंधन में शामिल नहीं होने का मायावती का फैसला बीजेपी की मदद कर सकता है. इसलिए इस बार उन्होंने बसपा से मुंह मोड़ने का फैसला किया. आने वाले वक्त में इस हालात में क्या बदलाव आएगा? या दलित वोटर चंद्रशेखर आजाद के रूप में अपना नया मसीहा खोजने की ओर बढ़ेगा. इन सवालों का जवाब आने वाले वक्त में देखना दिलचस्प होगा.


कानपुर का हूं, 8 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं, पॉलिटिक्स एनालिसिस पर ज्यादा फोकस करता हूं, बेहतर कल की उम्मीद में खुद की तलाश करता हूं.

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