Payal Kapadia : पहली इंडियन फिल्ममेकर जिन्होंने कांस में पाया सम्मान

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'ऑल वी इमेजिन एज लाइट' फिल्म ने रचा इतिहास

प्रभा और अनु दो नर्स, साथ में रहती हैं। प्रभा की अरेंज्ड मैरिज हो चुकी है। लेकिन उसका पति विदेश में रहता है। दूसरी तरफ अनु की शादी नहीं हुई है, लेकिन उसे एक लड़के से प्यार है। प्रभा और अनु अपनी दो दोस्तों के साथ एक ट्रिप पर जाती हैं, जहां वो खुद को पहचाने की कोशिश करती हैं और फिर उन्हें आजादी के मायने समझ में आते हैं। दरअसल ये असल जिंदगी नहीं एक फिल्म की कहानी है। फिल्म का नाम है 'ऑल वी इमेजिन एज लाइट'। इस फिल्म ने इतिहास रचा है।

आठ मिनट तक गूंजी तालियों की गड़गड़ाहट

77वें कांस फिल्म फेस्टिवल में पायल कपाड़िया की फिल्म ‘ऑल वी इमैजिन एज लाइट’ को ग्रैंड प्रिक्स अवार्ड से नवाजा गया। ग्रैंड प्रिक्स अवार्ड जो पाल्मे डी'ओर के बाद फिल्म फेस्टिवल का दूसरा सबसे प्रतिष्ठित अवार्ड। कांस में फिल्म को देखने के बाद 8 मिनट का स्टैंडिंग ओवेशन मिला। तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूंज उठा। पायल कपाड़िया ये अवॉर्ड पाने वाली पहली इंडियन फिल्ममेकर बन गई हैं। इस फिल्म में कनी कुश्रुति, दिव्या प्रभा, ऋधु हरूण, छाया कदम और अजीस नेदुमंगड़ जैसे स्टार्स ने बेहतरीन काम किया।

‘ये अवॉर्ड मेरी कल्पना से परे है...’

फिल्म की डायरेक्टर पायल कपाड़िया ने 77वें कांस फिल्म समारोह के मंच पर अवार्ड लेते हुए कहा कि 'ये मेरे लिए अविश्वसनीय है और मैं अपने आप को चुटकी काट रही हूं। मैं बहुत आभारी हूं और यहां पहुंचकर बहुत खास महसूस कर रही हूं। इस प्रतियोगिता के लिए चयनित होना ही सपने जैसा था और ये अवॉर्ड मेरी कल्पना से परे है। इस समारोह में पहुंचकर बहुत अच्छा लग रहा है। कृपया अगली भारतीय फ़िल्म के लिए 30 साल का इंतजार ना करें।' दरअसल कांस की सबसे प्रतिष्ठित कैटेगरी ‘पाम डी’ओर’ के तहत पायल कपाड़िया की फिल्म ‘ऑल वी इमैजिन एज लाइट’ को सिलेक्ट किया गया था। इससे पहले इस कैटेगरी में 30 साल पहले साल 1994 में इंडियन फिल्म ‘स्वाहम’ को नॉमिनेट किया गया था।

फिल्मों से दिलचस्पी ले गई FTII

साल 1986 में मुंबई में पैदा हुई पायल कपाड़िया, आर्टिस्ट नलिनी मलानी की बेटी हैं। शुरुआती पढ़ाई आंध्र प्रदेश के ऋषि वैली स्कूल से की, सैंट जेवियर कॉलेज मुंबई से इकोनॉमिक्स की डिग्री ली। सोफिया कॉलेज से मास्टर्स किया। दिलचस्पी फिल्मों में थी तो वो पुणे के एफटीटीआई तक आ गईं। इन्होंने साल 2014 से लेकर 2024 तक कई शॉर्ट फिल्में बनाई हैं। इनकी शार्ट फिल्म 'ए नाइट ऑफ नोइंग नथिंग' को साल 2021 74वें कांस फिल्म फेस्टिवल दी गोल्डन आई अवॉर्ड मिला। साल 2017 में इनकी फिल्म ‘ऑफ़्टरनून क्लाउड्स’ जो इकलौती इंडियन फिल्म थी, जिसे 70वें कांस फिल्म फेस्टिवल के चुना गया था। इन्होंने 'एंड व्हॉट इज द समर सेइंग', 'द लास्ट मैंगो बिफोर द मॉनसून' और 'वॉटरमेलन, फिश एंड द हाफ घोस्ट' जैसी शॉर्ट फिल्में बनाई हैं।

जब कॉलेज में किया प्रदर्शन, स्कॉलरशिप में हुई कटौती

पायल कपाड़िया की शॉर्ट फिल्म ‘ए नाइट ऑफ नोइंग नथिंग’ FTII पुणे में हुए छात्रों के प्रदर्शन पर बेस्ड थी। साल 2015 में चार महीने चले इन प्रदर्शन में पायल कपाड़िया एक प्रमुख चेहरा थीं। उन पर भी इंस्टीट्यूट ने एक्शन लिया। उनकी स्कॉलरशिप में कटौती की गई। पायल कपाड़िया ने तब इन प्रदर्शनों को लेकर कहा था, 'आप हड़ताल के लिए छात्रों को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते हैं। हड़ताल मौज मस्ती के लिए नहीं होती है। इसके लिए बहुत मेहनत और मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत होती है।'

भारत के लिए शानदार रहा 77वां कांस फिल्म फेस्टिवल

FTII पुणे के चिदानंद एस नायक की कन्नड़ फिल्म 'सनफ्लॉवर्स: वेयर द फर्स्ट वन्स टू नो' को 'ल सिनेफ' सिने फाउंडेशन सेगमेंट में बेस्ट फिल्म और इसी सेगमेंट में मानसी महेश्वरी की एनिमेटेड फिल्म 'बन्नी हुड' को तीसरा अवॉर्ड मिला। अन सर्टेन रिगार्ड सेमेंट में 'द शेमलेस' फिल्म में शानदार एक्टिंग के लिए अनसुइया सेनगुप्ता को बेस्ट एक्ट्रेस का अवॉर्ड मिला। भारत ने चार अवॉर्ड अपने नाम किए। इस जीत पर पूरा इंडियन सिनेमा जश्न मना रहा है। वहीं कांस फिल्म फेस्टिवल में भारतीय फिल्मों की बात करें तो साल 1983 में ग्रेट फिल्मकार मृणाल सेन की खारिज साल 1974 में एमएस सथ्यू की गर्म हवा, साल 1958 में सत्यजीत रे की परश पत्थर, साल 1953 में राज कपूर की आवारा, साल 1952 में वी शांताराम की अमर भूपाली और साल 1946 में चेतन आनंद की नीचा नगर भी कांस में तारीफें बटोर चुकी हैं।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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