Shabana Azmi की फिल्म 'Kissa Kursi Ka' ने हिला दी थी Indira सरकार, Sanjay Gandhi को जाना पड़ा था जेल

Home   >   रंगमंच   >   Shabana Azmi की फिल्म 'Kissa Kursi Ka' ने हिला दी थी Indira सरकार, Sanjay Gandhi को जाना पड़ा था जेल

51
views

फिल्में, जिन्हें समाज का आईना कहा जाता है. कई फिल्में महज मनोरंजन के लिए बनाई जाती है तो कई ऐसी होती है जो समाज की उस हकीकत को बयां करती है जिसे लोग देखना पंसद करते है. ऐसी ही एक फिल्म आई थी जिसका नाम था 'किस्सा कुर्सी का', इस फिल्म में ऐसी हकीकत को दर्शाया गया जिसके बाद सरकार ने इसे रिलीज होने से ही रोक दिया, हालांकि बाद में जब सत्ता बदली तो ये फिल्म रीलीज हुई थी.
दरअसल ये वो दौर था जब देश में इमरजेंसी लगी हुई थी. इसका असर बॉलीवुड फिल्मों में भी देखा गया. कहा जाता है कि उस वक्त इमरजेंसी के दौर में हर फिल्म को पहले सरकार देखती थी और बाद में रिलीज करती थी. ऐसा ही किस्सा कुर्सी का फिल्म के साथ हुआ, इसे देखने के बाद सरकार को लगा कि ये फिल्म संजय गांधी के ऑटो मेन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट का मखौल उड़ाती और सरकार की नीतियों को बदनाम करती है. जुलाई में सेंसर बोर्ड ने 51 आपत्तियां लगाते हुए जवाब मांगा. निर्देशक ने तर्क दिए लेकिन वे नकार दिए गए. फिल्म का निर्देशन अमृत नाहटा ने किया था.

 

बताया जाता है कि ‘किस्सा कुर्सी का’ भारतीय सिनेमा इतिहास की सबसे विवादास्पद फिल्म थी. इंदिरा गांधी सरकार हिलाने से लेकर इमरजेंसी के बाद हुए चुनावों में ये फिल्म बड़ा मुद्दा बनी. 1974 में अमृत नाहटा द्वारा बनाई गई इस फिल्म पर 1975 में रोक लगा दी गई. इसके प्रिंट भी जब्त कर उन्हें आग लगा दी गई थी. जिसको लेकर संजय गांधी को सजा भी हुई. रिपोर्ट्स की मानें तो 1977 में जनता पार्टी की सरकार आने पर संजय गांधी और वीसी शुक्ला पर आरोप लगा कि उन्होंने फिल्म के प्रिंट मुंबई से मंगवाकर गुड़गांव स्थित मारुति कारखाने में जलवा दिए थे. संजय गांधी को फिल्म के प्रिंट नष्ट करने का दोषी माना गया.

इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रशीद किदवई ने अपनी किताब ”नेता-अभिनेता: बॉलीवुड स्टार पावर इन इंडियन पॉलिटिक्स’ में लिखते हैं कि इस कमीशन ने ‘किस्सा कुर्सी का’ फिल्म को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को रेफर कर दिया. यहां तक कि संजय गांधी के इशारे पर इस फिल्म के सारे प्रिंट और रील तक जलवा दिये गए, ताकि कहीं कोई नामो-निशान न बचे. इमरजेंसी हटते ही लोकसभा चुनाव हुए और इंदिरा गांधी की कुर्सी चली गई. जनता पार्टी की सरकार बनी और इस सरकार ने आपातकाल के दौरान की गई मनमानियों की जांच के लिए शाह कमीशन का गठन कर दिया. इस कमीशन ने संजय गांधी को दोषी पाया. रशीद किदवई लिखते हैं कि मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा और उसने संजय गांधी को फिल्म का प्रिंट जलाने का दोषी पाया. उन्हें एक महीने तिहाड़ जेल में बिताना पड़ा.

 

आपको बता दें इमरजेंसी हटने के बाद डायरेक्टर ने 1977 में दोबारा फिल्म बनाई. हालांकि दूसरी बार बनी फिल्म में राज बब्बर ने काम नहीं किया. फिल्म में राज किरण, सुरेखा सीकरी और शबाना आजमी मुख्य भूमिकाओं में थे. शबाना आजमी गूंगी जनता का प्रतिनिधित्व कर रही थीं तो उत्पल दत्त गॉडमैन और मनोहर सिंह ऐसे नेता का रोल निभा रहे थे जो, अजब-गजब फैसले लेता था. छात्र जीवन से ही क्रांतिकारी विचारों के नाहटा ने भी एक बार लिखा था- ‘इंदिरा गांधी के रूप में देश को ऐसा पीएम मिला है, जिसका विश्वास नैतिकता में नहीं. उनके लिए परिणाम ही सबकुछ था, जिसे पाने के लिए साधन चाहे जैसे भी हों।’ उन्होंने राजनीति में एकाधिकार के खिलाफ आवाज उठाई. नाहटा 1977 के चुनाव में कांग्रेस छोड़कर जनता पार्टी में आ गए. वे पाली से लोकसभा के लिए चुने गए. साल 2001 में अमृत नाहटा का निधन हो गया. हालांकि उनके निर्देशन में बनी इस फिल्म की चर्चा अक्सर देखने सुनने को मिलती है. 

कानपुर का हूं, 8 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं, पॉलिटिक्स एनालिसिस पर ज्यादा फोकस करता हूं, बेहतर कल की उम्मीद में खुद की तलाश करता हूं.

Comment

https://manchh.co/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!