'Heeramandi' : मोहब्बत, सियासत और विरासत

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महाराजा रणजीत सिंह ने मुगल शाही रीति-रिवाजों को दोबारा से शुरू किया

12 अप्रैल, 1801 चेत सिंह की सेना को हराकर लाहौर की गद्दी पर आसीन हुए शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह। ब्रिटिश इतिहासकार जेटी व्हीलर अपने एक लेख में लिखते हैं कि 'महाराजा रणजीत सिंह ने पंजाब में कानून-व्यवस्था कायम की। कभी भी किसी को मौत की सजा नहीं दी। किसी पर भी सिख धर्म अपनाने के लिए दबाव नहीं डाला। वो खुद अनपढ़ थे पर शिक्षा और कला की तरफ ध्यान देने के लिए लोगों को प्रोत्साहन देते। इन्होंने मुगल शाही रीति-रिवाजों को भी दोबारा से शुरू किया।'

मुगल शाही रीति-रिवाज में तवायफों की संस्कृति भी शामिल थी

तवायफें - जो शाही दरबारों में अपनी कला पेश कर राजा-महाराजाओं का दिल बलहातीं। ध्यान देने वाली बात ये है कि, वेश्या होना और तवायफ होना। दोनों ही बात अलग-अलग हैं। सरबप्रीत सिंह अपनी किताब 'द कैमल मर्चेंट ऑफ फिलाडेल्फिया' में लिखते हैं, '13 साल की नाचने वाली एक मुस्लिम लड़की मोहरान पर महाराजा रणजीत सिंह का दिल आ गया। उन्होंने मोहरान के लिए शाही मोहल्ले के पास एक हवेली बनवाई।' इसके साथ ही महाराजा ने और भी तवायफों के रहने के इंतजाम किए।

हीरामंडी : ऐसे पड़ा नाम

तवायफों का मोहल्ला था। खूब भीड़-भाड़ रहती। यही वजह थी कि साल 1839 में महाराजा रणजीत सिंह के निधन के बाद उनके जनरल रहे हीरा सिंह डोगरा ने इसी मोहल्ले में एक अनाज मंडी शुरू की। ये जगह 'हीरा सिंह दी मंडी' के नाम से जानी गई और गुजरते वक्त के साथ इस जगह का नाम 'हीरामंडी' पड़ गया। 'हीरामंडी' इसी टाइटल से डायरेक्टर संजय लीला भंसाली ने एक वेब सीरीज बनाई है। उन्हें इस प्रोजेक्ट का आइडिया 14-15 साल पहले उनके दोस्त पत्रकार और लेखक मोईन बेग ने दिया था। वक्त जरूर लगा पर उन्होंने ये वेब सीरीज बनाई। जिसे जल्द ही नेटफ्लिक्स में देखा जा सकता है। 'हीरामंडी' कभी लाहौर की शान थी। अपनी तमीज और तहजीब के लिए जानी जाती थी। पर गुजरते वक्त के साथ 'हीरामंडी' की गलियां बदनाम हुईं और ये जगह वेश्याओं का अड्डा बना। वजह जानने के लिए 440 साल का  'हीरामंडी'   का पूरा इतिहास खंगालना पड़ेगा।

लड़कियों को अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान और काबुल से लाया जाता

15वीं और 16वीं शताब्दी, ये दौर मुगलों का था। मुगल अपने मनोरंजन के लिए अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान काबुल से लड़कियों को लाते थे। जो नाच-गाने से उनका दिल बहलातीं। दिल्ली के तख्त पर 1556 से 1605 तक बैठने वाले बादशाह अकबर एक अच्छे शासक होने के साथ-साथ संगीत और कला के प्रेमी थे। वो कलाकारों का बेहद सम्मान करते। लाहौर किले के पास एक शाही मोहल्ला हुआ करता था। जहां मुगल दरबार में शामिल अहम लोग रहा करते। अकबर ने साल 1584 के आसपास इसी शाही मोहल्ला के पास ही हवेलियां बनवाई जहां पर वो औरतें रहा करती थी जो दरबारों में परर्फाम किया करतीं।

रानियों से कम नहीं था रुतबा

बीबीसी उर्दू में छपे एक लेख में लेखक और नाटककार प्रोफेसर त्रिपुरारी शर्मा बताते हैं कि 'शाही दरबार में शायरी, संगीत, नृत्य और गायन पेश करने वालीं इन औरतों को तवायफ कहा गया। इन्हें अपनी कला में महारत हासिल थीं, इसलिए इन्हें बेहद इज्ज़त मिलती। तवायफों वो ओहदा था कि लोग अपने बच्चों को तहजीब सीखाने इन्हीं के पास भेजते। इनका रुतबा रानियों से कम नहीं था।'

अहमद शाह अब्दाली ने लाहौर में बनवाए वेश्यालय

करीब 164 सालों का वक्त गुजरा और इन तवायफों की शान-ओ-शौकत में कालिख लगने की शुरुआत होती है। सबसे पहले वजह बना - अहमद शाह अब्दाली। साल 1748 से 1767 तक अहमद शाह अब्दाली ने भारत पर आठ बार आक्रमण किया। उसकी चाहत थी हिंदुस्तान पर कब्जा। तब मुगल बादशाह अहमद शाह बहादुर थे। पर सिर्फ नाम के। दिल्ली से पहले रास्ते में लाहौर पड़ा। लाहौर पर हमला किया। तब लाहौर की गद्दी पर थे शाह नवाज। अहमद शाह अब्दाली ने लाहौर में वेश्यालय बनवाए। अफगानी सैनिक जहां भी हमला करते वहां की औरतों को उठा लेते और लाहौर के इन्हीं वेश्यालय में कैद कर देते। वक्त गुजरा और तवायफों का काम बंद हो गया। लोग वेश्यालयों में जाने लगे। तवायफों के रोजी-रोटी के लाले पड़े।

अंग्रेज सैनिक औरतों का करते थे शोषण

अफगानों के बाद लाहौर पर सिखों का राज हुआ। महाराजा रणजीत सिंह ने तवायफों की संस्कृति एक बार फिर शुरू की। वो इनको संरक्षण देते और गुजारे के लिए भत्ता देते। पर 1846 में लाहौर में अंग्रेजों का कब्जा हो गया। अंग्रेजों ने तवायफों को मिलने वाला भत्ता बंद कर दिया। अंग्रेज सैनिक इन औरतों का शोषण करते। अंग्रेजों ने तवायफों को प्रॉस्टिट्यूट का नाम दिया।

फिर हुई मुजरों की शुरुआत

पर 20वीं सदी की शुरूआत में तवायफों ने अपनी  'हीरामंडी'   की हवेलियों को रईसों को बेंचा। शर्त थी, वो उन लोगों को संरक्षण भी देंगे। अब ये तवायफें जिस्मफरोशी के लिए मजबूर नहीं थी। 'हीरामंडी' की गलियों में एक बार फिर नाच गाने का दौर आया। इस नाच गाने को मुजरा कहा गया। ये मुजरा देखने बड़े-बड़े इज्जतदार लोग आते। गुजरते वक्त के साथ 'हीरामंडी' – जगह लाहौर की शान बन गई। नूरजहां, खुर्शीद बेगम, बेगम अख्तर जैसे कलाकारों ने भी 'हीरामंडी' की हवेलियों में गाया है।

जिया उल हक ने लगाया मुजरों पर बैन

पर लाहौर की शान 'हीरामंडी' – एक बार फिर से वेश्यावृत्ति के लिए बदनाम हुआ। अब इसकी वजह था - तानाशाह जिया उल हक। साल 1947 - बंटवारे के बाद लाहौर पाकिस्तान के हिस्से में आया। कुछ वक्त तक तो तवायफों का पेशा चला। 1978 में जिया उल हक ने हीरामंडी में होने वाले मुजरों पर बैन लगा दिया। गुजरते वक्त के साथ 'हीरामंडी' की तवायफें वेश्यावृति में उतरीं और धीरे-धीरे ये इलाका बदनामी की अंधेरी गालियों में खोता चला गया। पाकिस्तान के लाहौर में बसा 'हीरामंडी' आज रेड लाइट डिस्ट्रिक्ट के नाम से मशहूर है।

'हीरामंडी - साहित्य का एक केंद्र'

संजय लीला भंसाली की वेब सीरीज 'हीरामंडी' में जिसमें मनीषा कोइराला, सोनाक्षी सिन्हा, अदिति राव हैदरी, ऋचा चड्ढा, शर्मिन सहगल और संजीदा शेख लीड रोल्स में हैं। पाकिस्तानी लेखिका फौजिया सईद अपनी किताब 'टेबो : द हेडन कल्चर ऑफ ए रेड लाइट एरिया' में लिखती हैं कि 'पहले हम ये सोचते थे कि 'हीरामंडी' की महिलाएं सिर्फ सेक्स वर्कर हैं। लेकिन जब मैंने वहां जाकर देखा तो हैरानी हुई क्योंकि 'हीरामंडी' साहित्य का एक केंद्र था। 'हीरामंडी' ने प्रसिद्ध लेखकों, कवियों और कलाकारों को जन्म दिया है।'

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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