Ibn Battuta : ...तो इसलिए भारत आया था, फिर जान बचाकर भागना पड़ा

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14 वीं सदी में सबसे बड़ा और रोमांचकारी यात्री इब्न बतूता (Traveller Ebn-Battuta) ने सिर्फ 28 की साल की उम्र में आधी से ज्यादा दुनिया का सफर तय किया। 30 सालों में 1,20,000 किमी का सफर किया।

 

पूरा नाम बेहद लंबा और कठिन

14वीं सदी में सबसे बड़ा और रोमांचकारी यात्री जिनका पूरा नाम इब्नबतूता मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह बिन मुहम्मद बिन इब्राहीम अललवाती अलतंजी अबू अबुल्लाह है। इतने लंबे नाम की तरह ही इन्होंने सिर्फ 28 की साल की उम्र में आधी से ज्यादा दुनिया का सफर तय किया। करीब 30 सालों में 120000 (एक लाख बीस हजार) किमी के सफर के दौरान वो कई देश गए। संतों और फकीरों से मिले। जिस भी देश गए वहां की संस्कृति को जाना और समझा। इन दौरान इन्होंने करीब 10 शादियां भी की। पहली शादी तो उस महिला से की, जो पहले से ही 10 बच्चों की मां थी।

दिल्ली से जान बचाकर भागना पड़ा?

अपनी यात्रा के दौरान भारत के बारे में अच्छा सुना तो इस देश को भी देखने की तमन्ना हुई। वो भारत आए। यहां दिल्ली के तख्त पर बैठे सुल्तान से मिले। दरबार में उन्हें शाही काजी का पद मिला। फिर ऐसा क्या हुआ? सुल्तान ही उन्हें खौफनाक सजा देना चाहते थे इस वजह से इब्नबतूता दिल्ली से जान बचाकर अपने देश भागने को मजबूर हो हुए।

21 साल की उम्र में हज करने मक्का-मदीना

तारीख थी 24 फरवरी और साल 1304। जगह - नॉर्थ अफ्रीका के शहर मोरक्को का तांजियर गांव। जहां इब्नबतूता का जन्म हुआ। बचपन से ही अपने धर्म से लगाव था इस वजह से दूसरे और मुस्लिम देशों में जाने उत्सुकता जागी। सबसे पहले 21 साल की उम्र में हज करने मक्का-मदीना गए। उन दिनों मोरक्को से हज की यात्रा करने के लिए करीब 16 महीने लग जाते थे। इब्नबतूता घर से निकले तो बोले ‘मैं करीब 16-17 महीने में लौट आउंगा।’ लेकिन वो 30 साल बाद लौटे। वो इस सालों में निकल गए थे दुनिया की सैर करने।

अफगानिस्तान के हिन्दू कुश के रास्ते भारत आए

वो मक्का मदीना के बाद इराकईरान, अफगानिस्तान जैसे कई मुस्लिम देशों में गए। इस दौरान उन्हें भारत के बारे में सुना। उन्हें मालूम पड़ा की भारत की सभ्यता और संस्कृति बेहद अच्छी है। उन्हें भारत में आने की दिलचस्पी पैदा हुई। वो अफगानिस्तान के हिन्दू कुश के रास्ते भारत आए। उस वक्त दिल्ली में मुस्लिम शासक मोहम्मद बिन तुगलक़ का शासन था। साल 1335 के करीब इब्न बतूता को सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक़ ने शाही शिकार और शाही भोज के लिए बुलावा भेजा और इस तरह से इब्ने बतूता दिल्ली के सुल्लान से मिले। इब्नबतूता ने इस शाही भोज का वर्णन करते हुए लिखा है कि 'शाही भोज में रोटी, गोश्त, घी और शहद में चुपड़े हुए केक, संबुसाक (समोसा), घी में पके हुए चावल और मिठाइयां थी।'

12 हजार दिनार की तनख्वाह पर शाही काजी का पद मिला

वो लिखते हैं कि 'उस वक्त भोज में शामिल लोगों ने खाने से पहले शरबत पीया और खाने के बाद खास तरह के अनाज जौ का पानी लिया।' सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक इब्न बतूता से इतने प्रभावित हुए कि 12 हजार दिनार की तनख्वाह पर दरबार में शाही काजी का पद दे दिया। इब्न बतूता ने सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के बारे में लिखा है कि, 'सुल्तान सबके लिए एक जैसे हैं। वो हर रोज किसी न किसी भिखारी को अमीर बना देते हैं। साथ ही हर रोज एक न एक आदमी को मृत्युदंड भी जरूर देते हैं। एक बार उन्होंने अपने ही किए पर खुद को 21 छड़ी से मार खाने की सजा दी थी।'

जब खुद के मारे जाने का शक हुआ

कहा जाता है कि, एक बार सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने एक सूफी संत को बुलावा भेजा तो संत ने आने से मना किया। इस बात को अपनी शान में गुस्ताखी देख सुल्तान ने संत का सिर धड़ से अलग करवा दिया। साथ ही रिश्तेदारों और दोस्तों की एक लिस्ट बनवाई। इस लिस्ट में इब्न बतूता का नाम भी था। तुगलक ने इब्न बतूता को तीन हफ्ते तक नजर बंद रहने की सजा दी। इस दौरान इब्न बतूता को शक हुआ अब सुल्तान उन्हें भी जान से मरवा देंगे। किसी तरह दिल्ली से निकलने की। पर हर बार नकामी मिली। फिर एक दिन मौका मिल ही गया।

30 साल बाद लौटा अपने देश

दरअसल इब्न बतूता ने सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक को सलाह दी कि उसे चीन के राजा के पास दूत भेजना चाहिए। इस बात पर सुल्तान राजी हुए। इब्न बतूता को चीन की तरफ रवाना कर दिया। आखिरकार इब्नबतूता 12 साल भारत में रहने के बाद यहां से सही सलामत निकल गया। फिर साल 1353 में मोरक्को अपने देश लौटे। अपनी मातृभूमि तंजियार में ही जिंदगी का आखिरी बिताया। साल 1368 में 64 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

इब्न बतूता पर लिखे गई कविता और गाना

इब्न बतूता के बारे में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने लिखा है,

'इब्नबतूता पहन के जूता, निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई, घुस गई थोड़ी कान में।
कभी नाक को, कभी कान को मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा उनके पैरों का जूता।
उड़ते-उड़ते जूता उनका जा पहुंचा जापान में
इब्न-बतूता खड़े रह गए मोची की दुकान में।'

साल 2010 में रिलीज हुई फिल्म इश्किया में भी गीतकार गुलजार में भी एक गाना लिखा है जिसमें इब्नबतूता का जिक्र किया है। 

'इब्‍नबतूता... बगल में जूता, पहने तो करता है चुर्र
उड़ उड़ आवे, दाना चुगे, उड़ जावे चिड़िया फुर्र'

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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