जेट एयरवेज़ के संस्थापक नरेश गोयल को मिली अंतरिम जमानत, जानिए Naresh Goyal और Jet Airways का सफर

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जेट एयरवेज एक वक्त भारत की सबसे बड़ी प्राइवेट एयरलाइंस में से एक थी और एयरलाइन को साउथ एशियाई देशों की सबसे बड़ी प्राइवेट एयरलाइन का दर्जा हासिल था. फिर कर्ज में दबे होने के चलते जेट एयरवेज 17 अप्रैल 2019 में ग्राउंडेड हो गई यानी कि संचालन बंद हो गया. जिसके बाद जेट एयरवेज के फाउंडर नरेश गोयल को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में नरेश को 1 सितंबर 2023 को गिरफ्तार किया गया था. कभी एविएशन इंडस्‍ट्री के बेताज बादशाह रहे गोयल बेहद बुरे दौर से गुजर रहे हैं. मनी लॉन्ड्रिंग केस में गिरफ्तारी के करीब 8 महीने बाद उन्‍हें बॉम्बे हाईकोर्ट से 2 महीने की अंतरिम जमानत मिल पाई है.
आज हम बताएंगे कि कैसे फ्लाइट्स की टिकट बेचने से लेकर, 300 रुपए महीने की पगार पर नौकरी करके नरेश गोयल एक एयरलाइन कंपनी के मालिक बने. नरेश गोयल के कंगाली से बुलंदी और बुलंदी से बर्बादी तक के सफर की पूरी कहानी...


वो दौर था साल 1965-67 का... पंजाब के संगरूर जिले में एक शहर है धुरी, जो कि CM भगवंत मान की विधानसभा सीट है, वहीं का रहने वाला, एक नौजवान आंखों में कुछ सपने लेकर दिल्‍ली पहुंचा. जिसका नाम था नरेश गोयल. पिता के गुजरने के बाद परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था तो पटियाला के बड़े व्‍यवसाई रिश्‍तेदार सेठ चरण दास ने मदद की और फिर नरेश गोयल दिल्‍ली चले गए. एविएशन सेक्‍टर में गोयल की एंट्री के पीछे भी सेठ चरण दास की भूमिका रही थी.


नरेश गोयल जब दिल्ली पहुंचे तो, वहां की बंगाली मार्केट में रहने लगे. उन दिनों दिल्‍ली में बरसाती का कल्‍चर था. एक कोठी की बरसाती में गोयल को भी जगह मिल गई. बरसाती, किसी कोठी के अपर फ्लोर पर बड़ी छत से जुड़ा एक कमरा होता था. गोयल वहीं रहने लगे. रोजगार की तलाश करने पर कुछ घंटे का होटल में काम मिला और दिन के बाकी समय में कस्तूरबा गांधी मार्ग पर मौजूद अंसल भवन में दास एयरलाइंस की टिकटें बेचने लगे. जिसका उन्हें हर महीने 300 रुपए मिलता था.


ऊंचे ख्वाब और आसमान में उड़ान भरने की चाहत रखने वाले नरेश गोयल ने अंसल भवन में बाकी एयरलाइंस के ऑफिसेस में जान पहचान बढ़ाई, तो कमाई भी बढ़ी. क्योंकि अब गोयल इराक और कुवैत एयरलाइंस की टिकटें भी बेचने के साथ ही चार्टर्ड फ्लाइट का काम भी करने लगे थे. शादी-समारोह, निजी काम, बिजनेस के लिए जिन्‍हें चार्टर्ड प्‍लेन की जरूरत होती, गोयल प्राइवेट कंपनियों में उनकी बुकिंग करवा देते. महीने में एक-दो बुकिंग भी हो गई तो वारे-न्‍यारे. जब कमाई ठीक-ठाक होने लगी तो उन्होंने कृष्णा मार्केट में घर ले लिया.


धीरे-धीरे चार्टर्ड प्लेन के धंधे में गोयल दिल्ली-बंबई अक्सर आने जाने लगे. बड़े-बड़े होटल्स में ठहरने के साथ ही, वहां बड़े लोगों से दोस्ती बढ़ाने लगे. साल 1967 से 1974 तक उन्होंने कई विदेशी एयरलाइन्स के साथ एसोसिएशन के जरिए ट्रैवल बिजनेस की बारीकियां सीखीं. और फिर साल 1974 में उन्होंने पत्नी अनीता गोयल के साथ मिलकर खुद की ट्रैवल एजेंसी शुरु की, जिसका नाम रखा जेट एयर. गोयल की कंपनी देश में विदेशी एयरलाइंस को सेल्‍स और मार्केटिंग रिप्रेजेंट करने लगी और फ्रांस और कैथे पैसिफिक जैसी कुछ बड़ी कंपनियों के लिए काम किया.


फिर आया आर्थिक उदारीकरण का दौर. जब सरकार ने प्राइवेट एयरलाइन्‍स को ओपन स्‍काईज पॉलिसी के तहत सेवाएं शुरू करने की अनुमति दी. इसी दौर में जेट एयरवेज भी अस्तित्‍व में आई और 5 मई 1993 से एयरलाइन का दो विमानों बोइंग 737 और बोइंग 300 से कमर्शियल ऑपरेशन शुरू हुआ. उस समय कंपनी को गल्‍फ एयर और कुवैत एयरवेज का सपोर्ट था, जिनकी कंपनी में 40% हिस्‍सेदारी थी. उसी दौर में ईस्‍ट-वेस्‍ट एयरलाइंस, दमानिया एयरवेज, सहारा इंडिया एयरलाइंस और मोदीलुफ्त जैसी एयरलाइंस भी अस्तित्‍व में आईं. हालांकि कुछ साल के भीतर ही सहारा को छोड़ बाकी तीन एविएशन सेक्‍टर से गायब हो गईं. इसी दौर में टाटा ग्रुप और सिंगापुर एयरलाइंस के बीच ज्‍वाइंट वेंचर प्रस्‍तावित था. दोनों संयुक्‍त रूप से सरकारी एयरलाइंस में 40% हिस्‍सेदारी लेने के करीब थे. लेकिन कुछ राजनीतिक हलकों और ट्रेड यूनियनों के हंगामे ने इसे फेल कर दिया. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इसके पीछे नरेश गोयल का ही हाथ बताया जाता है.
इन्‍हीं घटनाक्रमों के बीच साल 2007 में नरेश गोयल ने 2,200 करोड़ रुपये में एयर सहारा का अधिग्रहण किया. ये उनकी बड़ी गलती साबित हुई. एविएशन मार्केट एक्‍सपर्ट्स का मानना था कि एयर सहारा के लिए ये वैल्‍यूएशन कहीं ज्‍यादा है. दूसरी ओर जेट एयरवेज ने बोइंग और एयरबस से करीब 2 दर्जन वाइड बॉडी विमानों का ऑर्डर दे दिया. कंपनी तेजी से इंटरनेशनल रूट्स के लिए आवेदन कर रही थी, जबकि लंबी दूरी की उड़ानों के लिए न ही कर्मियों के पास पर्याप्‍त एक्‍सपर्टीज थी, न ही उन्‍हें पर्याप्‍त प्रशिक्षण मिला था. फिर साल 2008 में वैश्विक तेल की बढ़ती कीमतों के बीच फेयर प्राइस वॉर भी शुरू हो गया. जेट फ्यूल, जो ऑपरेटिंग कॉस्‍ट का 40% से अधिक होता है, वो महंगा पड़ रहा था. दूसरी ओर वैश्विक मंदी में हवाई यात्रा की मांग भी कम होने लगी थी.


आर्थिक चुनौतियों से जूझ रही जेट एयरवेज और किंगफिशर ने ज्यादा कर्ज लिया. साल 2012 में आखिरकार किंगफिशर को अपना कारोबार बंद करना पड़ा. इस दौरान जेट एयरवेज की हालत भी ठीक नहीं थी. साल 2015-17 के बीच फ्यूल की कीमतें कम रहीं और गोयल को सपोर्ट भी मिला, लेकिन 2018 आते-आते चीजें बदतर होती चली गईं. जेट एयरवेज को सबसे ज्‍यादा कर्ज SBI ने दे रखा था. ऐसे में उसके नेतृत्‍व वाले बैंक कंसोर्टियम ने इमरजेंसी फंड इन्‍वेस्‍टमेंट के रिक्‍वेस्‍ट को रिजेक्‍ट कर दिया. एक साल से ज्‍यादा समय तक घाटे में रहने और भारी कर्ज के बोझ के चलते जेट एयरवेज का संचालन अप्रैल 2019 में बंद हो गया. वित्तीय गड़बड़झालों के चलते नरेश गोयल CBI, इनकम टैक्‍स डिपार्टमेंट, SFIO और ED की जांच के दायरे में आ गए.


नरेश गोयल ने मई, 2019 में जब चेयरमैन पद छोड़ा, उस वक्त जेट एयरवेज पर केनरा बैंक का 538.62 करोड़ रुपये का लोन बकाया था. केनरा बैंक ने आरोप लगाया था कि जेट एयरवेज की फोरेंसिक ऑडिट में 'रिलेटेड कंपनियों' को 1,410.41 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए जाने का पता चला है. गोयल परिवार पर आरोप लगे कि वो पर्सनल खर्च के लिए जेट एयरवेज के अकाउंट से पैसे निकालते थे. बॉम्बे हाईकोर्ट ने 6 मई को नरेश गोयल को अंतरिम जमानत दे दी है. पत्‍नी के स्‍वास्‍थ्‍य कारणों का हवाला देते हुए गोयल ने कोर्ट से जमानत की गुहार लगाई थी. अब वो 2 महीने जेल से बाहर रहेंगे.


दूसरी ओर, नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के बैंकरप्सी रेजोल्यूशन प्रोसेस के तहत जालान-कालरॉक कंसोर्टियम ने जेट एयरवेज की बोली जीती थी, लेकिन अब तक एयरलाइन शुरू नहीं हो पाई है. जून 2021 के बाद से ही ये प्रक्रिया चल रही है. ये कंसोर्टियम मुरारी लाल जालान और कालरॉक कैपिटल की जॉइंट कंपनी है. जालान दुबई बेस्ड बिजनेसमैन हैं, जबकि कालरॉक लंदन बेस्ड ग्लोबल फर्म है.

 
 

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