Space में 100 से ज्यादा टुकड़ों में टूटी Russian satellite, कहां जाता है इसका कचरा ?

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Space में 100 से ज्यादा टुकड़ों में टूटी Russian satellite, कहां जाता है इसका कचरा ?
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स्पेस मिशन की शुरुआत से लेकर अब तक सारे देशों ने बहुत सारी सफलता-असफलता देखी. दोनों ही बातों के दौरान एक चीज कॉमन रही- स्पेस में कूड़े का बढ़ना. कई बार सैटेलाइट खराब हो गए, कई बार हादसे का शिकार हुए, कई बार अचानक उन्होंने काम करना बंद कर दिया. कई सैटेलाइट रॉकेट बूस्टर के साथ जाते हैं, जो बाद में स्पेस में छोड़ दिए जाते हैं. एंटी सैटेलाइट (ASAT) वेपन भी कचरा फैला रहे हैं. ये वो रॉकेट हैं, जो लो-अर्थ ऑर्बिट पर रहते हुए सैटेलाइट्स को खत्म करने के लिए भेजे जाते हैं. अब तक अमेरिका, रूस, भारत और चीन भी ASAT भेज चुके. ये सैटेलाइट को खत्म करते हैं, इस दौरान स्पेस में उसका कचरा फैल जाता है.


अंतरिक्ष में सबसे ज्यादा कचरा फैलाने वाले देश रूस और अमेरिका हैं. ताजा मामला रूस की सैटेलाइट RESURS-P1 के तबाह होने का है. जिससे अब इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) पर भी खतरा पैदा हो गया है. सैटेलाइट के 100 से ज्यादा टूटे हुए हिस्से अर्थ के ऑर्बिट में तेज रफ्तार में घूम रहे हैं और ये रफ्तार हमारी आपकी सोच से कई ज्यादा होती है. 1 सेंटीमीटर छोटा टुकड़ा भी करीब हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से घूमता रहता है. ऐसे में अगर वो किसी सैटेलाइट से टकराए तो गंभीर नुकसान हो सकता है. ऐसा हो भी चुका है. साल 2021 में चीनी वेदर सैटेलाइट का जंक इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से टकरा गया था. इससे ISS में एक छेद हो गया था. ये नुकसान काफी बड़ा भी हो सकता है.


ऐसे में साइंटिस्ट्स को चिंता है कि इन टुकड़ों से ISS के साथ ही अर्थ ऑर्बिट में मौजूद बाकी सैटेलाइट को नुकसान हो सकता है. हालांकि, RESURS-P1 के टूटने की क्या वजह रही, इसकी अब तक पुष्टि नहीं हुई है. लेकिन साल 2022 में इस सैटेलाइट को डेड घोषित कर दिया था. इससे सवाल खड़ा होता है कि पुरानी सैटेलाइट के संचालन को लेकर क्या नियम हैं


बाकी सभी चीजों की तरह, सैटेलाइट भी हमेशा के लिए नहीं रहते. उनके पास सीमित ईंधन है और बाहरी स्पेस की हार्ड कंडीशन्स उन्हें डैमेज़ कर सकती हैं. इसको ध्यान में रखकर यूनाइटेड नेशन ने साल 2007 में कुछ गाइडलाइन्स जारी की थीं. जिसके मुताबिक, जो सैटेलाइट पृथ्वी के करीब चक्कर लगा रही है, उसे ऊपर से नीचे के ऑर्बिट ले जाया जाता है. ताकि ये 25 सालों के अंदर ही नैचुरली Atmosphere में फिर से एंटर कर सके. इसे '25 Year Rule' भी कहा जाता है. जैसे ही सैटेलाइट वापस अर्थ की तरफ गिरना शुरू करेगा. एयर के फ्रिक्शन से निकलने वाली हीट सैटेलाइट को जला देगी, जिससे वो सरफेस तक पहुंचने से पहले ही खत्म हो जाएगा.


25 Year Rule को लेकर एक गाइडलाइन का खास ध्यान रखा जाता है. अगर जांच में पाया जाता है कि सैटेलाइट से चोट या संपत्ति के नुकसान की संभावना 10,000 में 1 से भी कम है, तो उसे धरती पर ऐसे ही गिरा दिया जाता है. लेकिन नुकसान की संभावना ज्यादा होती है, तो ‘कंट्रोल्ड डीऑर्बिट’ करने की जरुरत होती है. इसमें इंजीनियर सैटेलाइट के बचे हुए ईंधन का इस्तेमाल इसे धीमा करने और दिशा देने में करते हैं, जिससे वो अपने ऑर्बिट से बाहर निकालकर प्रशांत महासागर में गिर जाता है. जिसे पॉइंट निमो कहते हैं.


खराब हो चुके सैटेलाइट्स को धरती पर लौटाकर पॉइंट निमो में जमा किया जा रहा है. प्रशांत महासागर में दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच स्थित इस जगह को समुद्र का सेंटर भी माना जाता है. यहां से जमीन के टुक़़े या आबादी तक पहुंचना आसान नहीं. अंग्रेजी में इसे ओशनिक पोल ऑफ इन एक्सेसिबिलिटी (Oceanic Pole Off In Accessibility) भी कहते हैं, यानी समुद्र के बीच वो जगह, जहां पहुंचा ही नहीं जा सकता.


यहां से चारों ओर कम से कम हजार मील की दूरी तक समुद्र ही पसरा हुआ है. अब तक यहां 100 से ज्यादा सैटेलाइट्स का कबाड़ जमा हो चुका और साल 2031 में जब इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन खत्म होने लगेगा, तब उसे भी निमो पर ही फेंका जाएगा. इसका नाम जूल्स वर्ने की किताब ‘ट्वेंटी थाउजेंड लीग्स अंडर द सी’ के फेमस submarine sailor के नाम पर रखा गया है. इस पॉइंट पर साल 1970 से अब तक 300 से ज्यादा सैटेलाइट को डुबाया जा चुका है. 2031 में रिटायर होने के बाद अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) को भी यहीं पर डुबाने का प्लान है. इस सब की वजह से पॉइंट निमो को ‘अंतरिक्ष यान कब्रिस्तान’ के तौर पर भी जाना जाता है.


फिलहाल अंतरिक्ष में इस समय रूस के 7032, अमेरिका के 5216, चीन के 3854, फ्रांस के 520, जापान के 117 और भारत के 114 सैटेलाइट्स और रॉकेट्स हैं. नासा के मुताबिक, भारत के 206 टुकड़े हैं. इनमें 89 टुकड़े पेलोड और 117 टुकड़े रॉकेट के हैं. जबकि भारत से लगभग 20 गुना ज्यादा मलबा चीन का है, उसके लगभग 3,987 टुकड़े अंतरिक्ष में घूम रहे हैं. ये ऑब्जेक्ट 0.11 सेमी से कई मीटर तक बड़े हो सकते हैं. अगर एक भी ऑब्जेक्ट कहीं गिरा तो वहां भारी तबाही मचा सकता है. 10 सेंटीमीटर या उससे बड़े आकार के 1 मिलियन ऑब्जेक्ट हैं, जो धरती के आसपास घूम रहे हैं. वहीं 1 से 9 सेंटीमीटर तक के 130 मिलियन से भी ज्यादा ऑब्जेक्ट हैं. ये रॉकेट का कूड़ा भी हो सकते हैं, पेंट भी, और मल-मूत्र भी. भले ही इनका आकार छोटा हो, लेकिन ये बंदूक की गोली से भी तेजी से घूम रहे हैं. इससे ऑर्बिट में कोई बड़ा खतरा भी आ सकता है.


सभी सैटेलाइट वायुमंडल में आसानी से नहीं जल सकते. कुछ सैटेलाइट पृथ्वी के काफी ऊपर होती हैं. इनको धीमा करने के लिए बहुत ज्यादा ईंधन की जरूरत होती है, जिससे उनके मिशन लाइफ में काफी कमी आएगी. इसलिए, इस तरह के सैटेलाइट को पृथ्वी पर बुलाने की बजाय अंतरिक्ष की ‘कब्रिस्तान ऑर्बिट’ तक ले जाया जाता है. ये सैटेलाइट अपने आखिरी समय में ईंधन जलाते हैं और पृथ्वी से 22,400 माइल्स की ऊंचाई पर जाते हैं. ये ऑर्बिट एक्टिव सैटेलाइट के ऑर्बिट से 300 किलोमीटर की ऊंचाई पर होता है. एक बार जब सैटेलाइट ‘कब्रिस्तान ऑर्बिट’ में पहुंच जाता है, तो उसका सिस्टम बंद हो जाता है. बचा हुआ ईंधन खत्म हो जाता है और लंबे समय तक वो उसी ऑर्बिट में घूमते रहते हैं.


आउटर स्पेस ट्रीटी ऑफ 1967 कहता है कि चंद्रमा या स्पेस के किसी भी हिस्से पर किसी व्यक्ति या देश का अधिकार नहीं. इसका नतीजा ये हुआ कि अंतरिक्ष जा तो कई देश रहे हैं, लेकिन कोई भी इसकी सफाई की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता. यही देखते हुए यूनाइटेड नेशन्स ने सभी कंपनियों से कहा कि वे अपना मिशन खत्म होने के 25 साल के भीतर अपना क्रिएट किया हुआ जंक हटा दें. देश अपने खत्म या खराब हो चुके सैटेलाइट को स्पेस में ही खत्म करने की बजाए धरती पर ला रहे हैं.
नासा ने आर्टेमिस अकॉर्ड्स भी तैयार किया, जिसमें स्पेस को साफ-सुथरा और पीसफुल बनाए रखने की बात है. 28 देशों ने इसपर दस्तखत भी कर दिए. रूस और चीन अब भी इसका हिस्सा नहीं बने हैं. और सबसे बड़ी परेशानी ये है कि प्राइवेट कंपनियां भी इसमें शामिल नहीं. ऐसे में स्पेस के कबाड़ को कम करना जरा मुश्किल ही दिख रहा है.

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