महादेव की नगरी क्यों कहलाती है काशी और बनारस, वाराणसी के नामों का इतिहास क्या है ?

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भारत अपने समृद्ध इतिहास और संस्कृति के लिए दुनियाभर में जाना जाता है. यहां कई ऐसी धरोहरें हैं, जो अतीत की झलक दिखलाती हैं. इसके अलावा यहां मौजूद शहरों का भी अपना अलग इतिहास है. भारत में कई ऐसे शहर हैं, जो 100- 200 नहीं, बल्कि हजारों साल पुराने हैं. भगवान शिव की नगरी वाराणसी इन्हीं शहरों में से एक है. पौराणिक कथाओं और अनेक धर्म ग्रंथों में इस बात का उल्लेख है कि ये शहर पवित्र सप्तपुरियों में से एक है. स्कन्द पुराण, रामायण, महाभारत, ऋग्वेद जैसे  ग्रंथ इस शहर की मौजूदगी के गवाह हैं. अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन ने लिखा है कि बनारस इतिहास से भी पुराना है. परंपराओं से भी पुरातन है. उन्होंने इसे किंवदंतियों से भी प्राचीन होने की संज्ञा दी है. वाराणसी का महिमामंडन प्राचीन धार्मिक ग्रंथों से लेकर आधुनिक काल के इतिहासकारों तक ने किया है. इसे कभी काशी कहा गया तो कभी बनारस और अब वाराणसी के नाम से जाना जाता है. काशी का इतना माहात्म्य है कि सबसे बड़े पुराण स्कन्दमहापुराण में काशीखण्ड के नाम से एक विस्तृत पृथक विभाग ही है। जिनमें काशी के बारह प्रसिद्ध नाम- काशी, वाराणसी, अविमुक्त क्षेत्र, आनन्दकानन, महाश्मशान, रुद्रावास, काशिका, तप:स्थली, मुक्तिभूमि, शिवपुरी, त्रिपुरारिराजनगरी और विश्वनाथनगरी हैं.


स्कंदपुराण के मुताबिक, भगवान शिव ने काशी को सबसे पहले आनंद वन की संज्ञा दी और फिर अविमुक्त क्षेत्र कहा. इस नगरी का नाम अविमुक्त इसलिए पड़ा क्योंकि शिव ने इसे कभी छोड़ा नहीं. स्कंदपुराण में इसे आनंदकानन भी कहा गया है, क्योंकि शिव कैलाश पर चले गए फिर भी अपने प्रतीक के रूप में यहां विश्वनाथ शिवलिंग छोड़ गए. वहीं, काशी शब्द काश से आया है, जिसका मतलब है चमकना. यानी काशी शब्द का मतलब है प्रकाश देने वाली नगरी.


यानी जिस स्थान से ज्ञान का प्रकाश चारो दिशाओं में फैलता है, उसको काशी कहते हैं. ऐसा माना जाता है कि काशी में निधन होने पर जीव को मोक्ष मिलता है. इसका आशय ये है कि निर्वाण के रास्ते को प्रकाशित करने के कारण इसका नाम काशी पड़ा. एक मान्यता ये भी है कि हरिवंश पुराण में काशी को बसाने का श्रेय भरतवंशी राजा काश को दिया गया है. कि राजा काश के नाम पर इसका नाम काशी पड़ा.
इस शहर के कई और नाम भी सामने आते हैं. इनमें यहां बोली जाने वाली भाषा काशिका के नाम पर इसका नाम काशिका भी है. इसके अलावा इसे महाश्मशान, मुक्तिभूमि, रुद्रावास, तपःस्थली, त्रिपुरारिराजनगरी, शिवपुरी और विश्वनाथनगरी भी कहा जाता है. मंदिरों की अधिकता के कारण इसे मंदिरों का शहर की संज्ञा दी गई. काशी को धार्मिक राजधानी, भगवान शिव की नगरी, ज्ञान नगरी और दीपों का शहर कहकर भी पुकारा जाता है.


मत्स्यपुराण के मुताबिक, काशी में बाबा विश्वनाथ धाम के अलावा पांच और प्रमुख तीर्थ बताए गए हैं. इनमें दशाश्वमेध, लोलार्क, केशव, बिन्दुमाधव और मणिकर्णिका शामिल हैं. आधुनिक काल के प्रमुख पंचतीर्थों में असि और गंगा का संगम, दशाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका, पंचगंगा घाट और वरुणा-गंगा का संगम प्रमुख हैं. मणिकर्णिका को ही मुक्तिक्षेत्र भी कहा जाता है. इसे वाराणसी के धार्मिक जीवन का केंद्र माना जाता है और यहां के सभी तीर्थों में इसे सबसे उच्च माना गया है. मान्यता है कि एक बार शिवशंकर का कर्णाभूषण काशी में गिर गया था. जिस स्थान पर वो गिरा, उसी का नाम कालांतर में मणिकर्णिका पड़ गया.


इसके अलावा, इस प्राचीन शहर का नाम बनारस पड़ने के पीछे एक बात ये भी कही जाती है कि महाभारत में भी बनारस का जिक्र कई बार हुआ है. पाली भाषा में इसे बनारसी कहा जाता था, जो बाद में बदलकर बनारस हो गया. तो वहीं, कुछ जानकार बताते हैं कि इसका नाम बनार राजा के नाम पर बनारस पड़ा. बनार राजा के बारे में कहा जाता है कि वो मोहम्मद गौरी के हमले में मारे गए थे. इसके अलावा एक और कहानी है कि इस शहर की रंग-बिरंगी जीवनशैली को देखकर मुगलों ने इसका नाम बनारस रखा था. ये नाम मुगलों से लेकर अंग्रेजों के शासनकाल तक चला. हालांकि, आज भी लोगों के जेहन में ये नाम बसा हुआ है.


बनारस को आधुनिक समय में वाराणसी नाम से जाना जाता है और सामान्य मान्यता है कि दो नदियों वरुणा और असि के बीच बसे शहर को वाराणसी कहा जाता है. जानकार बताते हैं कि कुछ पुराणों में भी इस शब्द की उत्पत्ति का जिक्र इसी रूप में मिलता है कि ये शहर वरणा या वरुणा और असि नाम की दो धाराओं के बीच स्थित है. वाराणसी में वरुणा उत्तर में गंगा से मिलती है. वहीं, असि नदी की मुलाकात दक्षिण में गंगा से होती है. बौद्ध जातक कथाओं में भी वाराणसी का उल्लेख किया गया है.
साथ ही काशी का साहित्य में बहुत बड़ा योगदान है. नाम गिनाएं तो सुबह से शाम हो सकती है. पर, गोस्वामी तुलसी दास से लेकर कबीर, रविदास, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद का नाम लिए बिना बनारस को अधूरा माना जाएगा. काशीनाथ सिंह, नामवर सिंह जैसे अनेक मूर्धन्य साहित्यकार-आलोचक इसी धरती से आते रहे हैं. नई पीढ़ी भी इस साहित्यिक यात्रा को बखूबी बढ़ा रही है.

 

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