Abbas Tyabji : आजादी की लड़ाई लड़ने वाले एक 'गुमनाम हीरो' की कहानी

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अमेरिका के बॉस्टन चाय पार्टी विद्रोह की तरह ही जब गांधीजी साल 1930 में नमक पर टैक्स न देने के लिए दांडी मार्च करने की तैयारी कर रहे थे। इस यात्रा में जाने के लिए 70 लोगों की सूची बनाई गई जिसमें एक नाम था ‘अब्बास भाई’। जब गांधीजी ने 76 साल के ‘अब्बास तैयबजी’ को आते देखा तो उन्हें अचरज हुआ।

गांधीजी तैयबजी से बड़ी मोहब्बत से मिले। गांधी जी ने पूछा कि –कहिए, कैसे आना हुआ.’

तैयबजी बोले – आंदोलन में साथ चलने के लिए आए हैं.’

मारे आश्चर्य के गांधीजी ने नाराजगी व्यक्त करते हुए, लेकिन, प्यार से तैयबजी से कहा - तैयबजी, आपको अपनी उम्र का लिहाज करना चाहिए। 76 साल की उम्र में आप यात्रा में जाना चाहते हैं?’

अब गांधीजी की ये बातें सुनकर तैयबजी सकुचाये, कहा कि – मैंने यात्रा में शामिल होने वाले 70 लोगों की सूची में अपना नाम देखा, तो बड़ी खुशी हुई। इसीलिए मैं चला आया.’

माजरा समझकर गांधीजी बोले – मेरे आश्रम में 20 साल का लड़का है, उसका नाम ‘अब्बास भाई’ है, आपका नाम है ‘अब्बास तैयबजी’, अब आप नहीं, ‘अब्बास भाई’ मेरे साथ जाएगा.’

गांधी जी की ये बात सुनकर तैयबजी अड़ गए, बोले - ‘नहीं, मैं ही साथ चलूंगा.’

तैयबजी, दांडी यात्रा में गांधी जी के साथ गए की नहीं। उससे पहले ये कि ये 76 साल के ये तैयबजी थे कौन।

अब्बास तैयबजी का जन्म 01 फरवरी, साल 1854 को गुजरात के वडोदरा में हुआ था। संपन्न परिवार से ताल्लुक रखने वाले तैयबजी ने इंग्लैंड से वकालत की और वेस्टर्न संस्कृति से प्रभावित हुए।

तैयबजी के भतीजे डॉ सलीम अली ने अपनी बायोग्राफी में लिखा है कि ‘अब्बास तैयबजी, अंग्रेजी तौर-तरीकों से रहते थे। सूट-बूट और टाई जो अंग्रेजी कल्चर की पहचान है। अब्बास तैयबजी की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थे।’

तैयबजी जब पढ़ाई करने के बाद भारत लौटे तो कुछ साल वकालत की प्रैक्टिस की और एक दिन बड़ौदा रियासत के हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस बन गए। तैयब जी को कतई पसंद नहीं था कि, कोई भी अंग्रेजी हुकूमत या रानी के खिलाफ कुछ भी कहे। इसी ठाठबाट में तैयबजी का बचपन और जवानी गुजर गई लेकिन, जब 60 की उम्र के आसपास पहुंचे तो उनके विचारों में परिवर्तन आया। इसके पीछे वजह थे उनकी उम्र से 15 साल छोटे गांधीजी।

साल 1915, जब गांधीजी साउथ अफ्रीका से लौटे थे। गांधीजी से सैंकड़ों लोग मिलने आए उनमें से एक तैयबजी भी थे। तैयबजी कांग्रेस की विचारधारा से तो इत्तेफाक नहीं रखते। लेकिन गांधी की बातों से प्रभावित थे।

13 अप्रैल, साल 1919 को जलियांवाला बाग में ब्रिटिश फौज ने हजारों लोगों पर गोलियां बरसा दीं। इस घटना की जांच के लिए कांग्रेस ने एक कमेटी बनाई, जिसका अध्यक्ष तैयबजी को बनाया गया। जांच करते वक्त तैयबजी को जनरल डायर के वहशीपन ने अंदर तक हिलाकर रख दिया था।

इसके बाद से ही तैयबजी गांधीजी के अनुयाई बने। उन्होंने गांधीवाद को अपना लिया। अपने कपड़े आग के हवाले कर दिए। पैंट-शर्ट की जगह खादी और पैरों में जूते की जगह चप्पल आ गईं।

साल 1930, गांधीजी दांडी यात्रा शुरू की तब 76 साल के तैयबजी भी उसने मिलने गए। गांधीजी को लगा यात्रा पर जाने से पहले तैयबजी उन्हें विदा करने आए हैं। लेकिन तैयबजी इस यात्रा में शामिल होने आए थे।

फेमस राइटर लुई फिशर ‘द लाइफ ऑफ गांधी’ में लिखते हैं कि, तैयबजी की उम्र को देखते हुए गांधीजी ने मना किया। लेकिन, जब तैयबजी यात्रा में जाने के लिए अड़ गए। तो गांधीजी ने कहा कि, यात्रा के दौरान जब मैं गिरफ्तार कर लिया जाउंगा। तब तैयबजी इस आंदोलन की कमान संभालेंगे।’

चार मई, साल 1930 को गांधीजी धरसाना से गिरफ्तार हो गए। फिर तैयबजी ने मोर्चा संभाला और कस्तूरबा गांधी के साथ गिरफ्तार हुए। तीन महीने की सजा हुई। 76 साल के तैयबजी के लिए जेल जाना, आसान नहीं था। जिसने जज रहते हुए तमाम गुनहगारों को जेल का दरवाजा दिखाया हो।

जेल में रहने के दौरान तैयबजी की तबीयत बिगड़ी। जिससे फिर वो कभी उभर नहीं पाए। जिंदगी के आखिरी पलों तक अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते रहे। 9 जून, 1936 को 82 साल की उम्र में तैयबजी दुनिया छोड़कर चले गए।

20 जून, साल 1936 को गांधीजी ने अब्बास तैयबजी की याद में एक पत्र में लिखा। जिसमें वो तैयबजी को ‘ग्रांड ओल्ड मैन ऑफ गुजरात’ कहते।

मैं तैयबजी से 1915 में पहली बार मिला। तैयबजी का इस्लाम हर धर्म को समाहित करता है। जज होकर भी कैद में रहना, एशो आराम छोड़ना इनके लिए मामूली बात नहीं थी। कोई भी काम आधे अधूरे मन से नहीं करते। तैयबजी, मानवता के सच्चे सेवक थे।

सैकड़ों क्रांतिकारियों की तरह तैयबजी की कुर्बानियों को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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