Actor Ashok Kumar : जिंदगी के आखिरी 14 साल अपनी जन्मदिन की तारीख को कोसा

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अशोक कुमार के पास खूबियां ही खूबियां थीं। अच्छे पेंटर थे। कई भाषाओं के जानकार थे। होम्योपैथी की बढ़िया नॉलेज रखते। कई कलाकार दवा भी लेते। इन्हें गाड़ियों का शौक था। पहले स्टार थे जिनके पास रोल्स रॉयस थी। पर एक प्रेम-कहानी न होती तो शायद अशोक कुमार न होते।

साल 1946, ये वो वक्त था जब राजकपूर बड़े स्टार नहीं थे। इसी साल मई के महीने में राज कपूर की शादी हो रही थी।

फिल्मी किस्सों के मुताबिक कार्यक्रम के बीच शादी में "शोर मचा, शादी में अशोक कुमार आए हैं। वो अशोक कुमार, जिनको इंडस्ट्री में आए हुए करीब 10 साल हो चुके थे और इस दौरान उनकी ‘शिकारी’ फिल्म भी रिलीज हुई थी। अशोक कुमार का स्टारडम ही था कि दुल्हन यानी राज कपूर की पत्नी कृष्णा कपूर भी अपना घूंघट हटाकर उन्हें देखे बिना नहीं रह पाईं। कृष्णा कपूर ने घूंघट हटाया तो सभी लोग तरह-तरह की बातें बनाने लगे। राज कपूर भी इसी के चलते पत्नी कृष्णा कपूर से कई दिनों तक खफा रहे।"

फिल्मी पेशे को समाज में सम्मानजनक बनाने वाले हिंदी सिनेमा के दिग्गज एक्टर अशोक कुमार जिन्होंने 63 साल के करियर में 300 से ज्यादा फिल्में की। इसलिए सबसे लंबे बॉलीवुड करियर के लिए अशोक कुमार का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है। राज कपूरदेव आनंद और दिलीप कुमार जैसे स्टार अशोक कुमार को न सिर्फ देखकर बड़े हुए बल्कि उनसे प्रभावित हुए।

वो अशोक कुमार जिनके पास खूबियां ही खूबियां थीं। अच्छे पेंटर थे। कई भाषाओं के जानकार थे। होम्योपैथी की बढ़िया नॉलेज रखते। कई कलाकार दवा भी लेते। इन्हें गाड़ियों का शौक था। वो पहले स्टार थे जिनके पास रोल्स रॉयस थी।

आज अशोक कुमार की कहानी सुने। इससे पहले एक अधूरे प्यार का किस्सा सुनना बेहद जरूरी है। क्योंकि ये प्रेम-कहानी न होती तो शायद अशोक कुमार न होते।

ये 30 का दशक था। जब ‘बॉम्बे टॉकीज’ के मालिक फिल्मकार हिमांशु राय, खुद हीरो बनते और अपनी बेहद खूबसूरत पत्नी देविका रानी को बतौर हीरोइन लेते। पर साल 1935 की फिल्म ‘जवानी की हवा’ में इन्होंने देविका रानी को तो हीरोइन लिया पर हीरो नया चेहरा लेकर आए, जिनका नाम था नज्म-उल-हसन। लखनऊ के नज्म-उल-हसन में हर वो बात थी कि कोई भी लड़की उन पर फिदा हो जाए।

फिल्म की शूटिंग के दौरान देविका रानी भी नज्म-उल-हसन के प्यार में पड़ीं। वो दोनों एक-दूसरे को चाहने लगे। पर इस बात की भनक किसी को नहीं लगने दी। उधर फिल्म ‘जवानी की हवा’ सुपरहिट हुई तो हिमांशु राय ने देविका रानी और नज्म-उल-हसन को लेकर एक और फिल्म बनाने की अनाउंसमेंट कर दी। इस फिल्म का नाम था ‘जीवन नैय्या’।

शूटिंग शुरू हुईपर देविका रानी और नज्म-उल-हसन नहीं आए। हिमांशु राय परेशान हुए तो ये खबर फिल्म डायरेक्टर और अपने दोस्त शशधर मुखर्जी को दी।

देविका रानी शशधर मुखर्जी को अपना भाई मानती थीं। पता चला की देविका रानी और नज्म-उल-हसन कोलकाता चले गए। शशधर मुखर्जी ने कहा - वापस आ जाओ पर देविका रानी ने मना कर दिया।

कहा कि ‘मैं नज्म-उल-हसन से शादी करना चाहती हूं और हिमांशु राय से कोई संबंध नहीं रखना चाहतीं।’

पर शशधर मुखर्जी के समझाने पर कुछ शर्तों के साथ व मानीं। कहा कि ‘मैं आर्थिक आजादी चाहती हूं और हिमांशु राय से दूर रहना चाहती हूं।’

इधरहिमांशु राय ने नज्म-उल-हसन को नौकरी से हटा दिया। और अधर में लटकी अपनी फिल्म ‘जीवन नैय्या’ के लिए फिर से काम शुरू किया। उनके पास हीरोइन तो देविका रानी थीं पर एक्टर नहीं था। वो नए चेहरे की तलाश करने लगे। इस बार फिर से शशधर मुखर्जी ने हिमांशु राय की मदद की। उन्होंने नए एक्टर के लिए हिमांशु राय को एक नाम सुझाया ‘कुमुद लाल गांगुली’।

कुमुद लाल गांगुलीशशधर मुखर्जी के साले साहब थे और ‘बॉम्बे टॉकीज’ में लैब टेक्नीशियन का काम करते। सामान्य कद-काठी, साधारण चेहरा-मोहरा। फिल्म के डायरेक्टर फ्रांज ऑस्टेन ने कहा – ये चेहरा हीरो का लायक नहीं हैं। फिर भी हिमांशु राय ने कुमुद लाल गांगुली को फिल्म ‘जीवन नैय्या’ के लिए बतौर हीरो साइन कर लिया।

क्योंकि कुमुद लाल गांगुली पढ़े-लिखे थे और उस दौर में अच्छे लोग फिल्मों में काम नहीं करते थे। और इससे भी बड़ी वजह थी कि कुमुद लाल गांगुली पहले से शादीशुदा थे। हिमांशु राय ने कुमुद लाल गांगुली को एक नया नाम दिया ‘अशोक कुमार’। 

साल 1936 की फिल्म ‘जीवन नैय्या’ से देविका रानी के साथ बॉलीवुड में डेब्यू करने वाले अशोक कुमार किस्मत से एक्टर बने और पहली ही फिल्म से स्टार बन गए। अगले कुछ सालों में अछूत कन्या’, ‘कंगन’, ‘बंधन’, ‘झूला जैसी फिल्मों से वो सुरपस्टार भी बन गए। उस दौर में हीरो सिर्फ हीरो बनता था पर साल 1943 की फिल्म किस्मत में इन्होंने एंटी हीरो का रोल निभाया।

ये फिल्म पांच सालों तक सिनेमाघरों में लगी रही और एक करोड़ कमाए। उन्हें ऐसा स्टारडम मिला कि वो जहां भी जाते भीड़ लग जाती। पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ता। एक विडंबना भी कहेंगे की अशोक कुमार के चार बच्चे हुए और कोई भी बॉलीवुड में बढ़ा नाम नहीं कमा पाया। इनका एक्ट्रेस कियारा आडवाणी से भी रिश्ता है। और ये भी बताएंगे की अशोक कुमार आखिर क्यों जिंदगी के 14 साल अपने जन्मदिन की तारीख को क्यों कोसते रहे।

ये वो वक्त था जब फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा होना शर्मिंदगी की बात थीं। अशोक कुमार ने एक बार खुद कहा था कि ‘उस जमाने में कॉल गर्ल हीरोइन बना करती थीं और दलाल हीरो बन जाया करते थे।

इसी वजह से मां गौरी देवी और पिता कुंजलाल गांगुली जो एक मशहूर वकील थे वो 13 अक्टूबर साल 1911 को भागलपुर बिहार में जन्में अशोक कुमार को वकील बनाना चाहते थे। अशोक कुमार ने वकालत की पढ़ाई शुरू की पर मन नहीं लगा।

अशोक कुमार एक इंटरव्यू में बताते हैं कि 'मैंने साल 1934 में एक्टर कुंदल लाल सहगल की फिल्म 'चंडीदास' देखी। जिसके बाद फिल्मों में रुचि हुई। मैं एक्टर नहीं कैमरे के पीछे काम करना चाहता था। जर्मनी जाकर पढ़ाई करने के लिए सोची। पर शशधर मुखर्जी ने कहाहिंदी सिनेमा में पढ़े लिखे लोग नहीं हैं। यही पर रहकर फिल्मों में काम करो। आपको देखेंगे तो और भी अच्छे लोग इस पेशे में आएंगें। मैंने उनकी बात मानी और 'बॉम्बे टॉकीजमें बतौर लैब टेक्नीशियन काम करने लगा।'

अशोक कुमार जब हीरो बने तो उनकी मां खूब रोईं और पिता ने भी एक्टिंग छोड़ने ने की जिद की। पत्नी शोभा देवी ने भी घर छोड़ने की चेतावनी दे दी। पर अशोक कुमार हीरो बन ही गए। वो लीड हीरो से लेकर सिगार पीते विलेन तक के किरदारों में नजर आए। चेन स्मोकर वाले रोल तो उनके खूब फेमस हुए। आंखों में चश्माहाथ में सिगार और चेहरे पर मुस्कुराहट रहती। एक्टिंग इतनी सहज और स्वभाविक कि लोग इन्हें प्यार से दादा मुनि कहते। पर वक्त के साथ अपने आप को बदला और हीरो से साइड हीरो और फिर कैरेक्टर रोल करने से भी परहेज नहीं किया।

साल 1962 की ‘राखी’ और साल 1968 की फिल्म ‘आशीर्वाद’ के लिए बेस्ट एक्टर का फिल्मफेयर मिला। फिल्म आशीर्वाद में ‘रेल गाड़ी’ गाना गाया जो बॉलीवुड का पहला रैप सांग के तौर पर याद किया जाता है।

कुछ वक्त के लिए इन्होंने शराब भी पी। एक्ट्रेस नलिनी जयवंत से अफेयर के चर्चे भी रहे। एक्ट्रेस नलिनी जयवंत और अशोक कुमार की जोड़ी को पर्दे पर खूब पसंद किया गया और वो एक दूसरे के करीब भी आए। पर अशोक कुमार का व्यक्तित्व ऐसा था पत्नी शोभा देवी ने इस बात पर कभी विश्वास नहीं किया। अशोक कुमार ने भी ये सब छोड़ दिया।

अशोक कुमार ने साल 1935 में शोभा देवी से शादी की थी और ये साथ मरते दम तक रहा। इनके चार बच्चे हुए।

बेटे अरूप गांगुलीजो साल 1962 की फिल्म ‘बेजुबान’ में हीरो नजर आए। इस फ्लॉप फिल्म के बाद कॉरपोरेट इंडस्ट्री में करियर बनाया।

बेटी रूपा गांगुली ने कुछ फिल्मों में रोल किए और एक्टर देवेन वर्मा से शादी की। शादी के कुछ वक्त बाद देवेन वर्मा का निधन हो गया।

सबसे छोटी बेटी प्रीति गांगुली भी कुछ फिल्मों में बतौर कॉमेडियन नजर आईंताउम्र शादी नहीं की। साल 2012 में इनका निधन हो गया।

अशोक कुमार की सबसे बड़ी बेटी भारती गांगुलीजिनकी पहली शादी गुजराती बिजनेस मैन से हुई। इस शादी से एक बेटी हुई अनुराधा पटेल जो एक्टर कंवलजीत सिंह की जीवन संगिनी बनीं। भारती गांगुली ने दूसरी शादी घरवालों के खिलाफ जाकर एक्टर सईद जाफरी के भाई हामिद जाफरी से की।

हामिद जाफरी शादीशुदा थेउनकी पहली पत्नी वैलेरी साल्वे जो एक विदेशी मूल की थीं और उनकी दो बेटियां जेनेवीव और शाहीन थीं। भारती गांगुली ने जब हामिद जाफरी से दूसरी शादी से की तो उन्हें जेनेवीव और शाहीन को भी पालना पड़ा।

जेनेवीव ने बिजनेस मैन जगदीप आडवाणी से शादी की। और जेनेवीव और जगदीप आडवाणी की बेटी ही एक्ट्रेस कियारा आडवाणी हैं। अशोक कुमार का कियारा आडवाणी के साथ कोई खून का रिश्ता नहीं हैलेकिन वो रिश्ते में उनके परनाना लगे।

अशोक कुमार जिनके भाई एक्टर अनूप कुमार और महान सिंगर किशोर कुमार थे। एक बहन सती रानी देवी थीं जिनकी शादी फिल्म डायरेक्टर शशधर मुखर्जी से हुई।

पत्नी शोभा देवी और दोनों छोटे भाई किशोर कुमार और अनूप कुमारअशोक कुमार से पहले ही दुनिया को अलविदा कह गए। संयोग ये है कि अशोक कुमार के जन्मदिन वाले दिन ही यानी 13 अक्टूबर को ही किशोर कुमार का निधन भी हुआ था।

जब भी अशोक कुमार का जन्मदिन पड़ता भाई की याद आ जाती इस वजह से जिंदगी के आखिरी 14 साल अशोक कुमार ने अपना जन्मदिन नहीं मनाया। जिंदगी के आखिरी वक्त बेहद साधारण जीवन जीने वाले अशोक कुमार 10 दिसंबर साल 2001 को 90 साल की उम्र में दुनिया छोड़कर चले गए।

फिल्मी चकाचौंध और ग्लैमर के बीच नई पीढ़ी अशोक कुमार के काम और रुतबे से शायद अच्छी तरह वाकिफ न हो। लेकिन जब-जब सिनेमा का इतिहास खंगाला जाएगा तब-तब, साल 1959 में संगीत नाटक अकादमी, साल 1962 में पद्मश्री1969 में नेशनल अवार्डसाल 1988 में दादा साहब फाल्के और साल 1999 में पद्म भूषण से सम्मानित अशोक कुमार का बेमिसाल सफर खुदबखुद पढ़ा ही जाएगा।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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