Actor Asrani : डिग्री हाथ में थी पर सालों नहीं मिला काम

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एक्टर असरानी (Actor Asrani) घर से भागे। एक्टिंग की पढ़ाई की फिर भी कई साल काम नहीं मिला। फिल्मों में काम मांगने जाते तो प्रोड्यूसर और डायरेक्टर तवज्जो नहीं देते। यहां तक इन पर कुत्ते तक छोड़ देते।

 

'मेहरबान' फिल्म के पोस्टर को देर तक देखा

बात 1967 की है। जयपुर के एमआई रोड पर एक युवक मस्ती से साइकिल चला रहा था। साथ में एक दूसरा युवक भी उसी साइकिल पर बैठा हुआ था। अचानक दूसरे युवक ने साइकिल रुकवाई। वो साइकिल से उतरा और एक होर्डिंग के पास जाकर उसे निहारने लगा। उसके साथी ने पास जाकर पूछा - 'भाई, ये क्या पागलपन है?' तब उस होर्डिंग देख रहे युवक ने कहा - 'दोस्त, इसे देख रहे हो? इस होर्डिंग में आज 'मेहरबान' फिल्म का पोस्टर चिपका है। कभी मेरी भी फिल्म का ऐसा ही पोस्टर लगेगा।' दूसरे दोस्त ने जवाब देते हुए कहा - 'हांतेरी फिल्म का भी पोस्टर जल्दी ही लग जाएगा। चिंता मत कर।' ये बात सच हुई। उसी साल यानी साल 1967 में उसी होर्डिंग पर फिल्म 'हरे कांच की चूड़ियां' का पोस्टर लगा। इस फिल्म में उस होर्डिंग देख रहे युवक ने छोटा सा रोल किया था।

दोस्त प्यार से कहते चोंच 

ये युवक कोई और नहीं बल्कि वो एक्टर हैं जिन्हें साल 1973 की 'आज की ताजा खबर'  और साल 1977 की फिल्म 'बालिका वधू'  के लिए फिल्म फेयर का बेस्ट कॉमेडियन का अवार्ड मिला। ये साल 1975 की फिल्म 'शोलेमें अंग्रेजों के जमाने के जेलर बनें। पिछले छह दशक में 350 से ज्यादा फिल्मों में दमदार और शानदार रोल किए। आज कहानी एक्टर असरानी की। जिन्हें सफलता यूं ही नहीं मिली। घर से भागे। एक्टिंग की पढ़ाई की पर कई साल काम नहीं मिला। फिल्मों में काम मांगने जाते तो प्रोड्यूसर और डायरेक्टर तवज्जो नहीं देते। यहां तक इन पर कुत्ते तक छोड़ देते। अंदाज बेबाक था तो एक बार तो इंदिरा गांधी से भी शिकायत कर दी।इनकी दास्तां बेहद दिलचस्प है इसके दोस्त इन्हें प्यार से ‘चोंच’ कहकर पुकारते हैं।

पिता चाहते थे बेटा सरकारी अफसर बनें

मूलरूप से कराची से ताल्लुक रखने वाली एक मीडिल क्लास सिंधी फैमिली जो साल 1936 में जयपुर बस गई थी। इसी फैमिली में 1 जनवरी, साल 1941 को गोवर्धन असरानी का जन्म हुआ। इनकी चार बहनें और तीन भाई हैं। असरानी ने एक इंटरव्यू में बताया कि 'पिताजी 1936 में कराची से जयपुर आए। यहां 'इंडियन आर्ट्स कार्पेट फैक्ट्री' में नौकरी की फिर एक कालीन की दुकान खोली।' सेंट जेवियर्स स्कूल से शुरुआती पढ़ाई की फिर राजस्थान कॉलेज, जयपुर से ग्रेजुएशन किया पर पढ़ाई में मन नहीं लगता। वो ऑल इंडिया रेडियो, जयपुर में एक वाइस आर्टिस्ट के रूप में काम करते। जिससे कुछ कमाई हो जाती। कुछ दोस्तों के साथ थियेटर भी करते। पिता चाहते थे कि बेटा या तो सरकारी नौकरी करे या फिर दुकान संभाले।

'पहले एक्टिंग की पढ़ाई करके आओफिर आना'

असरानी को तो फिल्मों में करियर बनाना था। घरवालों से अक्सर विवाद होता तो 21 साल की उम्र में भाग कर मुंबई आ गए। एक साल के लिए भटके खर्चा उस पैसे से चला जो उन्होंने जयपुर में नाटक करके कमाए थे। काम की तलाश में स्टूडियो-स्टूडियो चक्कर लगाते। ऐसे ही अचानक साल 1963 में असरानी की मुलाकात एक्टर और डायरेक्टर किशोर साहू और ग्रेट फिल्म डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी से हो गई। उन दोनों ने काम तो नहीं दिया पर एक सलाह दे दी - 'पहले एक्टिंग की पढ़ाई करके आओ, फिर आना।'

काम नहीं मिला को बन गए टीचर

उनकी सलाह मान कर असरानी ने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट पुणे में दाखिला ले लिया। साल 1966 में कोर्स पूरा हुआ। डिग्री हाथ में थी पर काम नहीं था। अगले पांच साल कुछ खास काम नहीं मिला। 'हम कहां जा रहे हैं', 'हरे कांच की चूड़ियां', 'उमंगऔर 'सत्यकामजैसी कुछ फिल्मों में छोटे मोटे रोल ही मिले। संघर्ष जारी था। खर्च चलाने के लिए वो फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट में टीचर बन गए। जहां वो जया बच्‍चन, शबाना आजमी, डैनी जैसे एक्टर को पढ़ाते थे।

'अंदर मत आनाकुत्ते हैं'

एक इंटरव्यू में असरानी ने बताया था कि 'मैं हर शुक्रवार को पुणे से मुंबई काम ढूंढने जाता। ऋषि दा (ऋषिकेश मुखर्जी) के बंगले के बाहर जाता। वो दिखते तो उनसे काम मांगता। पर ऋषि दा कहते, 'अंदर मत आना, कुत्ते हैं।कई बार तो मुझपर कुत्ते भी छोड़ द‍िए, पर हम रुके नहीं। कोशिश करते रहे।'

जब इंदिरा गांधी से कर दी शिकायत

काम न मिलने को लेकर इन्होंने एक बार इंदिरा गांधी से भी शिकायत की। द इंडियन एक्सप्रेस की वेबसाइट पर छपे एक इंटरव्यू में असरानी बताते हैं कि 'मैं काम ढूंढ़ने के लिए संघर्ष कर रहा था। एक दिन इंदिरा गांधी पुणे आईं। वो उस वक्त सूचना एवं प्रसारण मंत्री थीं। मैंने और मेरे कुछ साथियों ने मिलकर उससे शिकायत की। कहा, हमारे पास एक्टिंग की डिग्री होने के बाद भी कोई हमें काम नहीं देता। फिर इंदिरा गांधी जब मुंबई गईं तब उन्होंने फिल्म प्रोड्यूसर और डायरेक्टर के सामने हमारी बात रखी।'

'जया के लिए खत आएतो तुम भी आना।'

साल आया 1971, ऋषिकेश मुखर्जी फिल्म 'गुड्डीबना रहे थे।  'गुड्डी'  के रोल के लिए वो एक नए चेहरे की तलाश कर रहे थे। उनकी ये खोज उन्हें फिल्म इंस्टीट्यूट पुणे ले गई। असरानी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि 'ऋषि दा जब इंस्टीट्यूट आए तो। जैसे मैंने उन्हें देखा, मुझे लगा अब तो रोल म‍िल ही जाएगा। लेकिन उन्होंने मुझसे पूछा, जया भादुड़ी कौन है? मैंने जया को बुलाया। जया भादुड़ी, ऋषिकेश मुखर्जी से मिलीं और उन्‍होंने  'गुड्डीफिल्‍म के लिए स्क्रीन टेस्ट द‍िया।' असरानी ने आगे बताया था कि 'ये मौका मैं छोड़ना नहीं चाहता था। ऋषि दा जा रहे थे, मैंने उनसे कहा, दादा चार-पांच साल हो गए हैं, मुझे भी एक मौका दीजि‍ए। ऋषि दा ने जाते हुए मुझसे कहा, 'अगर जया के लिए यहां खत आया, तो तुम भी आ जाना।'

'गुड्डी' से मिली शोहरत

बस यहीं से असरानी को 'गुड्डी' फिल्म म‍िली। इस फिल्म में असरानी को एक ऐसे लड़के का रोल मिला जो हीरो बनने मुंबई आता हैलेकिन जूनियर आर्टिस्ट बनकर रह जाता है। ये फिल्‍म इतनी ह‍िट हुई कि जया भादुड़ी तो रातों-रात स्‍टार बनीं ही। असरानी के पास भी ढेरों फिल्म के ऑफर आए। अगले आठ साल यानी साल 1979 की फिल्म 'जुर्माना' तक ऋषिकेश मुखर्जी ने असरानी को अपनी हर एक फिल्म में लिया। असरानी और ऋषिकेश मुखर्जी के बीच एक गहरा रिश्ता बन गया।

जब कागज पर लिखकर दिया - 'असरानी मुखर्जी'

असरानी ने एक इंटरव्यू में बताते हैं कि 'मैं ऋषि दा से उनके आखिरी दिनों में अस्पताल में मिलने गया तो उन्होंने एक कागज पर लिखकर दिया - 'असरानी मुखर्जी।' वो कहना चाहते थे कि, 'तुम मेरे बेटे हो।'

राजेश खन्ना थे अच्छे दोस्त

एक्टर राजेश खन्ना असरानी के अच्छे दोस्त थे। जिनके साथ उन्होंने करीब 25 फिल्मों कीं। गुलजार भी जब पहली बार साल 1971 की फिल्म 'मेरे अपने' से डायरेक्टर बने तो असरानी को काम दिया। फिल्म 'मेरे अपनेमें मीना कुमारी, विनोद खन्ना और शत्रुघ्न सिन्हा के साथ असरानी के काम को नोटिस किया गया।

राजनीति के गलियारे में जम नहीं पाए

असरानी को साल 1973 की फिल्म 'नमक हराम' की शूटिंग के दौरान एक्ट्रेस मंजु बंसल से इश्क हुआ। उनसे शादी की। एक बेटा हुआ जिसका नाम नवीन असरानी है। साल 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का दामन थाम कर असरानी राजनीति में भी उतरे, लेकिन राजनीति के गलियारे में वो जम नहीं पाए।

खाना खाने और किताबें पढ़ने का शौक

गुजराती फिल्म 'सात कैदी' में काम करने किए गुजरात सरकार से सम्मानित असरानी पुराने जमाने से लेकर आज के जमाने तक फिल्मों में एक्टिव हैं। देसी खाना खाने, फिल्में देखना, किताबें पढ़ने के शौकीन असरानी आने वाले वक्त में कई सारे प्रोजेक्ट में काम कर रहे हैं।

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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