Actor Balraj Sahni ने फिल्मी पर्दे पर आम आदमी के दर्द को दी जुबान

Home   >   किरदार   >   Actor Balraj Sahni ने फिल्मी पर्दे पर आम आदमी के दर्द को दी जुबान

96
views

साल 1953 की आइकोनिक फिल्म ‘दो बीघा जमीन’फिल्म में शंभू महतो नाम के एक रिक्शेवाले का लीड रोल था। इस रोल के लिए डायरेक्टर विमल राय चेहरा तलाश रहे थे। एक्टर अशोक कुमारत्रिलोक कपूर और नाजिर हुसैन को ऑफर दिया गया लेकिन बात नहीं बनी। फिर एक 40 साल के एक्टर पर विमल राय की निगाहें गईं। जो पिछले सात सालों से पहचान बनाने के लिए जद्दोजहद कर रहा था। इस दौरान उसने आठ-नौ फिल्में भी की। जिनमें साल 1951 में रिलीज हुई ‘हम लोग’ भी शामिल थी। विमल राय ने उस एक्टर को बुलाया तो वो बढ़िया सा सूट-बूट पहनकर ऑफिस मिलने पहुंचे। उन्हें देखकर विमल राय चकरा गए। बोले – ‘आप तो किरदार में बिल्कुल फिट नहीं बैठेंगे। मेरी फिल्म तो एक गरीब रिक्शेवाले की कहानी है।’

इस पर एक्टर ने जवाब दिया- आप एक बार मेरी फिल्म ‘धरती के लाल’ देखिये।

विमल राय ने फिल्म देखी और झट से ये रोल उस एक्टर को दे दिया। बाद में रिक्शे वाले के किरदार को जीवंत करने के लिए उस एक्टर ने कई दिनों तक घंटों बंबई की सड़कों पर रिक्शा खींचा। जब फिल्म रिलीज हुई तब थियेटर से निकलने वाले हर व्यक्ति की जुबां पर एक ही नाम था बलराज साहनी। वो दिग्गज एक्टर और शायद दुनिया का पहला ऐसा एक्टर जो अपनी क्रांतिकारी विचारधारा के लिए जेल गए और उनको जेल से सेट पर लाया जाता था। फिर उन्हें उसी तरह जेल में वापस डाल दिया जाता था।

साल 1938 जब देश में हर तरफ आजादी की मांग उठ रही थी। ऐसे में ये ख्वाब 25 साल के युवा बलराज साहनी भी देख रहे थे। एमए इन इंग्लिश लिटरेचर की डिग्री हासिल की और रवीन्द्रनाथ टैगोर के शांति निकेतन में बतौर लेक्चरर काम करने लगे। यही वो वक्त था जब वे महात्मा गांधी से मिले। 

बलराज साहनी के बेटे परीक्षित साहनी की किताब 'द नॉन कन्फर्मिस्ट : मेमरीज ऑफ माई फादर बलराज साहनीके मुताबिक साल 1939 को महात्मा गांधी की प्रेरणा और सहयोग से वे लंदन गए। जहां बीबीसी के लिए बतौर रेडियो अनाउंसर का काम किया। चार साल बाद साल 1943 में वापस भारत लौटे। एक्टिंग का शौक था तो 'इंडियन प्रोग्रेसिव थियेटर एसोसिएशनयानी इप्टा से जुड़े। यहीं पर इनकी मुलाकात डायरेक्टर ख्वाजा अहमद अब्बास हुई और उन्होंने ही बलराज साहनी को साल 1946 में रिलीज हुई अपनी फिल्म ‘धरती के लाल’ में बतौर एक्टर काम दे दिया।

नेचुरल एक्टर बलराज साहनी का नाम सबसे बेहतरीन एक्टरों की लिस्ट में लिया जाता है। इन्हें एक्टिंग का इंस्टीट्यूशन माना जाता है। बलराज साहनी का असल नाम युधिष्ठिर साहनी पंजाब के भेरा में 1 मई साल 1913 को जन्मे थे । अब ये जगह पाकिस्तान में आती है। तैराकी के शौकीन बलराज सामाजिक कार्यों से खूब जुड़े रहते। मजदूरों-मेहनतकश लोगों से लगाव रखते। क्रांतिकारी विचारधारा और लेफ्ट समर्थक होने की वजह से ऐसे ही एक रोज वे कम्युनिस्ट पार्टी के जुलूस में शामिल हुए। अचानक दंगा हो गया तो हिंसा फैल गई और बलराज साहनी गिरफ्तार कर लिए गए। उस वक्त के. आसिफदिलीप कुमार और नरगिस को लेकर साल 1951 की फिल्म ‘हलचल’ बना रहे थे जिसमें बलराज साहनी भी काम कर रहे थे। जब के. आसिफ को पता चला की बलराज साहनी गिरफ्तार हो गए है तो वे परेशान हुए। उस वक्त के. आसिफ बड़े डायरेक्टर और प्रोड्यूसर थे। इत्तेफाक से जिस जेल में बलराज साहनी बंद थे उसके जेलर की के. आसिफ की जान-पहचान निकली। उनकी रिक्वेस्ट पर उन्हें जेल से कुछ घंटों की छुट्टी दिलाकर शूट पर लाया जाता था। इसके बाद वे शूटिंग करते। फिर उन्हें उसी तरह जेल में वापस बंद कर दिया जाता। ये सिलसिला तीन महीने तक जारी रहा। ये भी एक इत्तेफाक था कि फिल्म में बलराज साहनी का भी एक जेलर का ही रोल था।

‘गरम हवा’, ‘सागर’, ‘राही’, ‘संघर्ष’, ‘गरम कोट’, ‘छोटी बहन’, ‘काबुलीवाला’, ‘हमराज, ‘नील कमल’, ‘दो रास्ते’, ‘हंसते जख्म’ जैसी फिल्में देकर बलराज साहनी ने अपनी कोई स्टाइल नहीं बनाई पर हमेशा परदे पर अपने किरदार के जरिए समाज में बदलाव लाने की कोशिश की। भाषा पर कमाल की पकड़ थी वे सिर्फ एक्टर ही नहीं थे बल्कि बेहद जहीन इंसान भी थे। एक आम आदमी के दर्द और परेशानी को फिल्मी पर्दे पर जुबान दी। वे दुनिया के किसी भी किरदार को पर्दे पर उतारने का माद्दा रखते थे।

साल 1947 में रिलीज हुई ‘गुड़िया’ की हीरोइन दमयंती साहनी से शादी की। लेकिन कुछ सालों बाद पत्नी का निधन हो गया। फिर संतोष चंदोक से उन्होंने दूसरी शादी की।

परीक्षित साहनी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि पिता के साथ उनका अनोखा रिश्ता था। वे कहते हैं कि

‘मेरे पिता ने मुझसे कहा था किमुझे अपना पिता मत समझमैं तेरा दोस्त हूं। वो कहते थे किमेरे पीछे सिगरेट क्यों पीते होमेरे सामने पियो। कभी कोई बात मुझसे मत छुपाना। पहली बार सिगरेट और वाइन मैंने अपने पिताजी के सामने ही पी थी। बाप-बेटे का ऐसा अनोखा रिश्ता विरले ही होता है।’

शानदार फिल्मों के साथ-साथ अडिग आदर्शों के लिए याद किए जाने वाले बलराज साहनी ने 13 अप्रैल 1973 जब आखिरी सांस ली तब उनकी उम्र 60 साल की थी। उनके निधन के चार साल बाद उनकी आखिरी फिल्म ‘अमानत’ रिलीज हुई।

परीक्षित साहनी की किताब के मुताबिक.... बलराज साहनी मार्क्सवादी विचारधारा का इतना पालन करते थे कि अंतिम समय में उन्होंने कहा कि

'जब मेरी मौत होगी तब कोई पंडित न बुलाना। कोई मंत्र उच्चारण नहीं होगा। जब मेरी अंतिम यात्रा निकलेगी तो मेरे शरीर पर लाल रंग का झंडा होना चाहिए।'

इतने सालों बाद भी बलराज साहनी को आज एक हुनरमंद एक्टरसौम्यता-सौहार्द से भरा व्यक्ति,  नैतिकता पर चलने वाले भारतीय और आम आदमी के हिमायती के रूप में याद किया जाता है। साल 1965 में रिलीज हुई फिल्म ‘वक्त’ का एक गाना है जो उन्हीं पर फिल्माया गया है इस गाने जरिए वे हमेशा हमारे बीच जवान रहेंगे।

ऐ मेरी जोहराजबीं

तुझे मालूम नहीं...

तू अभी तक है हंसी

और मैं जवान...

तुझपे कुर्बान मेरी जानमेरी जान...

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

Comment

https://manchh.co/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!