Actor Johnny Walker : जिनके लिए फैमिली थी हर चीज से पहले

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जमालुद्दीन काजी जो इंदौर में रहकर एक मिल में काम करते। एक दिन मिल बंद हो गई। जमालुद्दीन काजी इंदौर से मुंबई आ गए और छोटे-मोटे काम कर अपनी पत्नी और 12 बच्चों का पेट पालने लगे। वक्त गुजरा और इनके दो बेटे कमालुद्दीन काजी और सलामुद्दीन काजी फिल्म प्रोड्यूसर बने। और दो बेटे एक्टर बने। पहले थे वहीदुद्दीन काजी जिन्होंने अपना फिल्मी नाम विजय कुमार रखा।

और दूसरे बेटे वो एक्टर थे जिनका रोल फिल्म में जितना भी छोटा हो पर वो लोगों के दिलों में अपनी छाप छोड़ ही देते। 300 से ज्यादा फिल्मों में अपने किरदारों से खूब हंसाया और कई बार आखें भी नम कर गए। फिर इसी फिल्मी दुनिया से दूरी बना ली। 

आज कहानी फेमस कॉमेडियन और एक्टर बदरुद्दीन काजी उर्फ जॉनी वॉकर की। जिनकी जिंदगी की दास्तां संघर्षों से भरी पड़ी है। जिसने अपनी फैमिली को हर चीज से पहले रखा। खुद पढ़ नहीं सके पर अपने बच्चों को पढ़ने के लिए अमेरिका भेजा। बचपन में एक-एक पैसे के लिए मोहताज रहे। फिर एक दौर ऐसा भी आया जब मुंबई की सड़कों में चलने वाली 80 फीसद से ज्यादा टैक्सी इन्ही की थी।  

11 नवंबर साल 1926 इंदौर में बदरुद्दीन काजी का जन्म हुआ। पिता की मिल बंद हुई तो पूरी फैमिली मुंबई आ गई। बदरु 12 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। घर में हालात तंग थे। पढ़ाई छोड़ दी गली-गली सब्जी-फल और आइसक्रीम बेची। ऐसे ही 22-23 साल का जीवन गुजर गया। फिर बस में बतौर कंडक्टर नौकरी करने लगे।

इधर अपने दौर के दिग्गज एक्टर बलराज साहनी जो बॉलीवुड में पैर जमाने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे वो इस दौरान साल 1951 की फिल्म 'बाजीका स्क्रीनप्ले लिख रहे थे। इस फिल्म के डायरेक्शन की जिम्मेदारी गुरु दत्त पर थी। उनको एक कॉमेडियन की तलाश थी।

ऐसे ही इत्तफाक से बलराज साहनी उसी बस में बैठ गए जिस बस के कंडक्टर बदरु थे। बदरु सवारियों को बैठाने के लिए उन्हें जिस अंदाज में बुलाते वो देखकर लोग हंसे बिना नहीं रह पाते। उनकी कॉमिक स्टाइल को देखकर बलराज साहनी उन पर फिदा हो गए और उन्होंने बदरु को गुरु दत्त से मिलवाने की सोची। लेकिन पहले एक ट्रिक प्लान की।

बलराज साहनी ने बदरु से कहा कि ‘तुम गुरुदत्त के ऑफिस में बेधड़क घुस जाना और एक शराबी की एक्टिंग करना।’ बदरु ने ऐसा ही किया। गुरु दत्त ये देख कर अपना आपा खोने ही वाले थे कि तभी बलराज साहनी ने उन्हें रोका और सारी बात बता दी। गुरु दत्त को बदरु की एक्टिंग पसंद आई। उन्होंने शराब के अपने पसंदीदा ब्रांड जॉनी वॉकर के नाम पर ही उनका नाम बदरुद्दीन काजी से बदल कर जॉनी वॉकर रख दिया और फिल्म ‘बाजी’ में काम करने का मौका भी दिया।

इसके बाद गुरु दत्त लगभग हर फिल्म में जॉनी वॉकर को लेते। गुरु दत्त ने ही कॉमिक एक्टर पर गाना फिल्माने का ट्रेंड शुरू किया। जॉनी पर एक गाना जरूर फिल्माया जाता। उनकी आवाज बनते ग्रेट सिंगर मोहम्मद रफी।

50, 60 और 70 के दशक में जॉनी की एक्टिंग का हर कोई कद्रदान था। करीब 300 से ज्यादा फिल्में की। साल 1958 की मधुमती और साल 1968 की शिकार के लिए फिल्मफेयर मिला।

जॉनी ने एक्ट्रेस शकीला की छोटी बहन नूरजहां से शादी की। नूरजहां का बॉलीवुड में करियर बहुत अच्छा नहीं रहा लेकिन उन्हें जॉनी के रूप में एक ऐसा हमसफर मिला जिसने उनकी जिंदगी को खूबसूरत कर दिया।

दोनों की मुलाकात साल 1954 की फिल्म 'आर पारके सेट पर हुई। नूरजहां को जॉनी की सादगी और ईमानदारी पसंद आई। तमाम बंधन के बाद भी दोनों ने साल 1955 में शादी की।

जॉनी जो खुद नहीं पढ़ पाए अपने छह बच्चों को आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका भेजा। पांच बच्चे अमेरिका में बस गए। वहीं नासिर खान अपने पिता की तरह एक्टर बनें। वो कुछ फिल्मों और टीवी सीरियल नजर आए हैं।

जॉनी ने कभी कोई फिल्म प्रोड्यूस नहीं की जो पैसे कमाये वो बिजनेस में लगाए। एक वक्त में मुंबई की सड़कों में चलने वाली 80 फीसदी टैक्सियां उन्हीं की ही थी। वो किमती पत्थरों का भी बिजनेस करते।  

80 के दशक में जॉनी ने फिल्मों में काम कम कर दिया। वजह थी कॉमेडी का गिरता स्तर।

जॉनी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि हमारे दौर में साफ-सुथरी कॉमेडी होती थी। हमें ध्यान रहता था किलोग अपने बीवी-बच्चों के साथ सिनेमा हॉल में आते हैं। हमारे लिए पहले कहानी थी। फिर किरदारफिर अदाकार। लेकिनगुजरते वक्त के साथ इसका ठीक उल्टा हो गया। पहले अदाकारफिर किरदारअंत में कहानी। इसके बीच में कहीं कॉमेडियन को फिट कर दिया जाता। कॉमेडी अश्लीलता की बंधक बन गई हैइसलिए मैंने किनारा कर लिया।’

कई सालों तक फिल्मों से दूर रहने के बाद लोग उन्हें मरा हुआ समझने लगे। साल 1997 की फिल्म ‘चाची 420’ में नजर आए जो इनके करियर की आखिरी फिल्म थी। इस फिल्म के रिलीज होने पर लोगों ने इससे पूछा कि अरे आप अभी तक जिंदा हैं।

जॉनी ने फिल्मों में शराबी की एक्टिंग खूब की लेकिन कभी निजी जिंदगी में शराब और सिगरेट नहीं पी। ये विवादों से दूर रहे। इनके लिए सबसे पहले फैमिली थी। इसलिए जॉनी ही पहले एक्टर थे जो संडे को कभी काम नहीं करते।

जॉनी की बेटी तसनीम ने एक इंटरव्यू में बताया था कि अब्बा कहतेसब तो कमा लिया। घर हैगाड़ी हैबच्चे हैंऔर क्या चाहिए। उन्होंने आखिरी वक्त तक कॉमेडी का साथ नहीं छोड़ा। जब बीमारी की वजह से उन्हें अस्पताल ले गएतो उन्होंने भर्ती होने से मना कर दिया। वो कहतेमुझे मशीनों पर पड़े-पड़े 10 साल नहीं जीना। घर ले चलो। घरवालों के बीच एक साल ही रह लूंतो बहुत है। उन्हें घर ले आए।

तसनीम आगे कहती हैं कि अब्बाअक्सर हंसाते रहते। हम कभी उनसे कहते कि अब्बा आंखें खोलिए। तो वो एक ही आंख खोलकर कहतेदूसरी वाली अभी आराम कर रही है। परवो मनहूस दिन आ गया जब उनकी दोनों आंखें आराम करने चली गईं।’

29 जुलाई साल 2003 77 साल की जॉनी वॉकर उम्र में दुनिया छोड़कर चले गए।

मुंबई का बांद्रा जो कई बॉलीवुड हस्तियों के घरों के लिए जाना जाता है। उसी बांद्रा में जॉनी का भी घर नूर विला है। नूर विला के ठीक सामने ‘जॉनी वॉकर बस स्टॉप’ है । जो जॉनी की यादों को समटे है। जिंदगी का पहिया वहीं आकर थम गया जॉनी का बस से शुरू हुआ सफर बस स्टॉप पर आकर थम गया।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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