Actor Manoj Bajpai : इन दमदार किरदारों से बनाई अपनी पहचान

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साल 1917 में गांधीजी ने बिहार के जिस चंपारण जिले में अंग्रेजों के खिलाफ और किसानों के हक के लिए सत्याग्रह की शुरुआत कीउसी चंपारण के एक किसान के बेटे मनोज बाजपेयी ने बिहार से दिल्लीदिल्ली से मुंबई और मुंबई से इंटरनेशनल मंच तक अपना नाम बनाया। लोग इनकी एक्टिंग का लोहा मानता हैं। क्योंकि एक्टिंग के अलावा इनके पास करियर में कुछ और करने के लिए प्लान बी था ही नहीं।

मनोज बाजपेयी नए जमाने के गिने चुने कलाकारों में से हैं। जिन्होंने कम उम्र में ही बॉलीवुड में एक बड़ा कद हासिल किया।

सिनियर जर्नलिस्ट पीयूष पांडे की बुक ‘मनोज बाजपेयी – कुछ पाने की जिद’ में वे लिखते हैं,

23 अप्रैलसाल 1969 को बिहार के चंपारण के एक छोटे से गांव नरकटियागंज में मनोज का जन्म हुआ। पिता खेती-किसानी का काम करते थे।

बचपन से शर्मीले मनोज को फिल्मों का शौक था। तो उन्हें 12वीं के बाद दिल्ली में जाकर एक्टिंग सीखने का सपना जागा। लेकिन राह बड़ी मुश्किल थी।

एक टीवी शो को दिए इंटरव्यू में मनोज बाजपेयी कहते हैं कि एमबीबीएस परीक्षा दियाउसमें नहीं हुआ। तब मैंने अपने पिताजी को कहामेरा मन नहीं लगता बायोलॉजी में। मुझे दिल्ली में यूपीएससी की तैयारी करने दीजिए। पिताजी ने कहातुमको दिल्ली भेजने के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं। मैंने कहाकुछ न कुछ कर लूंगा। आप आधा दे दीजिएगा और आधा का मैं इंतजाम कर लूंगा। फिर मैं अपने एक दोस्त के साथ दिल्ली आ गया।’

दिल्ली पहुंचकर रामजस कॉलेज में एडमिशन लिया। वहीं एक्टिंग सीखने के लिए नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिले के लिए फार्म भरा। एक नहीं बल्कि तीन बार प्रयास के बाद भी एनएसडी से रिजेक्शन मिला। जिसके बाद वो टूट से गए। लेकिनहारे नहीं।

वे कहते हैं कि मेरा उद्देश्य सिर्फ एनएसडी में एडमिशन लेना था। लेकिनमेरा रिजेक्शन हो गया। जैसे कि, मेरा सब कुछ लुट गया हो। मेरे पास प्लान बी था ही नहीं। उसके बाद मेरे दोस्तों ने मुझे सहारा दिया। मुझे डिप्रेशन से निकाला। फिर मैं रास्ता तलाश करने लगा। इस दौरान मेरे मन में आत्महत्या का विचार भी आया।’

उन्होंने चौथी बार अप्लाई किया। वे फिर से रिजेक्ट कर दिए गए। लेकिन, इस बार आशा की एक किरण मिली। जिसनेउनका पूरा जीवन उजाले से भर दिया। उनको एनएसडी में पढ़ाने की जिम्मेदारी मिली।

इस दौरान वे एक्टर बनने की लगातार कोशिश करते रहे। तभी डायरेक्टर शेखर कपूर की उन पर नजर गईऔर उन्होंने साल 1994 को रिलीज हुई फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ में 'मान सिंहका रोल दिया। इस फिल्म के बाद उनकी बॉलीवुड में एंट्री तो हो गई। लेकिन, संघर्ष का दौर खत्म नहीं हुआ।

चार सालों के बादसाल 1998 में रिलीज हुई डायरेक्टर राम गोपाल वर्मा की फिल्म 'सत्या’ में उनको 'भीखू मात्रेऔर फिर एक साल बाद साल 1999 में डायरेक्टर ईश्वर निवास की फिल्म ‘शूल’ में इंस्पेक्टर समर प्रताप सिंह जैसे दमदार रोल मिले। इन दोनों ही फिल्मों के बाद उनकी गाड़ी चल निकली।

राइटर अमृता प्रीतम के फेमस नॉवेल 'पिंजरपर बेस्ड साल 2003 में रिलीज हुई डायरेक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म ‘पिंजर’ में मनोज ने 'रशीदका किरदार किया। जिसको देखकर एक बार एक्ट्रेस कैटरीना कैफ ने मनोज बाजपेयी के पैर छूते हुए कहा था कि मैंने अपनी जिंदगी में कभी ऐसी एक्टिंग नहीं देखी।’

साल 2010 में रिलीज हुई डायरेक्टर प्रकाश झा की फिल्म 'राजनीतिमें वीरेंद्र प्रताप का रोल हो या फिर साल 2012 में डायरेक्टर अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में सरदार खान का। इन दोनों रोल्स के बाद मनोज की जिंदगी पटरी पर तेजी से दौड़ने लगी। धीरे-धीरे उनकी बॉलीवुड में एक अलग पहचान बन गई।

अक्स’, ‘भौसले’, ‘अलीगढ़’, ‘ट्रैफिक’, ‘स्पेशल 26’, 'वीरजारा', जैसी फिल्मों में उनकी एक्टिंग को सराहा गया।

वे बॉलीवुड के साथ तेलुगु और तमिल फिल्मों में भी काम करते हैं। वेब सीरीज ‘फैमली मैन’ से ओटीटी पर भी अपनी धाक जमा चुके हैं।

तीन बार नेशनल और चार बार फिल्म फेयर का खिताब अपने नाम किया है। साल 2019 में उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया जा चुका है।

मनोज ने साल 2006 में एक्ट्रेस शबाना रजा से शादी की। वे एक बेटी के पिता हैं। शबाना रजा ने साल 1998 में रिलीज हुई डायरेक्टर विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘करीब’ में बतौर हीरोइन काम किया है। शबाना ने मनोज से शादी करने के बाद अपना नाम बदलकर नेहा बाजपेयी रख लिया।

मनोज बाजपेयी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि स्ट्रगल के दौर में जब मेरे मन में आत्महत्या का विचार आया तो लोगों ने इस बात को हेडलाइन बना दिया। ये सिर्फ एक विचार आया थालेकिन मैं कठोर जिगरे वाला आदमी हूंमैं जल्दी टूटता नहीं हूं।’

आने वाले समय में मनोज बाजपेयी की एक्टिंग 'कैंपस', 'बंदाऔर 'राखजैसी फिल्मों में देखने को मिलेगी।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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