Actor Prem Adib : घर-घर पूजे जाने वाले एक्टर की कहानी

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एक्टर प्रेम अदीब ने करीब आठ फिल्मों में भगवान राम की भूमिका निभाई तो लोग इन्हें भगवान राम की तरह पूजते थे।

 

जह गांधीजी ने 'रामराज्य' फिल्म देखी

साल 1943, महीना था अगस्त का। जगह - मुंबई के जुहू का बिड़ला हाऊस। यहां एक फिल्म का शो चल रहा था। महात्मा गांधी उन दिनों मुंबई में ही थे। फिल्म प्रोड्यूसर और डायरेक्टर विजय भट्ट के आग्रह पर गांधी जी ने अपने व्यस्त कार्यक्रम में से 10 मिनट निकाले, फिल्म देखने के लिए। अपने जीवन में पहली बार फिल्म देख रहे महात्मा गांधी को जब 10 मिनट का वक्त गुजर जाने पर सेक्रेटरी ने टोका तो गांधी जी ने कहा – आगे के सभी कार्यक्रम रद्द कर दो, अब हम पूरी फिल्म देख कर जाएंगे। ये फिल्म थी ‘रामराज्य’ और आज कहानी इस फिल्म के हीरो प्रेम अदीब की। 

 

भगवान राम की तरह पूजे जाते थे प्रेम अदीब

साल 1987 में जब एक्टर अरुण गोविल रामायण सीरियल में भगवान राम की भूमिका में नजर आए तो लोगों ने उन्हें ही भगवान राम की मूरत माना। आज भी इनके प्रति लोगों की आस्था ऐसी है कि ये जहां भी जाते लोग उन्हें भगवान राम मानकर पैर छूते। 40 के दशक में इसी तरह का सम्मान एक्टर प्रेम अदीब को भी मिला। प्रेम अदीब ने एक नहीं करीब आठ फिल्मों में भगवान राम की भूमिका निभाई तो लोग इन्हें भी भगवान राम की तरह पूजते थे। घर में इनकी तस्वीर लगाते थे।

 

शानदार रील लाइफ, दिलचस्प रियल लाइफ

प्रेम अदीब ने 25 साल के करियर में करीब 65 फिल्मों में काम किया, खूब सारा नाम कमाया। इनकी रील की जिंदगी जितनी शानदार, उनती ही दिलचस्प इनकी निजी जिंदगी भी थी। ये सपनों को पूरा करने के लिए घर से भागे थे। इनकी कहानी में एक लड़की है जिसने इनकी मदद की। उस लड़की से प्यार हुआ तो समाज आड़े आ गया। एक रसूखदार परिवार से ताल्लुक रखने वाली पत्नी हैं। जिन्होंने प्रेम अदीब की यादों के सहारे 56 साल का जीवन अकेले गुजार दिया। एक बेटा है, जिससे प्रेम अदीब कभी नहीं मिले। एक हादसा है जिसने सब कुछ बर्बाद कर दिया और बेहद कम उम्र में प्रेम अदीब दुनिया छोड़ कर चले गए।

 

जब इशरत जहां हो गईं इंदुरानी

कहानी शुरू होती है, 30 के दशक से, दिल्ली के दरियागंज में रहते थे शेख इमामुद्दीन। अच्छे-खासे पैसे वाले। लेकिन जुएं और शराब की लत ने सब डूबो दिया। इनके सात बच्चे थे, जिसमें से इनकी दो बेटियां थी - रोशन जहां और - इशरत जहां। साल 1935 में शेख इमामुद्दीन दोनों बेटियों को लेकर दिल्ली से पुणे आ गए। क्योंकि दोनों बहनों को फिल्मों में एक्टिंग करने ऑफर आया था। इसके लिए पैसे भी अच्छे मिल रहे थे। साल 1936 में पुणे की फिल्म कंपनी ‘सरस्वती सिनेटोन’ की मराठी फिल्म ‘सावित्री’ में रोशन जहां और इशरत जहां ने काम किया। दोनों बहनों के नाम भी बदले। रोशन जहां सरोजिनी हो गईं और इशरत जहां का नाम बदलकर इंदु रानी हो गया। पर किस्मत... सावित्री फिल्म फ्लॉप हो गई, और  ‘सरस्वती सिनेटोन’ कंपनी बंद हो गई। अब दोनों बहनों ने मुंबई का रुख किया। यहां दादर की हिंदू कॉलोनी में एक किराए का कमरा लिया। इंदु रानी को ‘दरयानी प्रोडक्शन’ में नौकरी मिल गई। दोनों ही पढ़ने-लिखने को लेकर सजग थीं तो पड़ोस में रहने वाले एक टीचर से अंग्रेजी सीखने लगीं।

 

नवाब वाजिद अली शाह ने दी थी ‘अदीब’ की उपाधि

इसके बाद कहानी में एंट्री होती है – प्रेम अदीब की। कौन थे प्रेम अदीब शुरू से जानते हैं। कश्मीरी पंडित परिवार से ताल्लुख रखने वाले देवी प्रसाद धर कश्मीर छोड़कर यूपी के फैजाबाद आ बसे। लेखक और फिल्म हिस्टोरीयन शिशिर कृष्ण शर्मा के एक लेख के मुताबिक देवी प्रसाद धर रेलवे में नौकरी करते थे। वो पढ़े लिखे और जहीन थे। अवध के नवाब वाजिद अली शाह ने इन्हें ‘अदब’ लफ्ज़ से बने शब्द ‘अदीब’ की उपाधि से नवाजा था। अब देवी प्रसाद धर, देवी प्रसाद अदीब हो गए। उनके बेटे रामप्रसाद अदीब भी रेलवे में नौकरी करने के लिए फैजाबाद से सुल्तानपुर आ गए। उन्हीं के घर 10 अगस्त, साल 1916 को शिवप्रसाद अदीब।

 

शिव प्रसाद अदीब से हो गए प्रेम अदीब

शिव प्रसाद अदीब, बचपन से ही फिल्मों का शौक रखते। बड़े हुए तो घर वालों से कहा कि - मैं एक्टर बनना चाहता हूं। माता पिता ने एतराज किया तो  घर छोड़ दिया और एक्टर बनने की तमन्ना लिए पहले कोलकाता और फिर लाहौर गए पर काम नहीं मिला। तो आखिर में मुंबई आ गए। किस्मत से साल 1936 की फिल्म ‘रोमांटिक इंडिया’ में एक रोल मिला और नया नाम प्रेम अदीब भी मिला। ये नाम फिल्म के डायरेक्टर मोहन सिन्हा ने दिया था। इस फिल्म से कोई खास पहचान नहीं मिली। कई महीने बीते, काम नहीं मिल रहा था। संयोग से इनकी पहचान उन टीचर से थी जो इंदु रानी को पढ़ाते थे।

 

जब मोहब्बत के बीच आड़े आया धर्म

एक दिन इंदु रानी और प्रेम अदीब की मुलाकात हुई। इंदु रानी की मदद से प्रेम अदीब की भी नौकरी ‘दरयानी प्रोडक्शन’ में लग गई। इंदु रानी की पहली फिल्म साल 1936 की ‘प्रतिमा’ में एक छोटा सा रोल प्रेम अदीब को भी मिला। वक्त गुजरा प्रेम अदीब और इंदु रानी की साथ में साल 1936 की ‘फिदा-ए-वतन’ और साल 1937 की ‘इंसाफ’ रिलीज हुई। काम के दौरान दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे। शादी करना चाहते थे। पर आड़े आ गया – धर्म।

 

प्रेम अदीब और इंदु रानी के रास्ते हुए अलग 

इंदु रानी मुसलमान थीं और प्रेम अदीब कश्मीरी ब्राह्मण। घर वालों के आगे प्रेम अदीब की एक न चली। उन्हें इंदु रानी का साथ छोड़ना पड़ा। उधर, इंदु रानी ने प्रेम अदीब के एक बेटे को जन्म दिया। बाद में जब प्रेम अदीब, इंदु रानी के पास गए तो इंदु रानी ने प्रेम अदीब को अपनी जिंदगी से हमेशा के लिए दूर जाने के लिए कह दिया। फिर दोनों कभी नहीं मिले। प्रेम अदीब - इंदु रानी के रास्ते अलग थे।

 

राम का किरदार निभाया तो हो गए अमर

दोनों का फिल्मी सफर आगे बढ़ा। साल 1938 की फिल्म ‘इंडस्ट्रियल इंडिया’ में प्रेम अदीब पहली बार हीरो बने। वक्त गुजरा प्रेम अदीब का करियर का ग्राफ ऊपर उठता गया। दशक आया 40 का जब वो हिंदी सिनेमा में अमर हो गए। साल 1943 की फिल्म ‘रामराज्य’ प्रेम अदीब ने भगवान राम का रोल किया तो लोग सच में उन्हें भगवान राम का रूप मानने लगे। माता सीता के रोल में शोभना समर्थ को भी वही सम्मान मिलता। प्रेम अदीब में ही लोगों को 'श्री राम' नजर आने लगे। उनकी तस्वीर को लोग घरों में रखते और उनकी पूजा करते। यहीं नहीं गाड़ियों में, ट्रकों में भी श्री राम बने प्रेम अदीब की तस्वीरें मिलती। उस दौर का कोई भी डायरेक्टर हो जब भी कोई धार्मिक फिल्म बनाता तो भगवान राम की भूमिका के लिए सबसे पहले प्रेम अदीब को ही याद करता। इस तरह से करीब आठ फिल्मों में उन्होंने भगवान राम का किरदार निभाया।

 

प्रेेम अदीब के जीवन में आईं प्रतिमा कौल

साल 1943 में प्रेम अदीब के जीवन में पत्नी रूप में प्रतिमा कौल आई। प्रतिमा कौल के दादा विशेश्वर नाथ कौल रेलवे में डिप्टी सुपरिटेंडेंट के ओहदे पर पहुंचने वाले पहले इंडियन थे। प्रतिमा के पिता भी रेलवे में अहम पद पर थे और वहीं प्रेम अदीब के पिता भी रेलवे नौकरी करते थे। इस वजह से दोनों परिवारों जान पहचान थीं। प्रतिमा 6 बहनें और दो भाई थे। प्रतिमा अदीब की सबसे बड़ी बहन और इंदिरा गांधी की सगी मामी शीला कौल कांग्रेस की जानी-मानी नेता थीं बाद में वो केंद्र सरकार में कई अहम पदों पर रहीं। प्रेम अदीब की प्रतिमा अदीब से शादी हो गई थी, फिल्मी करियर भी बढ़िया चल रहा था पर एक हादसे ने सब कुछ बर्बाद कर दिया।

 

महज 43 साल की उम्र में हो गया निधन

फिल्म हिस्टोरीयन और लेखक शिशिर कुमार शर्मा को दिए एक इंटरव्यू में प्रतिमा अदीब ने बताया था कि साल 1949 की फिल्म ‘रामविवाह’ की शूटिंग चल रही थी। इस दौरान वो घर से स्टूडियो जा रहे थे तभी कार का एक्सीडेंट हो गया। उनके गुर्दे में गंभीर रूप से चोट आई। जिसके बाद से वो अगले 10 साल बेहद बीमार रहे। 25 दिसंबर साल 1959 में ब्रेन-हेमरेज से महज 43 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद साल 1960 में उनकी आखिरी फिल्म 'अंगुलिमाल' रिलीज हुई। प्रतिमा अदीब ने अगले 56 साल प्रेम अदीब की यादों के सहारे काटा और 29 दिसंबर साल 2016 को दुनिया से अलविदा कह दिया। प्रेम और प्रतिमा अदीब की एक बेटी दामिनी हुईं जिनकी शादी शैलेश सोहनी से हुई। प्रेम अदीब के भाई के पोते एक्टर चैतन्य अदीब है।

 

इंदुरानी ने रमणीक लाल से की शादी

इधर बेटे को जन्म देने के बाद इंदु रानी ने साल 1938 में 'मोहन पिक्चर' के बैनर तले बनी फिल्म 'वीरबाला' में काम किया। 'मोहन पिक्चर'  के मालिक थे सौराष्ट्र के मोहन लाल शाह। उनके भतीजे रमणीक लाल शाह कंपनी में उनके पार्टनर थे। रमणीक लाल शाह और इंदु रानी की दोस्ती हुई और साल 1939 में दोनों ने शादी कर ली। रमणीक लाल शाह ने इंदु रानी के बेटे को अपना नाम दिया। कुछ साल फिल्मों में काम करने के बाद इंदु रानी ने भी फिल्मों में से दूरी बना ली। रमणीक लाल शाह और इंदु रानी के पांच बच्चे हुए। इंदु रानी अपने दौर की सबसे महंगी हीरोइन बनीं। साल 1941 में महज 19 साल की उम्र में वो बेहद कम उम्र में मुंबई में बंगला खरीदने वाली पहली महिला थीं। 

 

बेटे को रही एक कसक

साल 1960 में इंदु रानी ने अपने बेटे का सलीम शाह रखा। पढ़ाई करने के लिए अमेरिका भेजा। बाद में इंदु रानी भी अमेरिका बस गईं और वहीं आखिरी सांस ली। इंदु रानी और रमणीकलाल शाह के पांचों बच्चे ने हमेशा सलीम शाह को बड़े भाई जैसा सम्मान दिया। लेखक और फिल्म हिस्टोरीयन शिशिर कृष्ण शर्मा के मुताबिक सलीम शाह ने फ्रांसीसी मूल की लड़की से शादी की। दो बेटे हुए। सलीम शाह को जीवन भर एक कसक रही। बेशक रमणीकलाल शाह ने सगे पिता की तरह प्यार किया पर उन्हें सगे पिता प्रेम अदीब का प्यार नहीं मिला।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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