Actor Raj Kapoor : दशकों तक किया लोगों के दिलों में राज

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अपने पे हंसकरजग को हंसाने वाले... जोकरकी जिंदगी में चाहे तमाम मुश्किलें हो। लेकिनवो दूसरों को खुश करने के लिए सब कुछ करता है। जोकरकिसी एक व्यक्ति का नहीं होता। वो पूरी पब्लिक का होता है।

अधूरी प्रेम कहानी लिए इस जोकर की फिलॉसफी को राज कपूर ने साल 1970 में रिलीज हुई फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ से समझानी चाही। अपने वक्त से आगे बनी इस फिल्म को तब लोग समझ नहीं पाए और फिल्म फ्लॉप हो गई। लेकिनआज इस फिल्म को एक कल्ट क्लासिक फिल्मों की लिस्ट में रखा जाता है। इसके पीछे की वजह शायद ये हो सकती हैजब लोगों ने राज कपूर की जिंदगी को करीब से समझाउनके बारे में जानातो लगा कि ये फिल्म कहीं न कहीं राज कपूर की खुद की लाइफ से जुड़ी हुई थी।

फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के जोकर की तरह ही राज कपूर ने भी लोगों को फिल्मों के तमाशे दिखाए। जोकर की तरह ही राज कपूर की भी प्रेम कहानी अधूरी रह गई। सर्कस जैसे इस बॉलीवुड में राज कपूर के आसपास कई सारे लोग अपना-अपना खेल दिखा रहे थे।

लेकिन, राज कपूर सब में अलग थेअकेले थे। एक शो मैन की तरह।

आज कहानी ग्रेट डायरेक्टर और एक्टर राज कपूर कीजिसने दशकों तक फिल्मों के जरिए लोगों के दिलों में राज किया। 

मेरा नाम जोकर के आखिरी सीन में जोकर के सम्मान खड़े होकर लोग ताली बजाते हैं और फिल्म खत्म हो जाती है। उसी सीन की तरह ही जब राज कपूर को फिल्मों का सबसे बड़ा अवार्ड मिला। उनके सम्मान में जब लोग ताली बजा रहे थे तभी उनकी तबीयत बिगड़ी और वो कोमा में चले जाते है। एक महीने बाद दुनिया छोड़कर चले गए।

जब बच्चा किसी सब्जेक्ट में फेल हो जाता है तो उसके परिवार वाले उसे डांटते हैं लेकिन, साल 1935 में रिलीज हुई। 

फिल्म ‘इंकलाब’ में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम कर चुके राज कपूर जब मैट्रिक में एक विषय में फेल हो गए तब उन्होंने अपने पिता पृथ्वीराज कपूर से कहा ‘मैं पढ़ना नहीं चाहतामैं फिल्मों में काम करना चाहता हूं।’

ये बात सुनकर पिता पृथ्वीराज कपूर ने डांटा नहीं। बल्कि उनकी आंखें खुशी से चमक उठीं।

दरअसल, 14 दिसंबर, साल 1924 को पाकिस्तान के पेशावर में जन्मे राज कपूर को फिल्मों की तरफ इसलिए भी रुझान तो क्योंकि पिता पृथ्वीराज कपूर खुद भी एक्टर थे। और उन्हीं की सलाह पर राज कपूर डायरेक्टर केदार शर्मा की यूनिट में बतौर क्लैपर बॉय के रूप में काम करने लगे। दिल में एक एक्टर बनने की तमन्ना थी तो फिल्म की शूटिंग के वक्त राज कपूर अक्सर क्लैप देते समय इस कोशिश में रहते कि किसी तरह उनका भी चेहरा कैमरे के सामने आ जाए। इसी चक्कर में एक बार उनसे गलती हो गई। जिसकी वजह से केदार शर्मा ने राज कपूर को जोरदार थप्पड़ मार दिया। ये थप्पड़ नहीं था राज कपूर की किस्मत बदलने वाली थी।

दरअसल, थप्पड़ मारने के बाद केदार शर्मा को अफसोस हुआ। इस अफसोस से उभरने के लिए केदार शर्मा ने अपनी एक फिल्म में राज कपूर को बतौर हीरो साइन कर लिया। फिल्म का नाम था साल 1947 में रिलीज हुई ‘नील कमल’।

राज कपूर के करियर की शुरुआत में एक्ट्रेस नरगिस के साथ जोड़ी खूब जमी।

साल 1948 में आई फिल्म 'बरसातमें पहली बार करने के बाद दोनों ने 'आवारा''चोरी-चोरी' और 'अनहोनी' जैसी 10 से ज्यादा फिल्में कीं।

फिल्म ‘श्री 420’ में बारिश में एक छाते के नीचे फिल्माये गाने ‘प्यार हुआ इकरार हुआ...’ में नरगिस और राज कपूर के प्रेम प्रसंग को शायद हम कभी भूल पाएं। ये दोनों एक दूसरे को भी रियल जिंदगी में दिल दे बैठे थे।

नरगिस, राज कपूर से शादी करना चाहती थीं। लेकिन, राज कपूर ये रिश्ता अपना न सकें। वजह थी, नरगिस से मिलने के दो साल पहले ही साल 1946 को राज कपूर की कृष्णा कपूर से शादी हो चुकी थी। राज कपूर पांच बच्चों के पिता थे। वो नरगिस को बेहद पसंद करते थे। लेकिन, उन्होंने कभी अपनी पत्नी को नहीं छोड़ा। इसी वजह से नरगिस का दिल टूट गया और वो राज कपूर से दूर चली गईं। नौ साल चली इस प्रेम कहानी का अंत हो गया।

साल 1958 में नरगिस ने सुनील दत्त से शादी कर ली। ये खबर को सुनने के बाद राज कपूर टूट गए। ये गम उन्हें पूरी जिंदगी सतता रहा। 

राज कपूर की पत्नी कृष्णा कपूर ने एक इंटरव्यू में बताया था कि  ‘नरगिस की शादी के बाद शायद ही कोई रात ऐसी बीती होगी जब राज कपूर रोए न होवो घर पर देर से आते। शराब के नशे में चूर होकर वो बाथटब में रोते। कई बार नशे में जलती सिगरेट से खुद को दागा भी करते।’

राज कपूर खुद की जिंदगी को फिल्मों में उतारते थे। अक्सर अपनी फिल्मों में वही दिखाते थेजिससे वो खुद गुजर चुके होते थे।

राज कपूर ने आरके स्टूडियो की नींव रखीं। इस बैनर के तले एक से बढ़कर एक सुपरहिट फिल्में बनाई। खुद तो बुलंदियों पर पहुंचे ही तमाम कलाकारों को भी मौका दिया।

साल 1988 में दादा साहब फाल्के के साथ साल 1971 में पद्म भूषण से सम्मानित राज कपूर को दो बार नेशनल अवार्ड और 11 बार फिल्मफेयर भी मिला है।

फिल्म समीक्षक प्रदीप सरदाना के लेख के मुताबिक,  2 मईसाल 1988 को दिल्ली में राज कपूर को दादा साहेब फाल्के अवार्ड दिया जा रहा था। तभी उनको अस्थमा का दौरा पड़ा। साथ बैठीं उनकी पत्नी कृष्णा कपूर ने अपने साथ रखे मिनी सिलेंडर से उन्हें ऑक्सीजन भी दिया। लेकिन, उनकी तबीयत नहीं संभली।

तत्कालीन राष्ट्रपति रामास्वामी वेंकटरमन ने प्रोटोकॉल की परवाह किए बिना राज कपूर की सीट पर आकर उन्हें फाल्के अवार्ड दिया। राज कपूर को फौरन एम्स में भर्ती कराया गया। पूरे एक महीने कोमा में रहने के बाद दो जून, 1988 को 63 साल की उम्र उनका निधन हो गया।

तमाशा तो खत्म हो गया। लेकिन, ये जोकर हमेशा-हमेशा के लिए अपनी पब्लिक के दिलों में यादें छोड़ गया।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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