Actor Rajendra Kumar : नींद में ही थम गईं सांसें

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साल 1959 में ‘गूंज उठी शहनाई’ फिल्म रिलीज हुई। प्रीमियर वाले दिन फिल्म को देखने के लिए मशहूर शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान भी आए। फिल्म देखकर जब वो बाहर निकले तो फिल्म में बतौर हीरो काम कर रहे एक्टर ने उनसे पूछा कि ‘खां साहब, आपको फिल्म और मेरी एक्टिंग कैसी लगी।’

बिस्मिल्लाह खान ने कहा कि – ‘फिल्म बहुत अच्छी है। पर आप तो फिल्म में थे ही नहीं।’

वो एक्टर बात समझ नहीं पाए। फिर मुस्कुराकर खां साहब ने एक्टर की तारीफ करते हुए कहा कि ‘कमाल की एक्टिंग की है आपने। मुझे लग रहा था, मैं ही थिएटर में हूं। एक्टिंग कर रहा हूं। अपने आप को देख रहा हूं।’

साल 1963 में फिल्म ‘मेरे महबूब’ में इसी एक्टर ने अनवर नाम के हीरो का किरदार निभाया। तब बहुत से लोगों को लगा कि ये रियल में ही मुस्लिम हैं। इनके घर लोग चिट्ठी भेजते। पूछते - जैसे यूसुफ खान साहब है दिलीप कुमार लिखते है। वैसे ही आपका कोई असली नाम तो होगा।

उस एक्टर ने बड़ी सादगी से कहा ‘मेरा नाम राजेंद्र कुमार तुली है और यही मेरा असली नाम है।’ 

वो एक्टर जिनकी फिल्में सुपरहिट होने की गारंटी थी। उस दौर की हर कलाकार इसके साथ काम करना चाहता था। इन्हें जुबली कुमार कहा गया। 

आज कहानी राजेंद्र कुमार की। जिनकी जिंदगी में एक ऐसा दौर भी आया जब इन्हें स्टारडम भी गंवाना पड़ा अपना बंगला भी बेचना पड़ा।

पाकिस्तान के सियालकोट में 20 जुलाई 1929 को राजेंद्र कुमार का जन्म हुआ। पिताजी का टेक्सटाइल का काम थे। उनके पास खूब जमीन और प्रॉपर्टी थी, लेकिन 1947 के बंटवारे के कारण उन्हें सब कुछ छोड़कर दिल्ली आना पड़ा। राजेंद्र कुमार ने अपनी पढ़ाई पूरी की। उनकी की पुलिस में नौकरी भी लग गई। पर राजेंद्र कुमार को फिल्मों में काम करना था। नौकरी ज्वाइन नहीं की। ट्रेन का टिकट लिया और मुंबई पहुंच गए। लेकिन मुंबई पहुंचकर उन्हें जल्द ही समझ आ गया कि एक्टिंग की राह इतनी आसान नहीं है। इसी संघर्ष के बीच उनकी मुलकाता गीतकार राजेंद्र कृष्ण से हो गई। और उन्हीं की मदद से उनको 150 रुपये महीने की सैलरी पर डायरेक्टर एचएस रवैल के असिस्टेंट के तौर पर काम मिला।

डायरेक्टर एचएस रवैल ने ही उन्हें पहली बार एक्टिंग का मौका दिया साल 1949 की फिल्म 'पतंगा' में। फिल्म में उनका बेहद छोटा सा रोल था। उसी छोटे से रोल की वजह से डायरेक्टर केदार शर्मा ने फिल्म ‘जोगन’ में दिलीप कुमार के एक दोस्त का रोल दिया। उनकी मेहनत रंग लाई और छोटे-मोटे किरदारों से शुरू हुआ उनका सफर साल 1955 में लीड किरदारों पर खत्म हुआ। साल 1955 की फिल्म ‘वचन’ से बतौर हीरो डेब्यू किया। फिल्म ने सिल्वर जुबली मनाई। 25 हफ्तों तक सिनेमा हॉल में ये फिल्म चलती रही।

साल 1959 की ‘गूंज उठी शहनाई’ से लेकर साल 1966 की फिल्म ‘सूरज’ तक राजेंद्र कुमार के करियर में एक वो दौर आया जब उनकी हर फिल्म हिट हुई। इन सात सालों में 25 से ज्यादा फिल्में की जिसमें एक भी फिल्म फ्लॉप नहीं थी। स्टारडम ऐसा था कि माला सिन्हा, नंदा, मीना कुमारी, वैजयंतीमाला, नूतन, सायरा बानो, हेमा मालिनी हर एक्ट्रेस उनके साथ काम करना चाहतीं। देखते देखते अपने वक्त के सबसे अमीर एक्टर्स में शामिल हो गए। उन्होंने 60 हजार रुपये में बांद्रा के कार्टर रोड पर समुद्र किनारे बने एक्टर भारत भूषण का बंगला खरीदा। इसे नाम दिया 'डिंपल'। डिंपल उनकी बेटी का नाम था। राजेंद्र कुमार की शादी डायरेक्टर और प्रोड्यूसर रमेश बहल की बहन शुक्ला देवी के साथ हुई थी। उनके तीन बच्चे हुए। दो बेटी, एक बेटा – कुमार गौरव।

सबके दिलों में राज करने वाले राजेंद्र कुमार की जिंदगी में एक दौर आया जब उनकी फिल्में नहीं चलती। कारण। इंडस्ट्री में राजेश खन्ना की एंट्री हो चुकी थी। राजेश खन्ना के चार्म और उनकी एक्टिंग का ऐसा जादू चला कि वो बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार बन गए, वहीं राजेंद्र कुमार का करियर ढल गया।

उनके आर्थिक हालात खराब होने लगे। उन्हें अपना बंगला 'डिंपल' बेचना पड़ा। वो बंगला खरीदा भी राजेश खन्ना ने ही। उसका नाम बदल कर 'आशीर्वाद' रख दिया।

राजेंद्र कुमार फिर से खड़े हुए। बतौर फिल्म प्रोड्यूसर उन्होंने अपने बेटे कुमार गौरव को हीरो लेकर 'लव स्टोरी' और ‘नाम’ फिल्म बनाई।

राजेंद्र कुमार की जिंदगी के आखिरी दो साल बेहद दर्द और दुख भरे रहे। उनका वो वक्त अस्पतालों में बीता। उन्हें एक गंभीर बीमारी हो गई जिससे उन्हें खून का इंतजाम करना भी मुश्किल हो गया।

सीमा सोनिक आलिम चंद की किताब 'Jubilee Kumar: The Life and Times of a Superstar' के मुताबिक 4 दशक में 80 से भी ज्यादा फिल्में करने वाले राजेंद्र कुमार ने 12 जुलाई साल 1999 को दुनिया से अलविदा कह दिया। ऐसा कहा जाता है कि उन्हें नींद में कार्डियक अरेस्ट आया था और उनकी सांसें थम गईं।

साल 1970 में पद्म श्री से सम्मानित राजेंद्र कुमार को 'जुबली कुमार' का खिताब मिला। उन्हें 3 बार फिल्मफेयर अवॉर्ड के लिए लगातार नॉमिनेट किया गया। एक बार भी अवार्ड नहीं मिला।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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