Actor Rajesh Khanna : खिड़की पर बैठ घंटों करते किसी के आने का इंतजार पर कोई नहीं आता

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चार्मिंग लुक्स, शानदार एक्टिंग से एक्टर राजेश खन्ना (Actor Rajesh Khanna) ने ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं। उस दौर का हर हीरो निराशा और ईष्या से भर गया। इनकी एक झलक पाने के लिए उनके बंगले के बाहर घंटों लोग खड़े रहते।

 

शर्मिला टैगोर ने बेमन से किया काम   

साल 1969 नवंबर का महीना था फिल्म 'आराधना' रिलीज हुई। फिल्म के डायरेक्टर थे शक्ति सामंत। उन्होंने अपनी फेवरेट हीरोइन शर्मिला टैगोर को बतौर हीरोइन साइन किया। लेकिन शर्मिला टैगोर को फिल्म में काम करने का ज्यादा मन नहीं था। पर शक्ति सामंत का आदेश शर्मिला टैगोर कैसे टाल सकती थीं। वो उनको अपना गुरु मानती थीं। शर्मिला टैगोर के मना करने की वजह फिल्म के हीरो थे जो नए-नवेले थे। इंडस्ट्री में अपने पैर जमाने के लिए स्ट्रगल कर रहे थे। बहुत से लोगों को ये लग रहा था कि फिल्म कुछ कमाल नहीं कर पाएगी पर सभी गलत साबित हुए।

जनता को एक नया सुपरस्टार मिला

फिल्म हिस्टोरीयन अली पीटर जॉन अपने एक लेख में लिखते हैं कि 'फिल्म 'आराधनाके फर्स्ट डेफर्स्ट शो से पहले तक फिल्म का नया नवेला हीरो एक संघर्षरत सितारा था। लेकिन दोपहर 12 बजने के बाद थियेटर से निकलने वाले हर शख्स की जुबां पर फिल्म के हीरो का नाम था। इस फिल्म के बाद जनता को एक नया सुपरस्टार मिला। नाम था – राजेश खन्ना।'

गाड़ियों की धूल को बनाया मांग का सिंदूर

चार्मिंग लुक्सशानदार एक्टिंग और जबरदस्त डायलॉग डिलीवरी की वजह से उनकी एक के बाद फिल्म ब्लॉकबस्टर होती गई और उस दौर का हर हीरो निराशा और ईष्र्या से भर गया। ये वो वक्त था जब सिर्फ राजेश खन्ना का सिक्का चला। एक झलक पाने के लिए उनके बंगले के बाहर घंटों लोग खड़े रहते। लाखों लड़कियों की दीवानगी ऐसी की अपने खून से लेटर लिखतीं। उनकी कार को चूम-चूम कर लिपस्टिक से रंग देती। उनकी गाड़ियों की धूल को अपनी मांग का सिंदूर बना लेतीं। उनकी फोटो को तकिए के नीचे रख कर सोती ताकि सपने राजेश खन्ना के ही आएं। कई ने तो उनकी फोटो तक से ही शादी कर ली। राजेश खन्ना का स्टारडम का वो आलम था कि ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन यानी बीबीसी ने उन पर 'बॉम्बे सुपरस्टार इन 1974' टाइटल से एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई।

'वो केवल एक भगवान है'

फिल्म हिस्टोरीयन अली पीटर जॉन अपने एक लेख में लिखते हैं कि 'कई सारे डायरेक्टर-प्रोड्यूसर राजेश खन्ना को भगवान मानकर फिल्म बनाते गए। एक वक्त वो आया जब उनके लाखों प्रशंसकों ने राजेश खन्ना को विश्वास दिलाया कि वो केवल एक भगवान है।।।'

'मुझसे25 साल बाद बात करना।'

एक पत्रकार ने राजेश खन्ना के बारे में एवरग्रीन एक्टर देव आनंद से एक सवाल पूछा –  'आप नए सुपरस्टार के बारे में क्या सोचते हैं। तो देव आनंद ने अपने स्टाइल में दोनों हाथों को हवा में लहराते हुए कहा – 'मुझसे25 साल बाद बात करना।' वक्त गुजरा और राजेश खन्ना माउंट एवरेस्ट की चोटी से जमीन की और धीरे-धीरे गिरते चले गए।

जिगर के टुकड़े को दूसरे के हवाले कर दिया

ये वक्त था, 40 के दशक की शुरुआत का। तब पंजाब के अमृतसर का बुरेवाला गांवपाकिस्तान का नहीं भारत का हिस्सा था। यहां पर 'खन्ना हवेलीमें अपनी पत्नी चंद्ररानी के साथ रहते थे लाला हीरानंद खन्ना। इन्हीं के घर  29 दिसंबरसाल 1942 को एक बेटे हुआ। नाम रखा – जतिन खन्ना। लेकिन चंद्ररानी और लाला हीरानंद खन्ना ने अपने बेटे जतिन को नहीं पाला। अपने जिगर के टुकड़े को किसी और के हवाले कर दिया। वजह थी - गरीबी और मुफलिसी।

परिवार ने झेला बंटवारे का दंश

दरअसलगांव के एक स्कूल में टीचर लाला हीरानंद खन्ना के कुल छह बच्चे थे। किसी तरह गुजारा करते। लेकिन हालात तब और खराब हो गए जब साल 1947 का बंटवारा हुआ। लाला हीरानंद खन्ना सब कुछ छोड़कर मुंबई आ गए। लाला हीरानंद खन्ना के पास इतने भी पैसे नहीं थे कि वो सभी बच्चों को पेट पाल सकें। उधर लाला हीरानंद खन्ना के एक भाई थे लाला चुन्नीलाल खन्ना, जिनके कोई बच्चे नहीं थे।

किसी चीज की नहीं होने दी कमी

आखिरकार छह साल के जतिन को उनके पिता हीरानंद खन्ना ने अपने भाई चुन्नीलाल खन्ना को सौंप दिया। पत्नी लीलावती खन्ना के साथ लाहौर से मुंबई बस चुके लाला चुन्नीलाल खन्ना, रेलवे कांट्रेक्टर थेपैसे वाले भी थे। लीलावती और चुन्नीलाल, जतिन को खूब प्यार करतीं। किसी भी चीज की कमी नहीं होने दी।

जतिन खन्ना से बने राजेश खन्ना

वक्त गुजरापढ़ाई के साथ जतिन खन्ना थियेटर भी करते। नाटकों में भाग लेते, कई अवार्ड भी मिले। मुंबई के केसी कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के बाद तय कियाफिल्मों में हीरो बनेंगे। लेकिन एक अड़चन आ गईँ। पिताजी नहीं चाहते थे कि वो फिल्मों में जाएं। इस परेशानी से निकालने में उनके मामा केके तलवार ने एक तरीका निकाला। जतिन खन्ना का नाम बदल दिया। अब जतिन खन्नाराजेश खन्ना हो गए। राजेश खन्ना काका नाम से भी खूब फेमस हुए। दरअसलबचपन से ही उन्हें काका कहकर बुलाया जाता था। पंजाबी में काका का मतलब छोटा बच्चा होता है।

दस हजार लोगों में चुन कर आए

साल 1965 में यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स संगठन और फिल्मफेयर ने एक ऑल इंडिया टैलेंट हंट कॉन्टेस्ट किया। जिसमें 10 हजार लोगों ने पार्टिसिपेट किया। राजेश खन्ना विनर रहे। इनाम के तौर पर इन्हें दो फिल्में मिलीं। साल 1966 की 'आखिरी खतजो फ्लॉप हो गई और साल 1967 की 'राजजो बॉक्स ऑफिस पर तो चली पर राजेश खन्ना को खास पहचान नहीं मिली।

तीन सालों में दी लगातार 17 सुपरहिट फिल्में 

फिर साल आया 1969। फिल्म 'आराधनाआई। इसके बाद से लेकर साल 1972 के अंत तक वो सत्ताधारी सुपरस्टार ही रहे। इन तीन सालों में 'कटी पतंग', 'खामोशी', 'हाथी मेरे साथी', 'अमर प्रेमजैसी लगातार करीब 17 हिट फिल्में दी। इस रिकॉर्ड को आज तक कोई भी हीरो नहीं तोड़ पाया।

स्पोर्ट्स कारों के बेहद शौकीन 

स्पोर्ट्स कारों के शौकीन राजेश खन्ना का रुतबा ऐसा की स्ट्रगल के दौरान वो ऑडिशन देने अपनी एमजी स्पोर्ट कार से जाते थे। तब इस तरह की कार उस वक्त के किसी भी हीरो के पास भी नहीं होती थी। उनकी महंगी कारें देखकर फिल्म डायरेक्टर और प्रोड्यूसर असहज महसूस करते थे।

लेट-लतीफी के लिए थे मशहूर 

अली पीटर जॉन अपने एक लेख में लिखते हैं कि 'राजेश खन्ना अपनी लेट-लतीफी के लिए भी मशहूर थे। जब उनका मन करता थावो तभी सेट पर आते। वो किसी के लिए अपनी लाइफस्टाइल से समझौता कतई नहीं करते। जो भी उनकी तारीफ करता वो ही आदमी उन्हें अच्छा लगता। किसी की अपने आगे नहीं सुनते। उन्हें अपने स्टारडम का घमंड हो गया।'

अब अमिताभ का दौर आ चुका था

पर वक्त एक जैसा नहीं रहता। साल 1973 में उनकी फिल्में फ्लॉप होने लगीं। जो लोग उन्हें पूजते थेउनसे दूर जाने लगे। क्योंकि इंडस्ट्री में अमिताभ बच्चन ने फिल्म 'जंजीरसे दस्तक दे दी थी। वो अमिताभ बच्चन जो दो साल पहले तक राजेश खन्ना की फिल्म 'आनंदमें सेकंड हीरो की भूमिका निभाने के लिए भी तैयार थे। वो धीरे-धीरे लोगों के दिलों में छा रहे थे और राजेश खन्ना को लोग भूल रहे थे। अब लोग पार्टियों में राजेश खन्ना से नहीं बल्कि नए सुपरस्टार अमिताभ बच्चन से ऑटोग्राफ लेते।

रात भर पीते - दिन भर पीते

अली पीटर जॉन अपने लेख में लिखते हैं कि 'इस तरह से अपने को गिरते देख राजेश खन्ना शराब और सिगरेट की गिरफ्त में आए। रात भर पीते, दिन भर पीते।' ये एक महान युग के अंत की शुरुआत थी जो और भी ज्यादा समय तक चल सकता था यदि राजेश खन्ना को - ये विश्वास नहीं होता कि वो भगवान हैं।'

लोकप्रियता हासिल करने के लिए राजनीति में भी आए

राजेश खन्ना अपनी लोकप्रियता हासिल करने के लिए राजनीति में भी आएएक्टर शत्रुघ्न सिन्हा को हराकर लोकसभा का चुनाव जीतालेकिन अगले चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी से हार गए और ये उनके राजनीतिक करियर का अंत था। उन्होंने फिल्में भी बनाई और टीवी सीरियल भी बनाए पर वो जादू नहीं चल सका।

तीन एक्ट्रेस से की मोहब्बत और डिंपल से शादी

राजेश खन्ना ने मुमताजटीना मुनीम और अंजू महेंद्रू से प्यार किया। पर शादी साल 1971 में अपनी उम्र से 15 साल छोटी डिंपल कपाड़िया से की थी। गिरते स्टारडम के चलते राजेश खन्ना और डिंपल कपाड़िया के रिश्ते में तनाव आया। डिंपल अपनी दोनों बेटियों ट्विंकल और रिंकी खन्ना को लेकर अलग हो गई।

कर्जे के कारण गिरवी रखना पड़ा बंगला

राजेश खन्ना भारी कर्ज में आए। उन्हें अपना बंगला गिरवी रखना पड़ा। वो सिर्फ एक कमरे में रहते अब उनके पास कोई कार नहीं थी वो घंटों खिड़की पर बैठे रहते किसी के आने का इंतजार करतेलेकिन कोई नहीं आता।

जिंदगी के आखिरी दिनों में कैंसर से जूझे 

एक दिन पता चला उन्हें कैंसर हो गया। अब उनके परिवार में दामाद के रूप में बड़े स्टार अक्षय कुमार शामिल थे। जिन्होंने उनकी बेटी ट्विंकल खन्ना से शादी की थी। राजेश खन्ना जिनका हर किरदार लाजवाब रहा। लंबी बीमारी के बाद राजेश खन्ना ने 18 जुलाई साल 2012 को आखिरी सांस ली। उस दिन तेज बारिश हो रही थी, जो इस बात का प्रतीक थी कि तीन पीढ़ियों के चहेते सुपरस्टार ने अलविदा कहा है।

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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