Actor Vinod Khanna जो Big B को टक्कर देने का दम रखते थे!

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बेहद शर्मीले एक बच्चे को टीचर ने जबरदस्ती एक प्ले में उतारा तो एक्टिंग का शौक जागा। 'सोलवां साल' और 'मुगल-ए-आज़म' जैसी फिल्में देखी तो एक्टर बनने की ख्वाहिश पैदा हुई। पिता ने दो साल का वक्त दिया तो कड़ी मेहनत करके फिल्म इंडस्ट्री में पहले एक विलेन और फिर बाद में बेहद स्टाइलिश एक्टर के रूप में अपनी जगह बनाई। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि अचानक परिवार और करियर छोड़कर सन्यास ले लिया। कई सालों बाद जब दोबारा लौटे तो सब कुछ बिखर गया था। पत्नी ने तलाक ले लिया। ऐसा कहा जाता है कि अगर इन्होंने संन्यास न लिया हो तो महानायक अमिताभ बच्चन को एक्टिंग के मामले में कहीं पीछे छोड़ देते।

आज कहानी अपने दौर के बेहद फिट और हैंडसम दिखने वाले एक्टर विनोद खन्ना कि जब ये अस्पताल में थे तब इनकी एक फोटो वायरल हुए जिसे देखकर इनके फैन बहुत हैरान हुए।

टेक्सटाइल और केमिकल का बिजनेस करने वाले कृष्णचंद खन्ना और कमला के घर पाकिस्तान के पेशावर में 6 अक्टूबर, साल 1946 को विनोद खन्ना का जन्म हुआ। विनोद पांच भाई बहनों में से एक थे। आजादी के बाद बंटवारा हुआ था परिवार पेशावर से मुंबई चला आया। नासिक के एक बोर्डिंग स्कूल से विनोद ने स्कूलिंग की, कॉमर्स से पोस्ट ग्रेजुएशन किया। क्रिकेट भी खेलते। स्वभाव से शर्मीले विनोद खन्ना ने एक दिन कुछ फिल्में देखी तो एक्टर बनने का ख्वाब जाग गया। फिर जब ये बात घर में बताई कि ‘मैं एक्टर बनना चाहता हूं’ तो बवाल मच गया। शहर के बड़े व्यापारियों में एक कृष्णचंद खन्ना नहीं चाहते थे कि उनका बेटा फिल्मों में काम करे। वे चाहते की विनोद उनका बिजनेस संभाले। विनोद ने जिद की तो पिताजी ने सामने एक शर्त रख दी कि ‘उनके पास सिर्फ दो साल का वक्त है। अगर सफल हो गए तो ठीक वरना फिर उनको बिजनस में आना पड़ेगा।’

विनोद ने ये शर्त मंजूर कर दी और थियेटर करने लगे।

साल था 1968 जब एक्टर सुनील दत्त अपने छोटे भाई सोम दत्त को बतौर हीरो लेकर फिल्म 'मन का मीत' बना रहे थे। अभी फिल्म में विलेन के रोल के लिए कास्टिंग बची थी। तभी उनकी नजर मुंबई में फिल्मों में काम की तलाश के लिए इधर-उधर घूम रहे विनोद खन्ना पर पड़ी। विनोद को सुनील दत्त ने जब विलेन का रोल का ऑफर किया तो विनोद पहले थोड़ा हिचकिचाए क्योंकि वे हीरो बनना चाहते थे। लेकिन सुनील दत्त के बार-बार कहने पर हामी भर दी। जब फिल्म देखकर लोग थियेटर से निकले तो हर किसी की जुबां पर हीरो सोम दत्त का नहीं विलेन विनोद खन्ना का नाम था। फिल्म सुपरहिट हुई। विनोद खन्ना के आगे डायरेक्टर और प्रोड्यूसर की लाइन लग गई। अब हर कोई उनको अपनी फिल्म में लेना चाहता था। इसके बाद ‘पूरब और पश्चिम’, ‘आन मिलो सजना’, 'सच्चा झूठा', 'मस्ताना' और ‘मेरा गांव मेरा देश जैसी’ फिल्में की जिसमें उन्होंने विलेन के ही रोल किए। लेकिन विनोद को विलेन की छवि से बाहर निकलना था।

साल 1971 में डायरेक्टर शिव कुमार की फिल्म 'हम तुम और वो' में विनोद खन्ना बतौर हीरो नजर आए। साल 1973 में आई गुलजार की फिल्म ‘मेरे अपने’ भी हिट हुई। इसके बाद रिलीज हुई 'अचानक' और इस फिल्म ने उनकी विलेन की छवि को बदल दिया। बॉलीवुड को एक हीरो मिल चुका था। विनोद खन्ना की करियर की गाड़ी चल निकली तो साल 1971 में थिएटर करने के दौरान दोस्त बनीं गीतांजलि से शादी की। उनके अक्षय खन्ना और राहुल खन्ना के पिता बन गए। वक्त गुजरा और फिल्मों के जरिए विनोद खन्ना का सितारा बुलंदियों पर जा पहुंचा। राजेश खन्ना के फैन विनोद खन्ना को कभी मल्टीस्टारर फिल्मों से परहेज नहीं था। अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना की जोड़ी को दर्शकों ने काफी पसंद किया। हेराफेरी, खून पसीना, अमर अकबर एंथोनी, मुकद्दर का सिकंदर ब्लॉकबस्टर साबित हुईं। विनोद खन्ना जब अपने करियर के शीर्ष पर थे । उसी दौर में अमिताभ बच्चन भी अपनी फिल्मों के जरिये एंग्री यंग मैन की इमेज बना चुके थे। ऐसा कहा जाता था कि विनोद खन्ना ही ऐसे एक्टर थे जो अमिताभ को टक्कर दे सकते थे।

विनोद खन्ना हर तरह से सफल थे, लेकिन न जाने क्यों उन्हें अपनी जिंदगी में एक खालीपन महसूस होता था। उनके पास दौलत, शोहरत, परिवार सब कुछ था, लेकिन खुद को जानने की बेचैनी भी थी। शायद वे मां के निधन से पूरी तरह टूट गए थे।

इन्हीं दिनों विनोद खन्ना धार्मिक गुरु ओशो रजनीश के संपर्क में आए जिसने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी।

साल 1981-82 के आसपास अचानक खबर आई की विनोद खन्ना ने शोहरत और दौलत की इस दुनिया को ठुकरा कर संन्यास ले लिया है। अपना सारा लग्ज़री सामान गरीबों को दान कर दिया। परिवार को भी पीछे छोड़कर अमेरिका चले गए। इस खबर के बाद पूरी इंडस्ट्री में हड़कंप मच गया था। सभी हैरान थे। अमेरिका में ओशो के आश्रम में विनोद लगभग पांच सालों तक गार्डन में माली का काम करते। वे जूठे बर्तन यहां तक कि आश्रम के टॉयलेट तक साफ किया करते थे। जब अमेरिकी गवर्मेंट ने ओशो के आश्रम बंद किए तब विनोद का भी ओशो से मोह भंग हुआ और वे भारत लौट आए। लेकिन वक्त उनके हाथ से निकल चुका था। उनका परिवार और करियर दोनों बिखर चुके थे। शादी के 14 साल बाद साल 1985 को पत्नी गीतांजलि ने भी विनोद खन्ना से तलाक ले लिया था। लेकिन विनोद खन्ना ने अपने आप को दोबारा से खड़ा किया। उन्होंने साल 1987 में रिलीज हुई डायरेक्टर मुकुल आनंद की फिल्म ‘इन्साफ’ में काम किया। फिल्म हिट हुई। बॉलीवुड में दोबारा से पैर जमाने शुरू किए तो निजी जीवन में भी उन्होंने साल 1990 में कविता से दूसरी शादी कर ली। एक बेटी और एक बेटा हुआ। चार-पांच साल तक बतौर हीरो का रोल करने के बाद वे धीरे-धीरे चरित्र भूमिकाओं की ओर मुड़ गए। विनोद खन्ना को अपनी फिल्मों के लिए लकी मानने वाले सलमान खान की 'दबंग' और 'वांटेड' जैसी फिल्मों में विनोद खन्ना नजर आए। विनोद खन्ना एक्टर होने के साथ – साथ पॉलिटिशियन भी रहे। उन्होंने साल 1997 में बीजेपी ज्वाइन की। चार बार पंजाब के गुरदासपुर क्षेत्र से सांसद चुने गए। फिल्म इंडस्ट्री का कोई भी ऐसा सितारा नहीं है जो इतनी बार चुनाव जीता हो। वे Union Minister of Culture and Tourism भी रहे और Minister of State for External Affairs भी बनाए गए।

साल 2010 में उन्हें गॉल ब्लैडर कैंसर हो गया। साल 2016 तक फिल्मों में काम करने वाले विनोद की तबीयत खराब हुई तो उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनकी एक तस्वीर वायरल हुई जिन्हें देखकर उनके फैन भौचक्के रह गए। 27 अप्रैल साल 2017 जब विनोद खन्ना ने उस दुनिया को अलविदा कह दिया।

विनोद खन्ना ने करीब 150 फिल्मों में काम किया और अपनी शानदार एक्टिंग से लोगों के दिलों में खास जगह बनाई। 40 साल के फिल्मी सफर के लिए साल 1999 को उन्हें फिल्मफेयर का लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया। साल 2017 में उनके निधन के बाद उन्हें दादा साहेब फाल्के से भी सम्मानित किया गया। आज भले ही विनोद खन्ना हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अपने चाहने वालों की यादों में वे हमेशा मौजूद रहेंगे और ऐसे ही उनके किस्से कहानियां हमेशा सुने और सुनाए जाते रहेंगे।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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