Actress Asha Parekh : प्रेम किया पर नहीं हो पाई शादी

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आशा पारेख से कहा गया था कि आप कभी हीरोइन नहीं बन सकतीं। लेकिन इन्होंने इस बात को गलत साबित किया और 60 और 70 के दशक में टॉप की एक्ट्रेस बनीं और सिनेमा का सबसे बढ़ा सम्मान दादा साहेब फाल्के से सम्मान मिला।

'हां, एक वक्त था जब मैं ये सब चाहती थी, लेकिन अब जब मैं बहुत सारे दुसरे शादी शुदा लोगों को देखती हूं कि वो जबरदस्ती के रिश्तों में बंध कर रिश्तों को ढो रहे हैं तब मैं अच्छा महसूस करती हूं कि मैं इस तरह के किसी भी रिश्ते में नहीं हूं। आज पति-पत्नी के बीच हो रहे तनाव, बच्चों के लिए तनाव को देखकर मुझे ठेस पहुंचती हैं।'

एक इंटरव्यू में ये बातें अपने दौर की दिग्गज एक्ट्रेस आशा पारेख ने कहीं थी।

वो आशा पारेख जिनसे कहा गया था कि आप कभी हीरोइन नहीं बन सकतीं। लेकिन इन्होंने इस बात को गलत साबित किया और 60 और 70 के दशक में टॉप की एक्ट्रेस बनीं और इन्हें सिनेमा का सबसे बढ़ा सम्मान दादा साहेब फाल्के से सम्मानित किया गया।

वो आशा पारेख जो हिट फिल्में देने की गारंटी बनीं। इसलिए ‘हिट गर्ल’ का खिताब मिला। आशा पारेख जिनके फैशन को कॉपी किया जाता था। इन्हें ‘टॉम ब्वाय’ कहते।

आशा पारेख जिनको देखने के लिए, जिनसे बात करने के लिए, लाखों दिल मचलते पर इन्होंने अपने प्यार की याद में जिंदगी अकेले काट दी।

बच्चूभाई पारेख एक हिंदू गुजराती फैमिली से थे। उनका दिल आया सलमा पर, जो एक मुसलमान थीं। दोनों ने शादी की और सलमा बन गईं सुधा पारेख। 02 अक्टूबर साल 1942 को बच्चूभाई पारेख और सुधा पारेख को बेटी हुई। नाम रखा आशा पारेख। 

मां सुधा डांस की शौकीन थीं इसलिए बेटी आशा को भी क्लासिकल डांस सीखने भेजा। नौ-दस की उम्र में आशा स्टेज शोज करतीं। ऐसे ही एक प्रोग्राम में दिग्गज फिल्म डायरेक्टर विमल राय ने आशा का डांस करते देखा तो वो देखते रह गए। उसी वक्त उन्होंने आशा से पूछा कि, ‘मेरी फिल्म में काम करोगी।’ आशा पारेख ने हामी भरी तो साल 1952 की फिल्म ‘मां’ में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम करने का मौका मिला। चाइल्ड आर्टिस्ट ही अगले सात सालों में करीब आठ फिल्में की। पर आशा को निराशा हुईं।

वजह थी ये फिल्में ज्यादा सफल नहीं हुई और आशा पारेख को भी कोई खास पहचान नहीं मिली। आशा फिल्में तो कर ही रहीं थी। साथ में अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। 10वीं के बाद ख्याल आया कि डॉक्टर या इंजिनीयर बन जाऊं पर फिर पक्के मन से तय किया फिल्मों में ही काम करना है। पर रास्ता आसान नहीं था। इन्हें पहली फिल्म में ही रिजेक्शन झेलना पड़ा।

साल 1959 की फिल्म 'गूंज उठी शहनाई' के लिए 17 साल की उम्र में आशा पारेख ने ऑडिशन दिया। फिल्म के प्रोड्यूसर और डायरेक्टर थे महान फिल्मकार विजय भट्ट। उन्होंने आशा को फिल्म के लिए चुन तो लिया, पर दो दिन की शूटिंग के बाद फिल्म से निकाल भी दिया।

कहा कि 'आप कभी हीरोइन नहीं बन सकतीं। आपमें  स्टार जैसी कोई बात नहीं।' पर किस्मत के आगे किसी का जोर नहीं चलता।

बतौर एक्ट्रेस आशा पारेख को पहला ब्रेक दिया फिल्म प्रोड्यूसर शशधर मुखर्जी ने। साल 1959 की फिल्म 'दिल देके देखो'। स्क्रीन पर शम्मी कपूर का साथ मिला और आशा की किस्मत ने करवट ली। इसके बाद आशा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी जोड़ी शम्मी कपूर के साथ तो जमी, वक्त के साथ मनोज कुमार, राजेश खन्ना, शशि कपूर, धर्मेंद्र, जीतेंद्र, अमिताभ और जॉय मुखर्जी जैसे एक्टर्स के साथ भी देखकर इनको खूब पसंद किया गया। इन्होंने चुलबुले और चंचल रोल भी किए। और जब साल 1971 की फिल्म 'कटी पतंग' में एक विधवा का रोल किया तो फिल्मी जानकारों ने कहा कि 'आशा पारेख ने अपने करियर का अंत कर दिया।' लेकिन सब गलत हुए। फिल्म के लिए फिल्मफेयर का बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड मिला।

1992 में पद्मश्री और साल 2022 में दादा साहेब फाल्के से सम्मानित आशा पारेख ने 47 के साल के सफर में हिंदी, गुजराती, पंजाबी और कन्नड भाषा में करीब 75 से ज्यादा फिल्में की। आखिरी बार साल 1999 की फिल्म 'सर आंखों पर' में नजर आईं। पांच से ज्यादा टीवी सीरियल को प्रोड्यूस और डायरेक्ट भी किया।

इनका पहला प्यार डांस हैं। आज 81 साल की उम्र में 'गुरुकुल' नाम से एक डांस स्कूल चलाती हैं। 'आशा पारेख हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर' का संचालन कर समाज सेवा भी कर रहीं हैं। इनके इंडस्ट्री में कई दोस्त हैं । शेखर कपूर, देव आनंद, सावन कुमार और फिरोज खान से उनके रिश्ते तल्ख भी हुई। जब ये साल 1998 से 2001 तक सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष रहीं।

पत्रकार खालिद मोहम्मद ने आशा पारेख की बायोग्राफी द हिट गर्ल लिखी है। आशा पारेख के जिंदगी में सब कुछ है पर मां-पिता के निधन के बाद वो अकेले हैं।

मां सुधा को चिंता थी, आशा ने शादी तो नहीं की है। वो अकेले कैसे रहेगी। इसलिए दुनिया छोड़ते वक्त अपनी दोस्त एक्ट्रेस शम्मी आंटी से वादा लिया, कहा कि ‘मेरे बाद आप आशा का हमेशा ध्यान रखना।’

दरअसल 60 और 70 दशक में आशा पारेख का अलग ही चार्म था उनसे कई लोग शादी करना चाहते पर उनका दिल डायरेक्टर और प्रोड्यूसर नासिर हुसैन के लिए धड़कता।

अपनी पहली फिल्म साल 1959 की 'दिल देके देखो' में उनकी मुलाकात नासिर हुसैन से हुई। नासिर हुसैन भी इस फिल्म में पहली बार बतौर डायरेक्टर काम करे रहे थे। दोनों करीब आए। बतौर डायरेक्टर नासिर हुसैन अपनी सात फिल्मों के लिए आशा पारेख को ही एक्ट्रेस लिया। इनके रिश्ते जग जाहिर थे पर शादी नहीं की।

दरअसल नासिर हुसैन शादीशुदा थे। और वो अपनी पत्नी को धोखा नहीं देना चाहते थे। इसलिए पीछे हटे। आशा पारेख ने भी फिर शादी नहीं की।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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