Actress Fearless Nadia : रोती-धोती-कलपती नहीं, ये पीट-पीटकर रुला देतीं

Home   >   किरदार   >   Actress Fearless Nadia : रोती-धोती-कलपती नहीं, ये पीट-पीटकर रुला देतीं

29
views

फीयरलेस नाडिया, स्पाइडरमैन - सुपरमैन की तरह बहादुर और सच्चाई की राह पर चलकर सुपवुमन का किरदार निभातीं। मर्दों से कुश्ती, तलवारबाजी, घुड़सवारी करतीं। अकेले दम पर फिल्मों को सुपरहिट कराने वाली को वो सम्मान नहीं मिला जो मिलना चाहिए था।

जब इंडियन सिनेमा लिख रहा था 'क्रांति'

ये 30 का दशक था। इस दशक में इंडियन सिनेमा क्रांति की कहानी लिख रहा था यानी अब बोलती हुई फिल्में बनने लगी थीं। साल 1931 में आर्देशीर ईरानी की कंपनी 'इंपीरियल मूवीटोन' की फिल्म 'आलमआरा' में चलती-फिरती तस्वीरों को पहली बार बोलते-गाते सुना गया था। जल्द ही पुणे की 'प्रभात पिक्चर्स', कोल्हापुर की 'जयाप्रभा' और 'प्रफुल्ल पिक्चर्स', कोलकाता की 'न्यू थिएटर्स' और 'माडर्न थिएटर्स', लाहौर की 'पंचोली आर्ट्स' और मुंबई की 'रंजीत मूवीटोन' और 'बॉम्बे टॉकीज' जैसी कंपनियां साहित्य और समाज से ली गई कहानियों पर फिल्में बना रही थीं।

फैंटेसी और स्टंट फिल्में बना रहा था 'वाडिया मूवीटोन'

एक 'वाडिया मूवीटोन' जैसी कंपनी भी थी जो फैंटेसी और स्टंट फिल्मों के जरिए अपना एक अलग चलन लेकर आई। 'वाडिया ब्रदर्स' अमेरिकन टार्जन मूवी, वेस्टर्न, काऊबॉय स्टाइल से प्रेरित थे। उन दिनों ज्यादातर फिल्मों में बजट 50 से 60 हजार रुपये ही होता। लेकिन जमशेद वाडिया एक अलग फिल्म बनाना चाहते थे। इसका बजट बढ़ाकर 80 हजार रुपये किया। लेकिन फिल्म बनने के बाद डिस्ट्रीब्यूटर्स पीछे हट गए। वजह थी इस फिल्म की 'हिरोइन'। जिसका अंदाज अलग था। हीरोइन का ऐसा रूप पहले किसी ने नहीं देखा था। 'वाडिया ब्रदर्स' ने किसी तरह से फिल्म रिलीज की।

नाडिया - 'फ्री', 'फ्रैंक', 'फीयरलेस', 'स्टंट क्वीन'

दर्शकों ने अब तक या तो स्वर्ग की अप्सराओं या देवियों को फूल बरसाते देखा था या फिर घरों में कैद हमेशा रोने-धोने-कलपने वाली औरत को। लेकिन इस फिल्म की हीरोइन दिलेर थी। वो हैरतअंगेज करतब करती। बॉक्स ऑफिस में धमाल करने वाली ये फिल्म थी, साल 1935 की ‘हंटरवाली’ और आज कहानी इस फिल्म से रातों रात सुपरस्टार बनने वालीं एक्ट्रेस नाडिया की। जिन्हें 'फ्री', 'फ्रैंक', 'फीयरलेस', 'स्टंट क्वीन' कहा गया।

'स्पाइडरमैन''सुपरमैन' की तरह करतीं लड़ाई 

वो अपने स्टंट खुद करतीं। स्पाइडरमैन और सुपरमैन की तरह वो भी परदे पर बहादुर और सच्चाई की राह पर चलने वाली सुपरवुमन का किरदार निभातीं। नकाबपोश, हाथ में हंटर और पैरों में लंबे जूते पहने जब वो दुश्मनों को सबक सिखातीं तो सिनेमा हॉल तालियों और सीटियों से गूंज उठता। फिल्मों में घोड़ा और कुत्ता इनके साथी होते। मर्दों से कुश्ती, तलवारबाजी, घुड़सवारी, कहीं से भी छलांग लगा देना, चलती ट्रेन पर लड़ाई करना ये सभी स्टंट इन्हें बेहद पसंद थे।

'मेरी फिल्म देखकर दर्शक जोश से भर जाते हैं'

नाडिया ने साल 1940 की फिल्म 'डायमंड क्वीन' के प्रमोशन के दौरान कहा था कि - 'थका देने वाली फिल्में और होंगी, मेरी फिल्म देखकर दर्शक जोश से भर जाते हैं।' लेकिन अकेले दम पर फिल्मों को सुपरहिट कराने वालीं नाडिया को वो सम्मान नहीं मिला जो उन्हें मिलना चाहिए था। वो नाडिया जिनकी निजी जिंदगी बेहद दिलचस्प है। युद्ध में पिता की शहादत हुई। होश संभाला तो घर चलाने के लिए स्टोर गर्ल की नौकरी की। कई साल संघर्ष किया। 53 साल की उम्र में शादी एक फिल्म प्रोड्यूसर से की जो उनसे उम्र में तीन साल छोटे थे। ये दोनों एक दूसरे को 26 साल से जानते थे।

'प्रथम विश्वयुद्ध' में पिता की लड़ते-लड़ते गई जान

हर्बर्ट इवांस जो ब्रिटिश आर्मी में सैनिक थे और पत्नी ग्रीक मार्गरेट के साथ रहते थे। इन्हीं के घर 8 जनवरी साल 1908 को एक बेटी का जन्म ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में हुआ। नाम रखा - 'मैरी इवांस'मैरी इवांस जब पांच साल की हुईं तब पिता हर्बर्ट इवांस का ट्रांसफर भारत हो गया। साल 1913 में वो फैमिली लेकर मुंबई आ गए। फिर हर्बर्ट इवांस को फ्रांस जाना पड़ा। वजह बना 'प्रथम विश्वयुद्ध'। साल 1915 में फ्रांस में लड़ाई के दौरान उनकी मौत हुई।

मां ने खिखाई घुड़सवारीनिशानेबाजी और कुश्ती 

मारग्रेट ने पति के निधन के बाद भारत में ही रहने का फैसला किया, अपनी बेटी का एडमिशन क्लेयर रोड, मुंबई के एक कॉंवेंट स्कूल में करा दिया। पर साल 1920 में मारग्रेट मुंबई से पेशावर अपने एक रिश्तेदार के यहां चली गईं। मैरी इवांस, सिंगर और डांसर बनना चाहती थीं। पर उनकी मां मारग्रेट ने उन्हें घुड़सवारी, निशानेबाजी और कुश्ती करना सिखाया।

डांस और सिगिंग में बनाना था करियर

फिल्म हिस्टोरीयन और लेखक शिशिर कृष्ण शर्मा के एक लेख के मुताबिक - साल 1928 में मार्गरेट और मैरी वापस मुंबई चली आईं। मैरी अब 18-19 साल की हो चुकी थीं, मुंबई आकर फौज की कैंटीन में सेल्सगर्ल की नौकरी करने लगीं। एक कंपनी में सेक्रेटरी का भी काम किया। लेकिन उनका मन नहीं लगता। उन्हें म्यूजिक और डांस में करियर बनना था।

'मैरी' से 'नाडा' और फिर बनीं 'नाडिया'

वो रूसी बैले डांसर मैडम अस्त्रोवा से बैले सीखने लगीं जिसके पीछे एक और वजह थी उन्हें अपना वजन कम करना था। मैडम अस्त्रोवा ने उन्हें अपने डांस ग्रुप में शामिल किया और एक नया नाम दिया - 'नाडा'। पर मैरी इवांस को ये नाम कुछ पसंद नहीं आया और उन्होंने इसे बदलकर 'नाडिया’ कर लिया। अब मैरी इवांस का नाम नाडिया हो गया था।

'जारको सर्कस' में भी किया काम

मैडम अस्त्रोवा का डांस ग्रुप पूरे देश में घूमघूमकर ब्रिटिश सैनिकों के प्रोग्राम और भारत के शाही परिवारों की महफिलों में परफॉर्म करता। यहां नाडिया का मन नहीं लगा दो साल बाद ये डांस ग्रुप छोड़ दिया और साल 1930 में दिल्ली के 'जारको सर्कस' में नौकरी करने लगीं। यहां वो करतब दिखाकर लोगों का मनोरंजन करतीं। पर ये भी काम उन्हें पसंद नहीं आया। वो फिर से स्टेज शोज करने लगी।

जब नाडिया की जिंदगी की दिशा बदली

ऐसे ही लाहौर में एक स्टेज शो के दौरान उनकी मुलाकात रीगल थिएटर ग्रुप के मैनेजर मिस्टर कांगा से हुई। कांगा ने उन्हें फिल्मों में काम करने की सलाह दे दी।नाडिया मुंबई आकर 'वाडिया मूवीटोन' के संस्थापक जमशेद वाडिया से मिलीं इस मुलाकात ने नाडिया की जिंदगी की दिशा ही बदल दी।

'हंटरवाली' ने बना दिया स्टार

नाडिया चेहरे से वेस्टर्न दिखती थीं। वाडिया ब्रदर्स ने फिल्म 'देशदीपक' और 'नूर-ए-यमन' में बेहद छोटी-छोटी भूमिकाएं दीं। फिर आई वो फिल्म जिसने नाडिया को स्टार बना दिया। डायरेक्टर होमी वाडिया की साल 1935 की फिल्म 'हंटरवाली' में नाडिया मर्दों से लड़ती, घुड़सवारी करतीं, न्याय देने के लिए हंटर का इस्तेमाल करतीं। जिसने भी नाडिया को देखा वो हैरान रह गया। होम वाडिया के बड़े भाई जमशेद वाडिया ने इस फिल्म का स्क्रीनप्ले लिखा था।

जॉन कावस के साथ खूब बनीं जोड़ी  

शानदार कद-काठी और बेहद खूबसूरत नाडिया के लिए हीरो बने 'ऑल इंडिया बॉडी ब्यूटीफुल कॉम्पिटिशन' के विजेता जॉन कावस। जॉन कावस का व्यक्तित्व शानदार था। वो हट्टे-कट्टे थे। पर्दे पर नाडिया और जॉन कावस की जोड़ी को खूब पसंद किया गया। बेहद बहादुर नाडिया साल 1942 की फिल्म 'जंगल प्रिंसेस' में चार-चार शेरों से लड़ीं। ये स्टंट उन्होंने खुद किया था। हिंदी ठीक से न बोलने के बाद भी साल 1936 की फिल्म 'पहाड़ी कन्या' में लंबे-लंबे हिंदी में डायलॉग बोले। मारधाड़ में माहिर नाडिया ने साल 1943 की फिल्म 'मौज' में ऐसी संजीदा एक्टिंग की लोगों की आंखों में आंसू ला दिए। साल 1968 की फिल्म 'खिलाड़ी' में वो आखिरी बार पर्दे पर नजर आईं।

नाडिया ने वाडिया से की मोहब्बत

साल 1961 में 53 साल की उम्र में नाडिया ने शादी की अपनी उम्र से तीन साल छोटे फिल्म प्रोड्यूसर और डायरेक्टर होमी वाडिया से। साल 1935 की फिल्म 'हंटरवाली' होमी वाडिया ने डायरेक्ट की थी। तभी से वो नाडिया को चाहने लगे थे। जब भी एक्शन फिल्में बनाते उसमें नाडिया को ही हीरोइन लेते। 26 साल से वो एक-दूसरे से मोहब्बत करते थे। दोनों का साथ मरते दम तक रहा। जिंदगी के आखिरी दिनों में नाडिया मुंबई में रहतीं। 09 जनवरी साल 1996, 88 साल की उम्र में नाडिया ने आखिरी सांस ली।

नहीं मिला कोई भी अवार्ड

उस जमाने में जब औरत हमेशा पुरुषों के पीछे ही खड़ी होती थी। उसे अत्यंत कमजोर माना जाता था तब नाडिया के हैरतअंगेज करतब देख खूब आनंद आता। नाडिया की सफलता ने आश्चर्यचकित किया। अपनी दिलेरी से दिल जीता। इतनी दबंग, निर्भीक, बहादुर, स्टंटबाज, रॉबिनहुड स्टाइल की एक्ट्रेस आज तक दूसरी इंडियन सिनेमा के इतिहास में नहीं हुई। 42 फिल्मों में काम करने के बाद भी नाडिया को किसी भी तरह का कोई भी अवार्ड नहीं मिला।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

Comment

https://manchh.co/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!