Actress Meena Kumari की मौत पर जब दोस्त बोले, 'मीना... मुबारक हो'

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एक हीरोइन अपने मेकअप रूम में तैयार हो रही थीं। तभी एक शख्स ने दरवाजे को खटखटाया। उस हीरोइन ने पूछा - कौन ? दरवाजा खटखटाने वाले शख्स ने अपना नाम बताया। नाम समझ में नहीं आया तो फिर पूछा - कौन है ? उसने दोबारा से नाम बताया और कुछ जानकारी भी दी। कहा कि – ‘कल रात मैं आपके साथ था’। तब हीरोइन ने बेहद लापरवाही भरे अंदाज में कहा - ‘रात गई, बात गई।’ ये हीरोइन कोई और नहीं अपने दौर में ट्रेजेडी क्वीन नाम से मशहूर मीना कुमारी थीं। मीना कुमारी को जिंदगी में इतने जख्म मिले कि शराब की लत लगी, और जब 31 मार्च साल 1972 को 39 साल की उम्र में लीवर सिरोसिस की बीमारी से दुनिया से रुखसत हुईं तब इनके दोस्तों ने कहा – ‘मीना तुम्हें मौत मुबारक हो’। सवाल उठता है कि खूबसूरती से लबरेज मीना कुमारी इस हालत तक कैसे पहुंचीं ? जानने के लिए इनकी जिंदगी में झांकना होगा।

'आपके पांव देखे... बहुत हसीन हैं, इन्हें जमीं पर मत उतारिएगा, मैले हो जाएंगे।' ये डायलॉग किसी पर फिट बैठता है तो वो 01 अगस्त साल 1933 में मुंबई के मीठावाला चाल में जन्मी मीना कुमारी हैं।

मशहूर पत्रकार विनोद मेहता ने अपनी किताब 'मीना कुमारी - द क्लासिक बायोग्राफी' में मीना कुमारी कि पूरी जिंदगी के बारे में बताया है। 

किताब के मुताबिक, मीना कुमारी के पिता अली बक्श पारसी रंगमंच के कलाकार थे। तंगहाली थी तो वे दूसरी बेटी मीना कुमारी को पैदा होते ही अनाथालय में छोड़ गए। लेकिन, कुछ दिनों बाद पिता का प्यार जाग गया वे वापस बेटी को लेने गए। देखा बच्ची के पूरे शरीर पर चीटियां काट रही थीं। चीटियों को झाड़ा और अपने कलेजे से लगा लिया। वक्त के साथ शरीर के घाव तो ठीक हो गए, लेकिन बदकिस्मती के जख्मों ने आखिरी सांस तक मीना कुमारी का साथ नहीं छोड़ा।

परिवार के हालात ठीक नहीं थे। तो सिर्फ छह साल की उम्र में साल 1939 में रिलीज हुई फिल्म 'लेदरफेस' में चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में बॉलीवुड में कदम रखा।13 साल की उम्र में साल 1946 में रिलीज हुई फिल्म 'बच्चों का खेल' में काम किया। इसी फिल्म से बेबी महजबीं बानो का नाम बदल कर मीना कुमारी रख दिया गया।

वक्त बीता और साल 1952 में रिलीज हुई फिल्म 'बैजू बावरा'। ये फिल्म दो साल तक थियेटर में लगी रही। मीना कुमारी ने इस फिल्म में गौरी का किरदार निभाया था। इसी फिल्म के लिए उन्हें बेस्ट हीरोइन का पहला फिल्मफेयर का अवार्ड मिला। 'बैजू बावरा' की कामयाबी को मीना कुमारी ने 'दो बीघा जमीन' और 'परिणीता' जैसी फिल्मों के साथ एक नए मुकाम पर पहुंचा दिया। ये वो वक्त था जब मीना कुमारी का हर कोई दिवाना हो गया था और इन दिवानों में उस दौर के फेमस डायरेक्टर कमाल अमरोही भी शामिल थे। दोनों के बीच प्यार हुआ। पिता की मर्जी के खिलाफ साल 1952 को 19 साल की उम्र में मीना कुमारी ने कमाल अमरोही से शादी कर ली। कमाल उम्र में मीना कुमारी से 34 साल बड़े थे और पहले से शादीशुदा भी थे।

मीना कुमारी ने शादी के बाद भी फिल्मों में काम करना जारी रखा। कमाल अमरोही ने इसकी इजाजत तो दे दी। लेकिन वे पुरुषवादी मानसिकता को तोड़ नहीं पाए। कमाल अमरोही ने तमाम तरह की बंदिशे लगा दी। लेकिन आजाद ख्यालों वाली मीना कुमारी को बंधनों में कैद करना मुश्किल था। इसी को लेकर दोनों के रिश्ते बिगड़ने लगे।

मीना कुमारी शराब के नशे में डूबने लगीं। दुखों से परेशान होकर वे अशोक कुमार, दिलीप कुमार, राजकुमार, धर्मेंद्र जैसे एक्टर्स और डायरेक्टर सावन कुमार के करीब आईं। मीना कुमारी और कमाल के बीच लड़ाई-झगड़े बढ़ने लगे और मीना कुमारी के साथ कई बार मारपीट हुई।

एक पत्रिका में छपे इंटरव्यू में हीरोइन नरगिस दत्त ने बताया था कि

'मैं चुप रहूंगी' फिल्म की शूटिंग का वक्त था। मीना कुमारी के साथ सुनील दत्त काम कर रहे थे। आउटडोर शूटिंग के समय मीना और मेरा कमरा अगल-बगल था। तब मीना के कमरे से कई बार लड़ाई-झगड़े की आवाज सुनी। सुबह मीना कुमारी की सूजी आंखें बयां कर रही थीं की, वो शायद रातभर रोई थीं।’

साल 1664 में मीना कुमारी और कमाल अमरोही दोनों अलग हो गए। 12 साल चले इस रिश्ते में मीना कुमारी फिल्मों में भी काम करती रहीं। इस दौरान उन्होंने

1955 की 'परिणीता', 1963 की 'साहिब बीबी और गुलाम' और साल 1966 की 'काजल' जैसी फिल्मों में काम किया जिनके लिए इनको बेस्ट हीरोइन का फिल्म फेयर का खिताब मिला। साल 1958 की 'शारदा', 1963 की 'आरती' और 1965 की 'दिल एक मंदिर' जैसी भी फिल्में भी सुपरहिट रहीं।

साल 1972 में रिलीज हुई 'पाकीजा'। इस फिल्म की आज भी चर्चा होती है । पाकीजा को कमाल अमरोही ने ही डायरेक्ट किया है। शूटिंग के वक्त मीना कुमारी कमाल अमरोही का घर छोड़ चुकी थी।

निजी जिंदगी में दर्द और गम में डूबी मीना कुमारी रातभर सोती नहीं थीं डॉक्टर ने नींद की गोलियों की जगह ब्रांडी लेने की सलाह दी और ये ब्रांडी कब शराब की लत में बदल गई की लिवर को पूरी तरह डैमेज कर दिया। मीना अस्पताल नहीं जाना चाहती थी। मीना ने कहा कि ‘अगर मौत ही हल है तो क्यों न मैं चैन से अपने घर में मरूं।’ लेकिन बहन के बार-बार कहने पर मीना मान गईं। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। मीना कुमारी जो मरना नहीं चाहती थीं डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद 31 मार्च 1972 को 39 साल की उम्र में दुनिया से अलविदा कह दिया।

मीना के दर्द को करीब से जानने वालों ने उनके दोस्तों ने उनको मौत की बधाई दी थी। तब नरगिस दत्त ने भी एक पत्रिका में लेख लिखा था। उसका शीर्षक था, 'मीना - मौत मुबारक हो'

नरगिस ने लिखा था कि, ‘आपकी मौत पर बधाई, पहले मैंने ये कभी नहीं कहा। मीना, आज आपकी बड़ी बहन आपको, आपकी मौत की बधाई दे रही है। आपसे फिर कभी इस दुनिया में कदम न रखने के लिए कहती हूं। क्योंकि, ये जगह आप जैसे लोगों के लिए है ही नहीं।’

मीना कुमारी के मौत के बाद चैट शो 'फूल खिले हैं गुलशन गुलशन' में तबस्सुम ने कमाल अमरोही से मीना के बारे में पूछा, तो उन्होंने मीना को एक अच्छी पत्नी नहीं, बल्कि अच्छी हीरोइन के रूप में याद किया।

कमाल ने कहा, 'मीना कुमारी काफी शानदार हीरोइन थीं, जो खुद को घर पर भी हीरोइन ही मानती थीं।'

उनकी मौत के आठ महीने बाद उनकी आखिरी फिल्म ‘गोमती के किनारे’ रिलीज हुई।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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