मणिपुर में फिर से 'मीरा पैबिस' पर आधारित इस प्रोटेस्ट ने कई बार बदला इतिहास

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कैलेंडर में तारीख 3 मई 2023... मणिपुर में कुकी समुदाय की ओर से निकाले गए 'आदिवासी एकता मार्च' के दौरान हिंसा भड़की थी। इस दौरान कुकी और मैतेई समुदाय के बीच हिंसक झड़प हो गई थी। तब से ही वहां हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। हिंसा के बाद चर्चित मीरा पैबिस समूह फिर सक्रिय हो गया है। 40 साल बाद महिलाओं का ये समूह एक बार फिर अपने पुराने तेवर में दिखाई दिया। ये वही समूह है जिसने स्वतंत्र भारत में, मणिपुर के हर मुद्दे पर हुए आंदोलन का नेतृत्व मीरा पैबिस ने किया, चाहें वो साल 1972 में मणिपुर को राज्य का दर्जा देने का मामला हो, मणिपुर को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का हो या फिर या शराब पर प्रतिबंध लगा लगाने का मुद्दा हो। ये महिलाएं जो हाथों में मशाल लेकर चलने के लिए जानी जाती हैं, जिन्हें 'मणिपुर की टॉर्च बियरर' कहा जाता है। आज हम बात करेंगे इनके इतिहास की 

मणिपुर में उग्रवाद का लम्बा इतिहास रहा है। साल 1964 में यहां यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट की शुरुआत हुई और फिर बाद में इसे मणिपुर के स्थानीय मैतेई समूह और विद्रोही आंदोलन की mother institution के नाम से जाना गया। करीब दो दशक बाद शुरुआती सालों में या यू कहें कि साल 1980 के आस-पास उग्रवादी समूहों का दायरा बढ़ने के साथ मैतेई समूह का व्रिदोह अपने चरम पर पहुंच गया। इसे रोकने के लिए सेंट्रल गवर्नमेंट ने आर्मी और paramilitary forces को मणिपुर भेजा। तब पहली बार मीरा पैबिस समूह की महिलाएं सुरक्षा बलों के आमने-सामने खड़ी नजर आईं। जैसे ही सुरक्षा बलों ने इंफाल घाटी में search operation शुरू किया और विद्रोहियों की तलाश में गांव-गांव में छापेमारी की मीरा पैबीस और उनकी एमा यानी माताएं “नाहरोल्स” की रक्षा के लिए विरोध करती नजर आईं। मैतेई भाषा में नाहरोल्स का मतलब “युवा” होता है, लेकिन मणिपुर में आमतौर इस नाम का इस्तेमाल विद्रोही समूहों के कैडर के लिए किया जाने लगा। 

पिछले कुछ दशकों में, इस समूह ने Armed Forces Special Powers Act के खिलाफ भी आवाज बुलंद की। ये समूह 16 सालों तक AFSPA के खिलाफ अनशन करने वाली इरोम शर्मिला के सपोर्ट के तौर पर भी उनके साथ रहा। साल 2004 में, एक संदिग्ध विद्रोही थांगजम मनोरमा देवी के कथित बलात्कार और हत्या के बाद, लगभग 30 मीरा पैबी महिलाओं ने इम्फाल शहर में एक बैनर के साथ नग्न होकर मार्च किया, जिस पर लिखा था- “भारतीय सेना हमारा बलात्कार करती है”

साल 2020 में एशियन रिव्यू ऑफ सोशल साइंसेज में पब्लिश रिसर्च पेपर में भी मीरा पैबीस का जिक्र किया गया है। अपने रिसर्च पेपर में अरुणा चानू ओइनम और पूर्णिमा थोइडिंगजाम ने लिखा कि मणिपुर में हर महिला एक कठिन परिस्थिति के दौरान मीरा पैबीस बन जाती है। इम्फाल शहर के हर लीकाई यानी कॉलोनी में मीरा पैबिस का एक समूह है। हर समूह में सबसे उम्रदराज महिला लीडर बनती है। हालांकि, मीरा पैबिस पूरे मैतेई समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं, केवल विवाहित महिलाओं को ही पद दिया जाता है।

हाल ही में सेना की स्पीयर कॉर्प्स ने एक वीडियो ट्वीट किया। वीडियो में देखा गया कि मीरा पैबीस सुरक्षा बलों की आवाजाही को रोकने के लिए सड़कों पर उतरी हुई हैं। मीरा पैबी को ‘मणिपुर की टॉर्च बियरर’ भी कहा जाता है। यानी वो महिलाएं जो मशाल लेकर चलने के लिए जानी जाती हैं। और मणिपुर में होने वाले हर बड़े आंदोलन में इनकी सक्रिय भूमिका रहती है। हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह ने मीरा पैबी समूह की महिलाओं के साथ मीटिंग की और उन्होंने उन्हें मणिपुर की सुरक्षा में अहम योगदान देने वाला बताया। उन्होंने ट्वीट में लिखा कि हम राज्य में शांति और समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ब्रिटिश भारत में दो प्रमुख आंदोलनों का जिक्र किया गया जिसमें मीरा पैबिस की भूमिका अहम रही। पहली बार इन्होंने तब अपनी भूमिका निभाई, जब साल 1904 में कर्नल मैक्सवेल ने पुरुषों को हर 30 दिनों में 10 दिनों का मुफ्त श्रम करना अनिवार्य किया, यानी कि महीने के 10 दिन में किए काम का कोई पैसा नहीं मिलेगा। हालांकि मैक्सवेल को बाद में अपना ये आदेश वापस लेना पड़ा था।

और दूसरा मामला साल 1939 में सामने आया, जब महाराजा की आर्थिक नीतियों, मूल्य वृद्धि और राज्य में चावल की कमी होने पर मणिपुर से चावल के निर्यात के विरोध में मीरा पैबिस सड़कों पर उतरीं। उस दौर में मीरा पैबी समूह की महिलाओं के सामने अंग्रेजों की तरह ही महाराजा के तेवर भी नरम पड़ गए।

मणिपुर में मैतेई समुदाय की आबादी 53 फीसदी से ज्यादा है। ये गैर-जनजाति समुदाय है, जिनमें ज्यादातर हिंदू हैं। वहीं, कुकी और नगा की आबादी 40 फीसदी के आसपास है। राज्य में इतनी बड़ी आबादी होने के बावजूद मैतेई समुदाय सिर्फ घाटी में ही बस सकते हैं। मणिपुर का 90 फीसदी से ज्यादा इलाकी पहाड़ी है। सिर्फ 10 फीसदी ही घाटी है। पहाड़ी इलाकों पर नगा और कुकी समुदाय का तो घाटी में मैतेई का दबदबा है। मणिपुर में एक कानून है। इसके तहत, घाटी में बसे मैतेई समुदाय के लोग पहाड़ी इलाकों में न बस सकते हैं और न जमीन खरीद सकते हैं। लेकिन पहाड़ी इलाकों में बसे जनजाति समुदाय के कुकी और नगा घाटी में बस भी सकते हैं और जमीन भी खरीद सकते हैं। मणिपुर में चल रहा पूरा मसला इस बात पर है कि 53 फीसदी से ज्यादा आबादी सिर्फ 10 फीसदी इलाके में रह सकती है, लेकिन 40 फीसदी आबादी का दबदबा 90 फीसदी से ज्यादा इलाके पर है।

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