अगर कस्तूरबा न होतीं तो शायद ही महात्मा बन पाते गांधी !

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26 फरवरी साल 1944 यानी अंतिम संस्कार के बाद चौथे दिन, जब रामदास और देवदास ने अपनी मां कस्तूरबा की अस्थियां जमा कीं, तो पाया कि उनकी शीशे की पांच चूड़ियों पर आग का कोई असर नहीं हुआ वो पूरी तरह से साबूत थीं। ये बात जब गांधी जी को बताई गई तो वे बोले ये इस बात का संकेत दे रहा है कि कस्तूरबा कहीं नहीं गई। वो हमारे साथ हमेशा रहेंगीं।

आज किस्सा कस्तूरबा गांधी का जिनका संघर्ष भी कम नहीं है, अगर गांधीजी को उनका साथ न मिला होता तो वो शायद ही महात्मा बन पाते।

The Story of My Experiments with Truth' में गांधीजी लिखते हैं कि मई 1883 जब हम दोनों की शादी हुई, तब मैं 13 साल का था और मुझसे एक साल बड़ी कस्तूरबा 14 साल की थीं। हम दोनों बच्चे ही थे, शादी हमारे लिए ऐसे थी, जैसे मानो कोई त्योहार। ये खुशी भरा दिन था । क्योंकि बहुत सारे रिश्तेदार ढेर सारी मिठाइयां और नए कपड़े लेकर आए थे।

गांधी जी लिखते हैं कि शुरुआत में मैं कस्तूरबा के लिए खुद को काफी आकर्षित महसूस करता था। उस वक्त मैं स्कूल में था। जहां मैं कस्तूरबा के बारे में ही सोचता रहता। कस्तूरबा पढ़ना लिखना नहीं जानती थीं। मैंने उन्हें पढ़ाना शुरू किया। लेकिन कस्तूरबा घर के कामकाज में व्यस्त रहतीं।

समय के साथ वक्त बीता और साल 1888 में सबसे बड़े बेटे हरिलाल का जन्म होता है और यही वो साल था जब गांधी जी जो वकालत पढ़ने के लिए लंदन जाना पड़ा। लंदन में तीन साल की पढ़ाई के दौरान गांधीजी वहां से कस्तूरबा को चिट्ठी लिखा करते थे। लेकिन कस्तूरबा के लिए ये मुश्किल था क्योंकि वो पढ़ना और लिखना नहीं जानतीं थी।

गांधी जी साल 1891 में भारत आए और इसके दो साल बाद फिर साल 1893 को एक केस के सिलसिले में साउथ अफ्रीका चले गए। तब तक दूसरे बेटे मणिलाल का भी जन्म हो चुका था।   

कस्तूरबा ने साल 1896 तक दोनों बच्चों की परवरिश अकेले भारत में ही रह कर की। गांधी जी साल 1896 में दोनों बेटों और बा को साउथ अफ्रीका ले गए। गांधीजी ने साउथ अफ्रीका में रंग भेदभाव के खिलाफ आंदोलन चलाया जिसमें कस्तूरबा गांधी ने भी उनका सहयोग किया। कस्तूरबा गांधी भी आंदोलनों शामिल होती। वे गांधी जी हर बात मनातीं।   

गांधी जी लिखते हैं कि कई बार हम दोनों के बीच विचारों को लेकर झगड़े हुए एक बार तो बात इतनी बढ़ गई कि मैंने कस्तूरबा को घर से निकाल दिया। मैं अपने काम में व्यस्त रहता और कस्तूरबा घर के कामकाज, बच्चों की देखभाल और दिनभर आने वाले मेहमानों की आवभगत में लगी रहतीं। इन सबका प्रभाव कस्तूरबा गांधी की सेहत पर भी पड़ा।

गांधीजी लिखते हैं कि अगर पत्नी मुझे नहीं छोड़ सकती तो मैं उसे कैसे छोड़ सकता हूं। कस्तूरबा में असाधारण धैर्य और सहनशीलता थी, इसलिए वो हमेशा विजेता रही।

अब तक गांधी जी के दो और बेटे रामदास और देवदास का भी जन्म हो जाता है और साल 1915 जब गांधी जी भारत लौट आते है।

गांधी जी के बेटे मणिलाल के पोते तुषार गांधी अपनी किताब The Lost Diary of Kastur, My Ba' में लिखते हैं कि गांधी जी जिस मंजिल तक पहुंचे और जो परिवर्तन उनके जीवन में आता गया, उन सारी चीजों में उन्हें 'बा' का सहारा और साथ न मिला होता तो उनके लिए ये सब हासिल करना नामुमकिन हो जाता। गांधी जी को ये अहसास था उन्हें संभाल लेने वाला, उनके पास था..

तुषार गांधी लिखते हैं ‘'बा' की कमी बापू के जीवन के आखिरी चार सालों में भी देखने को मिलती है जब 'बा'' उनके साथ नहीं थीं।

अगस्त 1942 जब गांधी जी को बिरला हाऊस से उस समय गिरफ्तार कर लिया गया। जब उनको एक सभा को संबोधित करना था। अब ये सवाल था भाषण कौन देगा। इस समय पूरी बंबई में गांधी के कद का कोई भी व्यक्ति मौजूद नहीं था।

तभी कस्तूरबा बोलीं, "परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. मैं भाषण दूंगीं। उन्होंने डेढ़ लाख लोगों को संबोधित किया। जैसे ही भाषण खत्म हुआ पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर पुणे के आगा खां पैलेस ले गई जहां गांधी जी पहले से ही बंद थे। इसी जेल में रहने के बाद कस्तूरबा बेहद कमजोर हो गईं उनकी तबीयत बिगड़ी इसके बाद से वे सारा समय बिस्तर पर ही गुजारने लगीं।

22 फरवरी साल 1944 जब शाम 7 बजकर 30 मिनट पर कस्तूरबा ने दुनिया से अलविदा कह दिया। गांधी जी ने कस्तूरबा को अंतिम स्नान कराया। उस समय गांधी जी की भी तबीयत ठीक नहीं थीं।

लोगों ने गांधी से कहा भी आप अपने कमरे में जाइए।

गांधी का जवाब था, उसके साथ 62 सालों तक रहने के बाद मैं इस धरती पर उसके आखिरी क्षणों में उसका साथ कैसे छोड़ सकता हूं। अगर मैं ऐसा करता हूं तो वो मुझे कभी माफ नहीं करेगी।

कस्तूरबा जब बीमार थीं तब गांधी जी ने उनके लिए एक लकड़ी की छोटी मेज बनवाई जो उनकी पलंग पर रख दी जाती ताकि वो आराम से खाना खा सकें। बाद में बापू के लिए ये मेज कस्तूरबा की सबसे बड़ी याद बन गई। उनके निधन के बाद गांधी जी जहां भी जाते, उस छोटी मेज को अपने साथ ले जाते।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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