अखिलेश यादव बर्थडे स्पेशल-बचपन का सपना टूटने के बाद ली सियासत में एंट्री

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बचपन से थी फौज में जाने की चाहत
लेकिन नीयती को था कुछ और मंजूर
वो राजनेता जो बचपन का था 'टीपू'
और बड़े होकर बना UP का 'सुल्तान'
1 जुलाई 1973 जब इटावा के सैफई गांव में एक शिक्षक के घर किलकारियां गूंजी. परिवार ने बच्चे का नाम प्यार से अखिलेश रखा. लेकिन बच्चा जैसे-जैसे बड़ा हुआ तो लोग प्यार से टीपू बुलाने लगे. बचपन से ही फौज में जाने का सपना था लेकिन नीयती को कुछ और मंजूर था. फौज में जाने का सपना देखने वाले अखिलेश ने जब होश संभाला तो सामने समाजवादी पार्टी की राजनीतिक विरासत खड़ी थी. क्योंकि जो शिक्षक थे, वो सियासी अखाड़े के भी पहलवान थे, नेता जी जो सियासी दांव पेंच ऐसे खेलते की बड़े-बड़ों को पटखनी दे देते और उन्हीं ने अखिलेश के लिए राजनीतिक मंच तैयार किया. आज अखिलेश ने उम्र की हाफ सेंचुरी में कदम रख दिया है और UP की सियासत में टीपू बने हुए है.
अखिलेश को टीपू का नाम नेता जी के जिगरी यार दर्शन सिंह यादव ने जन्म होते ही दे दिया था. शुरुआती पढ़ाई-लिखाई इटावा के सेंट मैरी स्कूल में हुई. इसके बाद राजस्थान में आगे की पढ़ाई पूरी की. फिर मैसूर यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की. और आगे की पढ़ाई के लिए ऑस्ट्रेलिया चले गए. जहां सिडनी यूनिवर्सिटी में Environmental इंजीनियरिंग से मास्टर्स किया. इसी दरमियान अखिलेश का दिल डिंपल पर आ गया. हालांकि अखिलेश सिडनी में पढ़ाई कर रहे थे. और डिंपर यहीं इंडिया में रह रही थीं.
जब सिडनी से अखिलेश ने लिखे लव लेटर्स
सूबे के इतने बड़े नेता के बेटे होने के बाद भी अखिलेश की मुहब्बत की राह आसान नहीं थी. दोनों के एक कॉमन फ्रेंड के घर पहली मुलाकात हुई फिर दोस्ती और दोस्ती फिर धीरे-धीरे प्यार में बदल गई. तब अखिलेश 21 साल के थे जबकि डिंपल महज 17 साल की थीं. ये बात खुद डिंपल यादव ने एक इंटरव्यू में कही थी.
अखिलेश ने सिडनी से डिंपल को लव लेटर्स भी लिखते थे और ग्रीटिंग कार्ड्स भी भेजते थे. जब वापस लौटे तो शादी का मन बना लिया. हालांकि नेता जी इस रिश्ते को लेकर राजी नहीं थे लेकिन अखिलेश की जिद के आगे वो भी झुक गए. कहा जाता है अखिलेश और डिंपल की शादी के लिए अमर सिंह ने नेता जी को मनाया था. अमर सिंह यादव परिवार के बहुत करीबी थे. मुलायम सिंह को इतना विश्वास था कि एक वक्त ऐसा आया कि जब पार्टी में उनका रुतबा दो नंबर पर था. लेकिन वक्त और हालात ने सबकुछ बदल दिया. सपा के कद्दावर नेता आजम खां का भी जलवा पार्टी में कम नहीं था जो अमर सिंह और यादव परिवार के बीच मतभेद का कारण बना.
पहली बार लड़ा अखिलेश ने चुनाव
अखिलेश की शादी को एक साल ही बीता था की वो सक्र‍िय राजनीत‍ि में आए और पिता मुलायम सिंह यादव से राजनीति का ककहरा सीखा. 2000 में उन्‍होंने पहला कन्नौज से लोकसभा उपचुनाव लड़ा. ज‍िसे जीतकर वो संसद पहुंचे और उनका सियासी सफर शुरू हो गया. फिर दूसरी बार साल 2004 के लोकसभा चुनाव में भी जीत दर्ज करने में सफल रहे. 2009 का लोकसभा जीत कर अख‍िलेश ने जीत की हैट्र‍िक लगाई. 2009 में अख‍िलेश यादव कन्नौज के अलावा फिरोजाबाद से भी चुनाव लड़े और जीते लेकिन फिर उसे छोड़ दिया था.
2012 में अखिलेश की रणनीति का कमाल
2012 में हुए UP के विधानसभा चुनाव में समाजावादी पार्टी ने 224 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया. 15 मार्च 2012 को अखिलेश यादव ने सिर्फ 38 साल की उम्र में राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी. सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री का रिकॉर्ड भी अखिलेश के नाम पर हैं.
अखिलेश ऐसे राजनेता हैं जिनका खेलों से विशेष लगाव है. मुख्यमंत्री रहते खेलों के विकास के लिए कई काम किए.
अखिलेश की नाक कैसे टेढ़ी हुई ?
खुद एक बार जिक्र किया था कि स्कूल के दिनों में वे एक फुटबॉल मैच देख रहे थे. तभी मैदान से खिलाड़ी की तरफ से मारा गया एक किक उनकी नाक में आकर लड़ा. इसका असर उनकी नाक पर पड़ा. इससे उनकी नाक टेढ़ी हो गई.
सियासत के पहलवान बनने की राह में अखिलेश का पारिवारिक विवादों से भी गहरा नाता रहा है.
जब अखिलेश ने 'नेता जी' को ललकारा था
लखनऊ में सपा की बैठक को लेकर मंच सजा था. नेता जी माइक पर बोल रहे थे, नेता जी की बातों को सुनकर अखिलेश कभी मुस्कुरा रहे थे तो कभी गंभीर दिखते फिर एक समय मुलायम ने कहा
 "मुझे मुसलमानों की तरफ से एक चिट्ठी आई है. उसमें लिखा है कि आपका बेटा मुसलमानों को पार्टी से दूर करना चाह रहा है."
नेता जी की ये बात कहते ही अखिलेश आपा खो बैठे और कड़े स्वर में माइक पकड़कर बोले-
 "नेता  जी वो चिट्ठी मुझे दीजिए. दिखाइए वो चिट्ठी".
अखिलेश का ये रूप देख हर कोई हैरान था, नेता जी ने डांटते हुए कहा-
 "मुझसे ऐसे बात मत कीजिए. जाओ बैठो".
अखिलेश ने मुलायम की एक नहीं सुनी.. इसके बाद मंच पर उनके चाचा शिवपाल यादव भी आ गए.. अखिलेश और चाचा शिवपाल के बीच धक्का-मुक्की की भी बात का मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जाता है...
चाचा-भतीजे के बीच फंसे नेता जी
2017 के विधानसभा चुनाव का समय नजदीक आ रहा था. लेकिन नेता जी के लिए ये समय सही नहीं था. क्योंकि सपा में पारिवारिक कलह काफी बढ़ चुकी थी. अखिलेश और शिवपाल की खेमेबाजी ने ना सिर्फ पार्टी को सत्ता से बाहर किया बल्कि परिवार को दो फाड़ कर दिया. मुलायम के लिए एक तरफ बेटा तो दूसरी तरफ भाई. खेमेबाजी का नतीजा कुछ ऐसा हुआ कि बाप-बेटे के बीच भी महीनों विवाद चलता रहा. शिवपाल यादव ने अपनी नई पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी बना डाली थी.
नेता जी के निधन से टूटे अखिलेश
पिता का तो साया ही काफी होता है. लेकिन एक न दिन साथ जरूर छूट जाता है. नेता जी और अखिलेश का भी साथ छूट गया. 82 साल की उम्र में 10 अक्टूबर 2022 को नेता जी का निधन हो गया. जिसके बाद अखिलेश पूरी तरह टूट गए. क्योंकि एक ओर पिता के जाने का गम, दूसरी ओर राजनीतिक विरासत के साथ परिवार को एकजुट रखना. हालांकि शिवपाल यादव ने नेता जी का साथ हमेशा दिया. जैसे अब वो अखिलेश का दे रहे है. नेता जी के जाने के बाद मैनपुरी लोकसभा सीट पर चुनाव हुए और डिंपल यादव ने उम्मीदवारी की. जहां शिवपाल समेत पूरे परिवार ने मिलकर एक जुट होकर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की. जिसके बाद शिवपाल के बीच जो भी मनमुटाव था उन्होंने उसे दूर करते हुए अखिलेश को गले लगाया. और प्रसपा का सपा में विलय हो गया.
अखिलेश के सामने चुनौती
मुलायम सिंह यादव अपने जीते ही अपनी सियासी विरासत को अखिलेश यादव के हवाले कर गए, लेकिन अब आने वाले वक्त में अखिलेश को इसे संभालना है.
इनसे होगा निपटना
यादव कुनबे को एकजुट रखने की
केंद्र की सियासत में पैर जमाने की
सियासी समीकरण को बचाए रखने का चैलेंज
MY समीकरण को बैलेंस रखने की
पार्टी में होने वाले मतभेदों को बचाए रखने की
फिलहाल 2024 के लोकसभा चुनाव को लेकर अखिलेश पार्टी को मजबूत करने में जुटे है. और विपक्षी दलों की बैठक में हिस्सा ले रहे है. हालांकि बीजेपी भी अखिलेश को घेरने में पीछे नहीं रहती है. अब आगे आने वाले समय में अखिलेश को 2024 के चुनाव का क्या बैनिफिट मिलता है. ये देखना होगा.

कानपुर का हूं, 8 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं, पॉलिटिक्स एनालिसिस पर ज्यादा फोकस करता हूं, बेहतर कल की उम्मीद में खुद की तलाश करता हूं.

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