Allah Baksh Soomro : एक गुमनाम हीरो की कहानी

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साल 1947 में हुए बंटवारे का जब भी जिक्र होगा तो मोहम्मद अली जिन्ना का नाम जरूर आएगा। जिन्होंने धार्मिक आधार पर एक देश बनाने की मांग की। ये एक ऐसा विचार था जिसका खामियाजा आज भी लोग भुगत रहे हैं। लेकिन खान अब्दुल गफ्फार खानमौलाना आजाद की तरह ही एक और व्यक्ति थे। जो नहीं चाहते थे कि ये बंटवारा हो। हजारों लोग इसके विचारों के साथ खड़े हुए। आंदोलन किया तो अंग्रेजों ने 'नाइटहुड' की उपाधि छीन ली। सिंध के प्रधानमंत्री के पद से हटा दिया। सिर्फ 43 साल की उम्र में उनकी हत्या करा दी गई। इतिहासकार ऐसा मानते हैं कि, अगर ये जिंदा रहते तो शायद बंटवारा न होता। जो दुनिया का सबसे बड़ा विस्थापन था। आज कहानी एक अल्लाह बख्श सूमरो की। जिनके बारे में किताबों में बेहद कम लिखा गया। जिन्हें इतिहास में भूला दिया गया।

साल 1900 में पाकिस्तान के सिंध प्रांत के शिकारपुर में एक बड़े जमींदार और ठेकेदार सामंती सिंधी परिवार में अल्लाह बख्श सूमरो का जन्म हुआ। 18 साल की उम्र में 10वीं की और इसके बाद वो खानदानी व्यापार में आ गए। 

सूमरो जिनका सिंध प्रांत में रसूख था एक बड़े जमींदार थे। अंग्रेजों के साथ उठना-बैठना था। अंग्रेजों ने उन्हें न सिर्फ 'खान बहादुर' की उपाधि दी। बल्कि, ‘नाइटहुड’ से भी सम्मानित किया। उन्हें सिंध का प्रधानमंत्री बना दिया।

वो स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा तो नहीं ले रहे थे। लेकिन बेहद सरल स्वभाव के सूमरो गांव की जनता से प्यार करते। इसलिए समाज में इनकी अलग पहचान थी।

इतिहासकार केआर मलकानी की किताब ‘द सिंध स्टोरी’ में सूमरो के जीवन के बारे में कई जानकारियां दी गईं हैं। वे लिखते हैं कि

अल्लाह बख्श सूमरो जब भी ट्रेन से यात्रा करते तो हमेशा ऊपर की सीट लिया करते, जिससे नीचे की सीट पर ज्यादा से ज्यादा लोग बैठ सकें। एक बार उनके गांव शिकारपुर में बाढ़ आ गई। तब उन्होंने बड़ी-बड़ी नालियां बनवाकर बाढ़ का सारा पानी अपनी जमीनों की तरफ बहा दिया। ताकि, गांव वालों के घर और जमीन बच सकें।’

ये वो दौर था जब भारत के नौजवान देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर रहे थे। गांधी जी भी अपने आंदोलन से अंग्रेजों के जमे पैरों को उखाड़ने में लगे थे। मोहम्मद अली जिन्ना मुस्लिम लीग के मंचों से देश को दो टुकड़ों में बांटकर एक अलग देश पाकिस्तान बनाने की मुखालफत कर रहे थे।

वहीं सूमरो धार्मिक आधार पर बंटवारे का विरोध कर रहे थे। वो मुस्लिम लीग और जिन्ना के विचारों से नफरत करते थे। उनका मानना था कि, भारत एक देश बने जिसे संयुक्त राज्य भारत कहा जाएजहां हिंदू और मुसलमान दोनों मिलकर रहें। 

सूमरो के विचारों का खान अब्दुल गफ्फार खान और मौलाना आजाद भी समर्थन करते थे। यही वजह है कि क्रांतिकारियों का एक बड़ा हिस्सा उनकी बात से सहमत था।

अंग्रेज भारत को आजाद तो करना चाहते थे कि लेकिन भारत को कई हिस्सों में बांटने के बाद। इसी वजह से उन्होंने मुसलमानों को मुस्लिम लीग बनाने में काफी सहयोग किया। इसमें अमीर, जमींदार, कारोबारी और पेशेवर मुस्लिम शामिल थे जो खुद को भारत के सभी मुसलमानों की आवाज़ कहते थे। मुस्लिम लीग ने 23 मार्च साल 1940 को लाहौर में मुसलमानों के लिए एक अलग आजाद देश की सिफारिश वाला प्रस्ताव पारित कर दिया।

सूमरो ने इसका जवाब देते हुए एक महीने बाद ही अप्रैल 1940 में तीन दिनों का दिल्ली में देशभक्त मुसलमानों का एक बड़ा सम्मेलन किया। इसका नाम 'आजाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस' रखा गया। इसमें पूरे देश से लगभग 75 हजार मुसलमानों ने हिस्सा लिया। जो नहीं चाहते थे की भारत को दो टुकड़ो में बांटा जाए। अंग्रेज सूमरो के आंदोलन से डर गए कि कहीं उनके मंसूबों में पानी न फिर जाए। अंग्रेजों ने अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए सूमरो से 'खान बहादुर' की पदवी वापस ले ली। सिंध के प्रधानमंत्री पद से हटा दिया। 

लेकिन सूमरो अपने विचारों पर अडिग रहे। और जब तक जिंदा रहे उनकी यही कोशिश रही कि भारत के दो टुकड़े न हों।

14 मई साल 1943 सूमरो दिल्ली से शिकारपुर अपने गांव जा रहे थे तभी कुछ लोगों ने उनकी हत्या कर दी। उस समय ये अफवाह थी कि 'मुस्लिम लीग' ने उनसे घबराकर उनकी हत्या करवा दी। लेकिन ये बात साबित नहीं हो सकी। आज भी उनकी हत्या एक रहस्य बनी हुई है। उनकी मौत को उस समय कई अखबारों ने राष्ट्रीय आपदा कहा। भारत को बांटने वालों ने उनकी हत्या की जांच को महत्व नहीं दिया। उनकी मौत के चार साल बाद देश दो टुकड़ों में बंट गया। इतिहासकार मानते हैं कि अगर शायद सूमरो जिंदा होते भारत का नक्शा कुछ और होता।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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