अमेरिका नहीं चाहता था कि इंडिया का न्यूक्लियर प्रोग्राम आगे बढ़े !

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‘अगर मुझे छूट दे दी जाए तो भारत 18 महीनों में परमाणु बम बनाकर दिखा सकता है।’ ये घोषणा होमी जहांगीर भाभा ने अक्टूबर 1965 को ऑल इंडिया रेडियो से की थी।

संयोग कहें या साजिश कि इस घोषणा के केवल तीन महीने बाद ही एक प्लेन क्रैश में उनकी मौत हो गई। क्या अमेरिका नहीं चाहता था इंडिया न्यूक्लियर टेस्ट कर पाए। क्या होमी जहांगीर भाभा से अमेरिका डर गया था। ये सारे सवाल आज भी जिंदा है। आज कहानी होमी जहांगीर भाभा की जो 60 के दशक में सपना देख रहे थे कि इंडिया के पास भी न्यूक्लियर बम हो।

जर्नलिस्ट ग्रेगरी डगलस और सीआईए अफसर रॉबर्ट क्राओली के बीच हुई बातचीत ‘कन्वर्सेशन विथ दा क्रो’ बुक में पब्लिश हुई है।

जिसमें रॉबर्ट क्राओली कहता हैं .

'इंडिया ने 60 के दशक में एटम बम बनाने को लेकर काम शुरू कर दिया थाजो हमारे भविष्य के लिए समस्या थी।'

रॉबर्ट क्राओली के मुताबिकइंडिया ये सब रूस की मदद से कर रहा था। इस बातचीत में रॉबर्ट क्राओली ने होमी जहांगीर भाभा को खतरनाक बताया था। कहा कि होमी जहांगीर भाभा जिस वजह से वियना जा रहे थेउसके बाद उनकी परेशानी और बढ़ती। इसी वजह से प्लेन को बम धमाके के जरिए उड़ा दिया।

होमी जहांगीर भाभा चाहते थे कि देश की सुरक्षा के लिए एटम बम बने। वहीं इंडिया की प्रोग्रेस को देखते हुए अमेरिका डर गया था। अमेरिका नहीं चाहता था कि इंडिया का न्यूक्लियर प्रोग्राम आगे बढ़े। उसे लग रहा था कि अगर इंडिया ने एटम बम बना लिया तो ये पूरे साउथ एशिया के लिए खतरनाक होगा।

24 जनवरी साल 1966 होमी जहांगीर भाभा ने एयर इंडिया के फ्लाइट नंबर 101 से उड़ान भरी। प्लेन मुंबई से न्यूयॉर्क जा रहा था। इसी दौरान एयर इंडिया का बोइंग 707 प्लेन फ्रांस के माउंट ब्लैंक पहाड़ियों के पास क्रैश हो गया। इस हादसे में होमी जहांगीर भाभा के साथ प्लेन में बैठे सभी 117 यात्रियों की मौत हो गई।

हादसे को लेकर जो ऑफिशियल जानकारी सामने आई उसके मुताबिक जेनेवा एयरपोर्ट और फ्लाइट के पायलट के बीच गलतफहमी हुई थी। फ्रांस के माउंट ब्लैंक की पहाड़ियों के बीच फ्लाइट के लोकेशन को लेकर कंफ्यूजन हुई थी। जिसकी वजह से हादसा हो गया। 

लेकिन उस समय इस हादसे को लेकर कई तरह के कयास लगाए गए। सभी की अपनी-अपनी थ्योरी थी। कुछ का मानना था कि प्लेन में बम धमाका हुआ था जबकि कुछ का कहना था कि इसे मिसाइल या फाइटर प्लेन से गिराया गया।

इसके पीछे तर्क है कि सीआईए ने इंडियन एटॉमिक प्रोग्राम को रोकने के लिए भाभा की हत्या की साजिश रची। लेकिन ये बात आजतक साबित नहीं हो पाई।

साल 1966 जब होमी जहांगीर भाभा की मौत हुई तब तक दुनिया के केवल पांच देशों के पास एटम बम था।

सबसे पहले साल 1945 में सबसे अमेरिका ने न्यूक्लियर टेस्ट किया। साल 1949 को रूस, साल 1957 को ब्रिटेन, साल 1960 को फ्रांस और साल 1964 को चीन ने न्यूक्लियर टेस्ट कर लिया था।

साल 1962 में इंडिया चीन से युद्ध हार गया था। फिर साल 1964 को चीन ने न्यूक्लियर टेस्ट भी कर लिया जिसके बाद होमी जहांगीर भाभा भी चाहते थे कि इंडिया के पास भी एटम बम हो। इंडिया भी विश्व की महाशक्ति बने। साल 1964 में जवाहर लाल नेहरू की मौत के बाद जब लाल बहादुर शास्त्री देश के पीएम बने और उन्होंने होमी जहांगीर भाभा के सपने को पंख दिया। दोनों ने इसको लेकर रणनीति भी तैयार कर ली। साल 1965 में ऑल इंडिया रेडीयो में होमी जहांगीर भाभा ने इसको लेकर घोषणा भी कर दी। संयोग ही कहेंगे की होमी जहांगीर भाभा की मौत से केवल 13 दिन पहले ही लाल बहादुर शास्त्री की भी ताशकंद में रहस्यमय ढंग से मौत हो जाती है। उस समय अमेरिका और रूस एक दूसरे के विरोधी थे। और रूस भारत का दोस्त था। ऐसे में अमेरिका नहीं चाहता था कि रूस के दोस्त के पास एटम बम हो।

अगर होमी जहांगीर भाभा की मौत प्लेन क्रैश में न हुई होती तो शायद इंडिया न्यूक्लियर साइंस में कहीं बड़ी अचिवमेंट हासिल कर चुका होता। सिर्फ 56 साल की उम्र में इंडिया में न्यूक्लियर एनर्जी प्रोग्राम के जनक होमी जहांगीर भाभा की मौत हो गई । उनकी मौत के आठ साल के बाद इंडिया साल 1974 में न्यूक्लियर टेस्ट कर पाया।

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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