CAA पर बहस के बीच जानिए किन देशों में हिंदू हैं अल्पसंख्यक, जानें क्या कहती है रिपोर्ट

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तारीख- 11 मार्च, घड़ी पर शाम के 6 बज रहे थे, उसी वक्त केन्द्र सरकार की ओर से एक नोटिफिकेशन जारी कर पूरे देश में  CAA लागू कर दिया गया. जिसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में इस नागरिकता संशोधन अधिनियम को लेकर धरना-प्रदर्शन शुरु हुए और CAA नोटिफिकेशन जारी होने के दो दिन बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल केंद्र सरकार पर अचानक हमलावर होते हुए दिखाई दिए. उनका दावा है कि बीजेपी सरकार देश के युवाओं को रोजगार नहीं दे पा रही है, सरकार की नीतियों से तंग बड़ी संख्या में लोग विदेशों में जाकर कारोबार कर रहे हैं, नागरिकता ले रहे हैं और भारत सरकार पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों को यहां लाकर बसाने की साजिश रच रही है.

CAA लागू होने के बाद चल रही बहस के बीच हमें ये जान लेना चाहिए कि आखिर जिस विषय को लेकर इतना शोर हो रहा है, देश के अलग-अलग हिस्सों में धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं, उसकी सच्चाई क्या है? आखिर बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में कुल अल्पसंख्यक आबादी कितनी है?
नोटिफिकेशन जारी होने के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न की वजह से भारत आए अल्पसंख्यकों को यहां की नागरिकता दी जाएगी. अब तक ये होता था कि भारतीय नागरिकता हासिल करने के लिए किसी भी विदेशी व्यक्ति को भारत में कम से कम 11 साल का वक्त गुजारना होता था. पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर-मुस्लिमों को छोड़कर बाकी दूसरे देशों के सभी धर्मों के लोगों को अब भी 11 साल ही बिताने होंगे. लेकिन, CAA के तहत इन तीन देशों के छह अल्पसंख्यक समुदाय को 11 साल की बजाय 6 साल में ही नागरिकता मिल जाएगी.

दिसंबर 2019 में जब गृह मंत्री अमित शाह ने संशोधित बिल को संसद में पेश किया था, तब उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की आबादी 20% तक घट गई है. उन्होंने दावा किया था कि इन धार्मिक अल्पसंख्यकों को या तो मार दिया गया, या उनका धर्म बदल दिया गया या फिर उन्हें भागकर भारत आना पड़ा. सरकार का तर्क है कि इन देशों में अल्पसंख्यक कम हो रहे हैं और उन्हें अपने धर्म के आधार पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है. दूसरी ओर, इस कानून की आलोचना भी की जा रही है क्योंकि इसमें मुस्लिमों को शामिल नहीं किया गया है.
पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान... तीनों ही मुस्लिम बाहुल्य देश हैं. अक्सर दावा किया जाता है कि यहां गैर-मुस्लिमों की आबादी तेजी से घट रही है.

पर क्या वाकई ऐसा है? इसे थोड़ा आंकड़ों की मदद से समझते हैं.
सबसे पहले बात पाकिस्तान की. साल 1947 में बंटवारे के बाद जब पाकिस्तान बना था, तब वो दो हिस्सों में था. पहला- पश्चिमी पाकिस्तान और दूसरा- पूर्वी पाकिस्तान.
पाकिस्तान की स्वतंत्रता की घोषणा के बाद जब साल 1951 में पाकिस्तान में पहली जनगणना हुई, तब वहां मुस्लिम आबादी 85.8% और गैर-मुस्लिमों की आबादी 14.2% थी. उस समय पश्चिमी पाकिस्तान में गैर-मुस्लिम आबादी महज 3.44% थी. जबकि, पूर्वी पाकिस्तान जो कि आज का बांग्लादेश है वहां 23.2% आबादी गैर-मुस्लिमों की थी.
और फिर साल 1972 में पाकिस्तान में जब दूसरी जनगणना हुई, तब बांग्लादेश बन चुका था. उस वक्त पाकिस्तान की आबादी में गैर-मुस्लिमों की हिस्सेदारी 3.25% थी. पाकिस्तान में आखिरी बार 2017 में जनगणना हुई थी. तब वहां गैर-मुस्लिम आबादी 3.53% थी. गैर-मुस्लिम आबादी में हिंदू, ईसाई, सिख, अहमदिया मुस्लमान और दूसरे धर्मों के लोग आते हैं.
वहीं, बांग्लादेश में गैर-मुस्लिमों की आबादी तेजी से घटी है. साल 1951 में जब बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान ही था तब वहां गैर-मुस्लिम आबादी 23.2% थी. यहां आखिरी बार 2011 में जनगणना हुई थी. उसमें सामने आया था कि बांग्लादेश में गैर-मुस्लिमों की आबादी घटकर 9.4% हो गई है.
अल-जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, 1970 के दशक में अफगानिस्तान में 7 लाख से ज्यादा हिंदू और सिख रहते थे. लेकिन अब वहां इनकी आबादी 7 हजार से भी कम हो गई है.
अमेरिकी विदेश मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2018 में अफगानिस्तान में सिर्फ 700 हिंदू और सिख परिवार ही बचे थे. वहां गृह युद्ध जैसे हालात बनने के बाद गैर-मुस्लिम वहां से लौट आए थे.
ये अनुमान भी उस वक्त का है जब वहां तालिबान की सरकार नहीं थी. अगस्त 2021 में तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के बाद अफगानिस्तान से बड़ी संख्या में हिंदू और सिख भारत लौट आए हैं. बहरहाल, इस वक्त अफगानिस्तान की 99 फीसदी से ज्यादा आबादी मुस्लिम है. वहां, गैर-मुस्लिम आबादी महज 0.3% है.

इन तीनों ही मुल्कों में अल्पसंख्यकों यानी गैर-मुस्लिमों को कई संवैधानिक अधिकार दिए गए हैं. गैर-मुस्लिमों को अपने धर्म और आस्था को मानने का अधिकार है. पाकिस्तान और बांग्लादेश में कई गैर-मुस्लिम अहम पदों पर भी पहुंचे हैं. लेकिन इन सबके बावजूद इन तीनों ही देशों, खासकर पाकिस्तान और बांग्लादेश में गैर-मुस्लिमों की स्थिति चिंताजनक है.

नॉर्थ-ईस्ट राज्यों में बांग्लादेश से नाजायज तरीके से आकर बसे लोगों की संख्या ठीक-ठाक है. पश्चिम बंगाल में भी बड़ी आबादी आकर बसी हुई है. इस आबादी को लेकर अक्सर राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट जारी करती रही हैं तो देश भर में धीरे-धीरे ये फैलते जा रहे हैं. नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में आंदोलन की वजह भी यही हैं. क्योंकि यहाँ के निवासियों को आशंका इस बात की है कि नागरिकता मिलने के बाद बाहर से आए लोग उनका अधिकार छीनने की कोशिश करेंगे. सरकार उनके हिस्से का लाभ भी नए नागरिकों को देने लगेगी.

 
 

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