Anand Bakshi : अपने गीतों से बॉलीवुड के हर दौर को ‘सजाया’

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‘दे दो दिल बचना है मुश्किल

कच्चे धागे में बंधी चली आओगी।

प्यार का जादू चलते ही गोरी

दिल को हम ही से मिलाना पड़ेगा।

हमसे करोगी जो मुकाबला

पछताना पड़ेगा .....’

ये गीत है साल 1958 में रिलीज हुई भगवान दादा की फिल्म ‘भला आदमी’ का। फिल्म तो नहीं चली पर इस गीत को लिखने वाले का करियर चल पड़ा। चार दशक से भी ज्यादा लंबा फिल्मी सफर, चार हजार से भी ज्यादा गाने और 40 बार फिल्मफेयर अवार्ड का नॉमिनेशन, ये रिकॉर्ड्स खुद ही बता देते हैं कि इस गीतकार ने जो रचा उसका दायरा कितना बड़ा था। हम बात कर रहे हैं आनंद बख्शी की। जिनके लिखे गीतों से शशि कपूर का डूबता करियर बचा और राजेश खन्ना पहले सुपरस्टार बने। एक्टर, म्यूजिक डायरेक्टर, सिंगर आते-जाते रहे। लेकिन शब्द रचने वाला ये गीतकार वहीं रहा।

जब दिल छू लेने वाले गाने सुनने का मन करे, तो सबसे पहले आनंद बक्शी के ही लिखे गीत याद आते हैं। 21 जुलाई साल 1930 को पाकिस्तान में जन्मे आनंद बख्शी के पिता रावलपिंडी में एक बैंक मैनेजर थे। आजाद भारत से पहले आनंद बख्शी ब्रिटिश आर्मी में टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी करते थे। जब देश का बंटवारा हुआ तो, बक्शी अपने परिवार के साथ इंडिया आ गए। सिंगर बनने का सपना था तो 'सपनों की नगरी' मुंबई पहुंच गए। लेकिन कमायबी अभी बहुत दूर थी। जिंदगी की जद्दोजहद बढ़ी तो सेना में फिर से नौकरी करने लगे। लेकिन, अपना सपना पूरा करने की धुन उनके सिर से नहीं उतरी। इसके बाद वो दूसरी बार फौज की नौकरी छोड़कर गीतकार बनने के लिए वापस आए।

साल 1958 की फिल्म ‘भला आदमी’ में काम मिला। फिल्म तो नहीं चली। लेकिन आनंद बख्शी की बतौर गीतकार गाड़ी चल पड़ी। हालांकि साल 1962 की ‘मेहंदी लगी मेरे हाथ’ और ‘काला समंदर’ जैसी फिल्मों से उनकी थोड़ी-बहुत चर्चा होने लगी।

साल 1964 की फिल्म ‘मिस्टर एक्स इन बाम्बे’ जिसमें किशोर कुमार बतौर एक्टर काम कर रहे थे। फिल्म में किशोर कुमार ने एक गाना भी गाया जिसके बोल थे ‘मेरे महबूब कयामत होगी’ ये आनंद बख्शी साहब की कलम का कमाल था, जो 60 साल बाद आज भी ये गाना नया सा लगता है।

साल 1965 में आनंद बख्शी के करियर ने एक बड़ी करवट ली। जब मनोज कुमार की फिल्म ‘हिमालय की गोद में’ का गाना ‘चांद सी मेहबूबा हो’ या फिर इसी साल रिलीज हुई शशि कपूर की फिल्म ‘जब-जब फूल खिले’ के गाने जिसमें आनंद बख्शी ने ‘परदेसियों से न अखियां मिलाना’, 'ये समां.. समां है ये प्यार का', जैसे गीत लिखकर अपना ही नहीं, कपूर खानदान की एक्टिंग की विरासत संभालने के भार से दबे शशि कपूर के डूबते करियर को भी बचाया।

साल 1969 दौर आया राजेश खन्ना का। ‘आराधना’ का ‘मेरे सपनों की रानी’, फिल्म ‘अमर प्रेम’ का ‘कुछ तो लोग कहेंगे’, ‘कटी पतंग’ का ‘ये शाम मस्तानी’, फिल्म ‘हाथी मेरे साथी’ का ‘चल चल मेरे साथी’ जैसी कई फिल्मों के लिए गाने लिखे। इन गीतों की ही वजह से राजेश खन्ना बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार बने।

साल दर साल 1970 की जितेंद्र की फिल्म ‘हमजोली’ का गाना ‘हाय रे हाय, नींद नहीं आए’ हो या इसी साल रिलीज हुई संजीव कुमार की फिल्म ‘खिलौना’ का गाना ‘खुश रहे तू सदा’ या फिर साल 1973 में आई देवानंद की फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ का ‘दम मारो दम’ और साल 1975 की धर्मेंद्र की फिल्म ‘चुपके-चुपके’ का ‘अबकी सजन सावन में' ये सभी गाने हर जुबां की पसंद बन गए।

फिर एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन आए। ‘शोले’, ‘अमर अकबर एंथोनी’, ‘दोस्ताना’, ‘मिस्टर नटवर लाल’ और ‘शान’ जैसी फिल्मों आनंद बख्शी की कलम चली। 

आनंद बख्शी ऐसे गीतकार थे, जो आम सी परिस्थियों में भी गीत खोज लाते और उसे इतने सरल अंदाज में लिखते थे कि वो लोगों की जुबां पर चढ़ जाता।

जैकी श्रॉफ की ‘हीरो’, कुमार गौरव की ‘लव स्टोरी’ या फिर ऋषि कपूर की ‘बॉबी’, ‘कर्ज’ और ‘चांदनी’ इन सभी फिल्मों के गाने ही थे जिनकी वजह ये फिल्में सुपरहिट हुईं और इन सभी एक्टर का करियर चल पड़ा। 

उन्होंने अपने करियर में कई पीढ़ियों के साथ काम किया। उनकी खूबी थी कि समय के साथ उनका लिखने का तरीका भी बदलता था।

दौर बदला पर गीतकार नहीं। जमाना आया संजय दत्त, सनी देओल, अक्षय कुमार और शाहरुख खान जैसे एक्टर्स का। संजय दत्त की फिल्म ‘खलनायक’, सनी देओल की ‘गदर’, बॉबी देओल की ‘गुप्त’, अजय देवगन की ‘जान’, अक्षय कुमार की ‘मोहरा’, शाहरुख खान की ‘दिल वाले दुल्हनिया’ और परदेश जैसी फिल्मों के लिए अपनी कलम जादू बिखेरा।

आनंद बख्शी सिंगर का सपना लिए मुंबई आए थे। साल 1972 में उनकी ये भी इच्छा पूरी हुई। फिल्म ‘मोम की गुड़िया’ लिए उन्होंने दो गाने गाए थे। जिसके बोल थे - ‘मैं ढूंढ रहा था सपनों में’ और ‘बागों में बहार आई, होठों पे पुकार आई’।

शमशाद बेगम, लता मंगेशकरअलका याग्निक हों या फिर मन्ना डे, मोहम्मद रफी इन सभी सिंगरों ने आनंद बख्शी के लिखे गीतों को आवाज दी है।

उदित नारायण, कुमार सानू, कविता कृष्णमूर्ति और एसपी बालासुब्रमण्यम जैसे कई ऐसे सिंगर है जिनका पहला गीत आनंद बख्शी ने ही लिखा।

आनंद बख्शी के करियर स्पैन का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि उन्होंने पांच ऐसे म्यूजिक डायरेक्टर के साथ काम कियाबाद में उन्हीं के बेटों के संगीत के लिए भी गाने लिखे। एसडी बर्मन के बेटे आरडी बर्मन, रोशन के बेटे राजेश रोशन, कल्याण जी के बेटे विजू शाह, चित्रगुप्त के बेटे आनंद-मिलिंद और श्रवण के बेटे संजीव और दर्शन। इन सभी के संगीत के लिए आनंद बख्शी ने गाने लिखे।  

वे 40 बार फिल्मफेयर अवार्ड के लिए नॉमिनेट हुए। लेकिन उन्हें ये अवार्ड चार बार ही मिला। आखिरी बार ये अवार्ड साल 1999 में सुभाष घई की फिल्म ‘ताल’ के गीत ‘इश्क बिना क्या जीना यारों’ लिखने के लिए मिला था।

आनंद बख्शी ने कमला मोहन से शादी की। उनके दो बेटे और और दो बेटे हैं। 

सिगरेट पीने की वजह से फेफड़ों और दिल की तकलीफ हुई। 30 मार्च साल 2002 को 72 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया।

आनंद बख्शी के ग्रांडसन आदित्य दत्त हैं। जो साल 2005 की फिल्म  'आशिक बनाया आपने', और साल 2019 की फिल्म 'कमांडो – 3' को डायरेक्ट कर चुके हैं।

आम आदमी की भावनाओं को जुबान देने वाले आनंद बख्शी के गीत अमर हैं। जाते – जाते उन्हीं का लिखा हुआ एक गीत याद आ रहा है। जो जिंदगी की फिलॉसफी देता है।

‘झोंका हवा का, पानी का रेला

मेले में रह जाए जो अकेला।

फिर वो अकेला ही रह जाता है

आदमी मुसाफिर है, आता है, जाता है

आते जाते रस्तें में यादें छोड़ जाता है।

फिल्म साल 1977 की अपनापन। सिंगर लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी। संगीतकार लक्ष्मीकांत – प्यारेलाल।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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