इंदिरा गांधी से नाराज होकर मेनका गांधी ने वरुण के साथ छोड़ा था घर, राजनीति बनी बड़ी वजह?

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परिवार एक मतभेद अनेक,ये हाल है देश के सबसे बड़े सियासी परिवार का, जहां इन दिनों एक भाई, दूसरे भाई का साथ देने के लिए तैयार नहीं है। पहले इंदिरा गांधी और अब राहुल गांधी ने संजय गांधी के परिवार की एंट्री पर नो एंट्री का बोर्ड लगा दिया। ये पहला बार नहीं हुआ है कि संजय गांधी के परिवार को लेकर कांग्रेस गांधी परिवार के मन में खटास हो। इससे पहले इंदिरा गांधी ने भी कांग्रेस की राजनीति को लेकर मेनका गांधी को मना कर दिया था।  

जहां कांग्रेस पार्टी पर सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की मजबूत पकड़ है। तो वहीं गांधी फैमिली की छोटी बहू मेनका गांधी और उनके बेटे वरुण गांधी बीजेपी के सांसद हैं। लेकिन बीते कुछ दिनों से वरुण गांधी और मेनका गांधी की बीजेपी से दूरियां बढ़ रही हैं। पिछले कुछ समय से वरुण गांधी के कांग्रेस में जाने की अटकलें लग रही थीं। लेकिन मंगलवार को पंजाब में राहुल गांधी के एक बयान ने इन अटकलों पर विराम लगा दिया, हालांकि राहुल गांधी से वरुण गांधी की कांग्रेस में एंट्री को लेकर सवाल पूछा गया। तो उन्होंने कहा कि मैं उनसे मिल सकता हूं, गले लग सकता हूं लेकिन मेरी विचारधारा, उनकी विचारधारा से नहीं मिलती।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि कांग्रेस का गांधी परिवार, संजय गांधी के परिवार से दूरी बना रहा हो। साल 1980 में संजय गांधी की मौत के बाद ये गांधी परिवार दो भागों में टूट गया था। संजय की मौत के लिए इंदिरा गांधी कभी खुद को जिम्मेदार मानतीं, कभी मेनका गांधी को, जय गांधी के बाद मेनका खुद को उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में देख रही थीं लेकिन बात नहीं बनीं। मेनका राजनीति में आना चाहती थीं लेकिन इंदिरा गांधी ने विरोध किया। इंदिरा गांधी के एक फैसले ने मेनका की नाराजगी बढ़ा दी। इंदिरा गांधी ने मेनका की बजाय राजीव गांधी को अमेठी का टिकट दे दिया। बाद में मेनका ने कहा भी था कि संजय की मौत के बाद पूरे परिवार का रवैया बदल गया था। मेनका गांधी के अंदर गुस्सा इस बात का था कि संजय की विरासत राजीव के हाथों में जा रही थी। इसको लेकर मेनका और इंदिरा गांधी छोटी छोटी बातों पर लड़ जाती थी।

खुद को साइडलाइन होता देख मेनका गांधी ने राष्‍ट्रीय संजय मंच बनाने का ऐलान कर दिया। मेनका गांधी ने संजय गांधी के दोस्त अकबर अहमद डंपी के साथ मिलकर संजय विचार मंच की शुरुआत की। 27 मार्च 1982 को लखनऊ के कैसरबाग में फाइव पाइंट प्रोग्राम पर कन्वेंशन का आयोजन हुआ।  जहां मेनका गांधी ने जोरदार भाषण दिया। इस पूरे कार्यक्रम का आयोजन तब हुआ जब इंदिरा गांधी लंदन के दौरे थी। जैसे ही इंदिरा गांधी लंदन से लौटीं वैसे मेनका गांधी पर आग बुला हो गई। और उनको घर से बाहर जाने के लिए कह दिया। जिसके बाद  28 मार्च 1982 की रात मेनका गांधी ने इंदिरा गांधी का घर छोड़ दिया। जेवियर मोरो अपनी किताब Red Sari में लिखते हैं- 'सामान गाड़ी में रखा जाने लगा।

फिर बात दो साल के वरुण गांधी पर आकर टिक गई। इंदिरा गांधी किसी भी हाल में अपने दो साल के पोते और संजय की आखिरी निशानी वरुण को जाने देने के लिए तैयार नहीं थीं और मेनका गांधी वरुण को रुकने नहीं देना चाहती थी। जिसके बाद तुरंत इंदिरा गांधी के प्रिंसिपल सेक्रेटरी पी. सी. एलेक्जेंडर को बुलाया गया। उन्होंने इंदिरा गांधी को समझाने की कोशिश की लेकिन वो नहीं मानी और आधी रात में ही कानूनी एक्सपर्ट वकील भी बुलाए गए। वकीलों ने जब इंदिरा गांधी को समझाने कि कोर्ट में जाने पर मेनका के पक्ष में वरुण की कस्टडी चली जाएगी। तब जाकर कहीं इंदिरा गांधी तैयार हुई।

एक इंटरव्यू में मेनका गांधी ने दावा किया था कि इंदिरा गांधी के घर से निकालने और संपत्ति से बेदखल किए जाने के पीछे का सारा खेल राजीव गांधी और सोनिया गांधी का था। इस बीच 31 अक्टूबर, 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। तब मेनका गांधी ने तय किया कि वो राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी में मैदान में उतरेंगी। उन्होंने राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी से निर्दलीय पर्चा भर दिया। मेनका की सभाओं में भारी भीड़ तो उमड़ती थी, लेकिन ये भीड़ वोट में नहीं तब्दील हो पाई। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर ने राजीव गांधी को चुना। राजीव गांधी को तीन लाख से भी ज्यादा वोट मिले। वहीं, मेनका गांधी इस सीट पर अपनी जमानत तक नहीं बचा सकी। उन्हें मात्र 50 हजार 163 वोट ही मिले थे। बस इस बात से खफा मेनका तब से अमेठी नहीं आई।

इसके बाद 1988 में मेनका गांधी ने वीपी सिंह का जनता दल ज्वॉइन किया और 1989 में पीलीभीत से जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़ा और सांसद बनीं। इसके बाद 1996 में वो दूसरी बार पीलीभीत से चुनाव लड़ीं और जीत दर्ज की। इसके बाद से मेनका गांधी कभी चुनाव नहीं हारी हैं लेकिन इस बीच वो 1998 में निर्दलीय चुनाव लड़ीं थी और जीत दर्ज की थी। वो 1996 से अभी तक लगातार सात बार लोकसभा सदस्य रह चुकी हैं। लेकिन बीजेपी के साथ उनका सफर 2004 में शुरू हुआ और इसी साल राहुल गांधी पहली बार चुनाव लड़ा था। तो वहीं पहली बार बीजेपी के टिकट पर मेनका गांधी पीलीभीत से लोकसभा चुनाव लड़ीं और जीत गईं। तब तक वरुण गांधी की छवि एक फायर ब्रैंड हिंदुवादी नेता की बन चुकी थी।

तब वरुण गांधी बीजेपी के प्रमुख रणनीतिकारों में से एक प्रमोद महाजन की नजर में आ गए थे। पार्टी के नंबर दो नेता लालकृष्ण आडवाणी भी वरुण को चाहने लगे थे। इस कारण 2004 में ही वरुण गांधी की एंट्री बीजेपी में हो गई। वरुण गांधी को साल 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का टिकट भी मिल गया। मां मेनका ने बेटे के लिए पीलीभीत सीट छोड़कर बरेली के आंवला लोकसभा क्षेत्र का रुख कर लिया। मेनका गांधी ने आंवला और वरुण गांधी ने पीलीभीत से जीत दर्ज की। 

2013 में वरुण गांधी बीजेपी के सबसे युवा महासचिव बने। 2014 में फिर पीलीभीत से मेनका बीजेपी के टिकट पर जीतीं और वरुण सुल्तानपुर से जीतकर संसद पहुंचे। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में मेनका की जगह पीलीभीत से वरुण गांधी को टिकट मिला और वरुण फिर सांसद बने। मेनका गांधी सुल्तानपुर से सांसद चुनी गईं. लेकिन पिछले कुछ समय से वरुण गांधी की बीजेपी से नाराजगी जगजाहिर है। ऐसे में अटकलें लग रही थीं कि कांग्रेस में उनकी एंट्री हो सकती है लेकिन अब राहुल गांधी के दो टूक बयान के बाद अब इन अटकलों पर विराम लग सकता है।

 

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