‘भीड़’ के जरिए अनुभव सिन्हा ने दिखाई लॉकडाउन की फिक्शनल सच्चाई

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फिल्मों में थ्रीडी कॉमन होता जा रहा है, लेकिन अनुभव सिन्हा फिल्म भीड़ को फुल ब्लैक एंड वाइट में लेकर आए हैं, वैसे इसके पीछे भी एक रीजन है। भीड़ 24 मार्च, जिस दिन देश में लॉकडाउन का ऐलान हुआ था, उसी तारीख को रिलीज हो चुकी है। फिल्म कोरोना और लॉकडाउन पर है, इसे सिर्फ फिल्म की सबसे ऊपरी लेयर कहा जा सकता है। असल में फिल्म लॉकडाउन के वक्त, जब एक बड़ी आबादी अचानक आई एक मुसीबत से बचने के लिए, सोशल डिसपैरिटी का सामना करते हुए जिसको प्रशासन की भी कुछ खास मदद नहीं थी, देश के बटवारे के बाद सबसे बड़ा पलायन कर रही थी। उस पर बेस्ड है।

भीड़ की कहानी में लॉकडाउन के वक्त जो घटित हुआ, उसे फिक्शनल बना कर पर्दे पर उतारा गया है। 24 मार्च जब लॉकडाउन का ऐलान हुआ, तो लोगों ने शहर से गॉव लौटने का फैसला किया। जो रोजगार की तलाश में शहर गए थे। आश्रय की तलाश में वापस लौट रहे थे। उस भीड़ में एक बड़ी संख्या मजदूरों की थी। उस दौरान क्या कुछ हुआ। उसे छोटी-छोटी कहानी के तौर पर पेश किया गया है।

टीनेजर गर्ल ज्योति जो अपने फादर को गुडगांव से दरभंगा बिहार तक साइकिल से ले गई थी। दर्जनों मजदूर जो रेलवे लाइन पर सोने की वजह से कट गए थे। भूख, गरीबी और लोगों के वापसी के लिए न रुकते हुए थके हुए कदमों को बेहेतरीन ढंग से पेश किया गया है। वापसी के लिए लोग क्या कुछ झेल रहे थे, मीलों तक पैदल चलने के अलावा कोई रास्ता नहीं था, और उस पर खाने-पीने की मुश्किलें।

उस वक्त पर भी ऊंच-नीच, जातिवाद। तब्लीकी जमाद से कोविड़ फैलाने की बात, देश के अंदर ही बार्डर बनना, लोगों पर रोटी मांगने पर लाठिया बरसाना, फ्रंटलाइन वर्कर्स जो अपनी जान के जोखिम पर काम कर रहे थे। उन पर से भरोसा उठ जाना, सभी को बेहेतरीन और बैलेंस ढंग से दिखाया गया है।

यहां पर बैलेंस कहना इसलिए जरुरी है क्योंकि फिल्म में इस पक्ष के साथ ही कैसे एक ही सीन में सही और गलत दोनों थे। ये दिखाना बेहद शानदार था। फिल्म देखते हुए कई बार आपको ऐसा लगेगा कि सीन में भले ही व्यक्ति गलत है। लेकिन वो एक पक्ष में सही भी है।

अब बात करते हैं डायलॉग्स पर, जो आसानी से आपके दिमाग में घर कर जाएंगे। बेबसी के वक्त कैसे अमीर हो या गरीब उसके डायलॉग रियलस्टिक लगते है। डायलॉग्स को अलग से पेश करने की कोशिश नहीं गई है, उन्हें हर कैरेक्टर इतने अहसास से बोलता है कि वो डायलाग हाईलाइट न होकर भी व्यूअर के मन तक पहुंचने की काबिलियत रखता है।

ये एक दिन की कहानी है, जैसा कि ट्रेलर में भी दिखाया गया है। लीड रोल में राजकुमार राव यानी सूर्या जोकि पुलिस इन चार्ज है। उन्होंने कैसे छोटी जाति से बिलॉंगिंग के बाद भी वो डिप्रेस होकर भी, उम्मीद बाधने की कोशिश की हैं। जिसकी स्क्रिप्टिंग काफी शानदार है।

साथ ही भूमि पेडनेकर जोकि डॉक्टर और कृतिका कर्मा एक जर्नलिस्ट है। पंकज सिक्योरिटी गार्ड, आसुतोष राणा पुलिस हेड, दिया मिर्जा एक रिच हाईकास्ट लेकिन बेबस मां और सुशील पांडे दिया मिर्जा के ड्राइवर के रोल में हैं। इन सभी अपने शानदार काम से भीड़ को नई पहचान या यूं कहे अलग-अलग एंगल से भीड़ को दिखाया है। जो वाकई आपको फिल्म की गहराई में उतारने की काबिलियत रखता है। इसी के साथ फिल्म की पूरी कास्ट का काम अच्छा है।

अनुभव सिन्हा को आर्टिकल15, थप्पड़ और मुल्क जैसी फिल्मों के लिए जानते है। तो अपनी इस फिल्म भीड़ से भी वो लॉकडाउन के वक्त लगभग सभी को जिंदगी को दिखाने की कोशिश मे करीब-करीब सक्सेस हुए हैं। हालांकि इसी अनुभव सिन्हा के साथ ही राइटर्स सौम्या तिवारी और सोनाली जैन की तारीफ की जानी चाहिए। फिल्म को म्यूजिक अनुराग सैकिया ने दिया है। जो फिल्म में जरुरत के हिसाब से सिचुएशन वो सही टच देता है। 114 मिनट की फिल्म के सिनेमेटोग्राफर सौमिक मुखर्जी है और फिल्म को एडिट किया है अतनू मुखर्जी ने। वैसे फिल्म को ब्लैक एंड वाइट दिखाने के पीछे वजह ये बताई गई कि ट्रैजिडी को कलर्स में नहीं दिखाया जा सकता। 

 

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