मथुरा और काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर औरंगज़ेब के दरबारी इतिहासकार ने क्या लिखा?

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अयोध्या में राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा के बाद अब काशी और मथुरा में भव्य मंदिर के मुद्दों को भी फिर से हवा मिल रही है और अदालतों में भी इनकी सुनवाई तेज़ हो गई है।

अयोध्या में राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा के बाद अब काशी और मथुरा में भव्य मंदिर के मुद्दों को भी फिर से हवा मिल रही है और अदालतों में भी इनकी सुनवाई तेज़ हो गई है। काशी और मथुरा का मामला अदालत में लेकर जाने वाले याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर के पास मौजूद ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि मंदिर के पास मौजूद शाही ईदगाह यहां पहले से बने मंदिरों को तोड़कर बनाए गए थे। ये मंदिर मुग़ल काल में तोड़े गए थे और अब यहां फिर से मंदिर बनाए जाने चाहिए। ज्ञानवापी मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI की सर्वे रिपोर्ट में ये पाया गया है कि मस्जिद से पहले वहां हिन्दू मंदिर था, जो तोड़कर मस्जिद बनाई गई। 

दरअसल, ज्ञानवापी, जिसका उच्चारण ज्ञान-वापी है, संस्कृत में ज्ञान का कुआं। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में एक मस्जिद को दिया गया ये नाम इसकी धार्मिक स्थिति पर विवाद की वजह से चर्चा में है। विवाद का मुद्दा मस्जिद नहीं, बल्कि मस्जिद से पहले क्या था, वो है। मस्जिद, जो गंगा नदी के पश्चिमी तट पर काशी विश्वनाथ मंदिर के बगल में है, कथित तौर पर भगवान शिव को समर्पित विश्वेश्वर मंदिर की जगह पर बनाई गई है। मंदिर को 1194 और 1777 के बीच कई बार बनाया, नष्ट किया गया और फिर से बनाया गया। ज्ञानवापी मामले में एएसआई ने ये पाया है कि हिंदू मंदिर का स्ट्रक्चर 17वीं शताब्दी में तोड़ा गया है और मस्जिद बनाने में मलबे का इस्तेमाल किया गया है। दो तहखानों में हिन्दू देवी-देवताओं का मलबा मिला है। एएसआई की रिपोर्ट के मुताबिक, मस्जिद की पश्चिमी दीवार एक हिंदू मंदिर का भाग है। पत्थर पर फारसी में मंदिर तोड़ने के आदेश और तारीख मिली है। महामुक्ति मंडप लिखा पत्थर भी मिला है। लेकिन अगर मुगल कालीन दस्तावेजों और इतिहासकारों की मानें तो इन घटनाओं का दस्तावेजी जिक्र कई जगहों पर मिलता है। औरंगजेब पर लिखी गई एक किताब मआसिर-ए-आलमगीरी में जानकारी दी गई है कि औरंगजेब ने 8 अप्रैल 1669 को बनारस के सभी पाठशालाओं और मंदिरों को तोड़ने का आदेश जारी किया था। 2 सितंबर को औरंगजेब को बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर टूट जाने की जानकारी मिली थी यानी काशी विश्वनाथ मंदिर को 8 अप्रैल 1669 से 2 सितंबर 1669 के बीच तोड़ा गया था।

मआसिर-ए-आलमगीरी किताब में अहम खुलासे

मआसिर-ए-आलमगीरी को साक़ी मुस्तैद खान ने लिखा था। ये औरंगजेब की सबसे भरोसेमंद किताब मानी जाती है। साक़ी मुस्तैद खान ने इसे 1710 ई. में पूरा कर दिया था। इस किताब में औरंगजेब के शासनकाल 1658 से 1707 तक की घटनाओं का जिक्र है। मोहम्मद साक़ी मुस्तैद खान बादशाह औरंगजेब का दरबारी इतिहासकार था। मआसिर-ए-आलमगीरी किताब का पहला भाग औरंगजेब के जिंदा रहते हुए लिखा गया था। ये किताब औरंगजेब की मौत के बाद पूरी हुई। फ़ारसी में लिखी इस किताब का अनुवाद ब्रिटिश शासन के दौरान प्रसिद्ध इतिहासकार जादूनाथ सरकार ने किया था। वहीं मुगल शासक औरंगजेब ने न केवल हिंदू मंदिर तुड़वाए, बल्कि धार्मिक शहरों के नाम भी बदल दिए थे।

ईदगाह पर क्या है हिंदू पक्ष का दावा?

अब आते हैं मथुरा पर। औरंगजेब ने मथुरा का नाम बदलकर इस्लामाबाद और वृन्दावन का नाम मोमिनाबाद कर दिया। एक लंबे वक्त तक फ़ारसी दस्तावेज़ों में मथुरा के लिए इस्लामाबाद और वृंदावन के लिए मोमिनाबाद नाम लिखने की परंपरा चलती रही, लेकिन आम लोगों ने इन नामों को न तो कभी इस्तेमाल किया और न ही अपनाया। मआसिर-ए-आलमगीरी के पेज नंबर 60 पर साकी मुस्ताद खान ने लिखा था कि जनवरी 1670 में बादशाह औरंगजेब ने आदेश दिया कि मथुरा में जो केशवदेव मंदिर है उसे गिरा दिया जाए और जितनी भी मूर्तियां हैं, जिनमें कीमती जवाहरात जड़े हों, जो मंदिर में रखी थीं उन्हें आगरा लाया जाए और बेगम साहिबा मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे दफ्न कर दिया जाए। साथ ही मथुरा और वृंदावन की सांस्कृतिक पहचान मिटाने के लिए एक आदेश भी दिया। इस आदेश का पूरी तरह अमल में भी लाया गया। मआसिर-ए-आलमगीरी में मुस्तैद के लिखे के अनुसार, 1670 की शुरुआत में मथुरा में मंदिर को गिराया गया। इसके बाद औरंगज़ेब के ही आदेश पर राजस्थान, महाराष्ट्र और मुग़लिया सल्तनत के दूसरे हिस्सों में मंदिर ध्वंस हुए। इतना ही नहीं मथुरा में औरंगजेब ने छह मंदिरों पर हमला किया था। जिसमें से राधा मदन मोहन मंदिर, राधा गोपी नाथ मंदिर, श्रीराधा गोविंद देव मंदिर जैसे ये तीन मंदिर प्रमुख थे।

मथुरा-वृंदावन की टकसालों में ढले चांदी के सिक्के

इतिहासकार लक्ष्मी नारायण तिवारी बताते हैं कि 18वीं सदी के मध्य में जब मथुरा-वृंदावन जाट शासकों के अधिकार में आए, तो उन्होंने सिक्के ढालने के लिए मथुरा और वृंदावन में अपनी टकसालें बनाई। उस वक्त मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय के नाम पर ही सिक्के जारी किये गये थे। सिक्कों पर भी फारसी में मथुरा टकसाल के नाम पर इस्लामाबाद और वृंदावन टकसाल के नाम पर मोमिनाबाद था। इस दौर के कई अहम दस्तावेज़ और मथुरा-वृदावन की टकसालों में ढाले गए वो दुर्लभ सिक्के आज भी वृंदावन के मंदिर गोदा विहार में स्थित ब्रज संस्कृति शोध संस्थान के संग्रह में देखे जा सकते हैं, जो औरंगजेब की दमनकारी नीति की कहानी बयां कर रहे हैं। 

पिछले 10 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं। वैश्विक और राजनीतिक के साथ-साथ ऐसी खबरें लिखने का शौक है जो व्यक्ति के जीवन पर सीधा असर डाल सकती हैं। वहीं लोगों को ‘ज्ञान’ देने से बचता हूं।

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