ऑस्ट्रेलिया के Radioactive Capsule की इतनी चर्चा, भारत में 7 कैप्सूल अब भी गायब!

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हाल ही में वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया के पिलबरा से एक मटर के दाने जितना बड़ा कैप्सूल गुम होने की खबर सामने आई थी, जिससे पूरे देश में हड़कंप मच गया था। ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों ने दिन रात एक करके उस कैप्सूल को खोज निकाला। आखिर इस छोटे से कैप्सूल में ऐसा क्या था, जिसने पूरे देश में हड़कंप मचा दिया। दरअसल, वो कोई सामान्य कैप्सूल नहीं था। वो एक रेडियोएक्टिव कैप्सूल था, जो काफी खतरनाक साबित हो सकता था। खैर उसके मिलने की जानकारी सामने आने के बाद ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों ने चैन की सांस ली। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में भी ऐसे कैप्सूल कई साल पहले गुम हो गए थे। ऑस्ट्रेलिया में तो केवल एक ही कैप्सूल गायब हुआ, तो पूरा देश परेशानी में आ गया। पर भारत में ऐसे 7 कैप्सूल नंदा देवी पर्वत पर गुम हो गए थे। आज हम उन कैप्सूल्स की कहानी ही आपके सामने लेकर आएं हैं।

नंदा देवी पर्वत पर गुम हुए ये कैप्सूल भी प्लूटोनियम से भरे बेहद खतरनाक न्यूक्लियर डिवाइस थे। भारत में इन कैप्सूल्स के गुम होने की कहानी India-China War के बाद शुरू होती है। साल 1964 में चीन ने पहला न्यूक्लियर टेस्ट किया था। जिसका पता अमेरिका को चलते ही अमेरिका अलर्ट हो गया। इसके बाद अमेरिका ने भारत के साथ मिलकर एक सीक्रेट मिशन प्लान किया। भारत के अमेरिका का साथ देने को राजी होने की वजह थी 1962 के युद्ध और चीन से देश की सुरक्षा। सीक्रेट मिशन के लिए भारत की दूसरी सबसे ऊंची चोटी नंदा देवी पर्वत को चुना गया। अमेरिका चाहता था कि यहां से चीन के न्यूक्लियर टेस्ट पर निगाह रखी जाए। इस मिशन पर भारत के इंटेलिजेंस ब्यूरो और अमेरिकी की खुफिया एजेंसी सीआईए ने एक साथ मिलकर पूरा करने की तैयारी की। मिशन के तहत 7 प्लुटोनियम कैप्सूल वाले डिवाइस को नंदा देवी पर्वत पर ले जाना था। जिसका वजन लगभग 56 किलोग्राम था। लेकिन इसे चोटी तक ले जाने का काम बेहद चुनौतीपूर्ण था। मिशन को अंजाम देने के लिए एक बहादुर कंमाडर की जरूरत थी। ऐसे में मिशन की कमान मनमोहन सिंह कोहली को सौंपी गई। कोहली देश के जाने माने क्लाइंबर्स में से एक थे और पहले भी कठिन पहाड़ी रास्तों को पार कर चुके थे। एम.एस कोहली की टीम में भारत और अमेरिका के टॉप क्लाइंबर्स, इंटेलिजेंस ऑफिसर, न्यूक्लियर एक्सपर्ट और रेडियोएक्टिव इंजीनियर भी शामिल किए गए।

कैप्टन कोहली ने एक इंटरव्यू के दौरान बताया कि उनकी टीम ने 56 किलो के न्यूक्लियर डिवाइस को लेकर नंदा देवी पर्वत पर चढ़ना शुरू किया। इस डिवाइस में करीब 10 फीट का एंटीना, ट्रांसीवर और स्नैप जनरेटर के साथ-साथ 7 प्लूटोनियम कैप्सूल थे। वो लगभग अपनी मंजिल पर पहुंच भी गए थे। और मिशन को अंजाम देने वाले थे लेकिन बदकिश्मती से तभी एक बर्फीला तूफान आ गया। तूफान को देखते हुए कैप्टन कोहली ने टीम के साथ बेस कैंप तक वापस जाने का फैसला लिया। टीम के साथी भी इसके लिए राजी हो गए।

कैप्टन कोहली ने बताया कि न्यूक्लियर डिवाइस को अपने बेस कैंप तक ले जाना मुश्किल था। ऐसे में उन्होंने अपनी टीम की जान बचाने को प्राथमिकता दी और डिवाइस को वहीं छोड़कर बेस कैंप की ओर बढ़े। तूफान जाने के बाद जब कैप्टन कोहली अपनी टीम के साथ वापस उसी जगह पहुंचे तो न्यूक्लियर डिवाइस और कैप्सूल खो चुके थे। इसके बाद कैप्टन कोहली और उनकी टीम ने उसी वक्त सर्च ऑपरेशन चलाया। काफी मशक्कत के बाद भी उन्हें न्यूक्लियर कैप्सूल नहीं मिले। रेडियोएक्टिव एक्सपर्ट्स ने वहां के पानी का सैंपल लेकर रेडियो एक्टिविटी की जांच भी की, लेकिन फिर भी कोई फायदा नहीं निकला। कई सालों तक टीमों ने इन कैप्सूल को ढूंढने की कोशिश की।

इंटरव्यू में कैप्टन कोहली ने बताया कि शायद ये कैप्सूल बर्फ में कहीं दफन हैं। वहीं, सीआईए के एक्सपर्ट्स ने कहा था कि अगर ये कैप्सूल गंगा या किसी अन्य नदी में बह गए तो करोड़ों लोगों की जान पर आ सकती है। आज भी एक्सपर्ट्स इन कैप्सूल को लेकर चिंता जताते हैं।

 

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