Bajirao-Mastani : वो प्रेम-कहानी जो एक युद्ध से शुरू हुई

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कहते हैं कि प्रेम एक शब्द नहीं है प्रेम एक जीने की कला है जो इसे समझ जाता है वो इसमें डूब जाता है। ढोला-मारू, रोमियो-जूलियट, हीर और रांझा, लैला-मंजनू की मोहब्बत की दास्तान तो सुनी होगी। लेकिन, वो प्रेम कहानी जिसमें एक तरफ मुस्लिम राज नर्तकी की बेटी हैं और दूसरी तरफ मराठा साम्राज्य के महान पेशवा। जब से ये दोनों मिले उसके बाद केवल मौत ही इनको जुदा कर पाई। दुनिया की तमाम बंदिशों को तोड़कर दोनों ने एक-दूसरे से बेपनाह मोहब्बत की। आज वो प्रेम कहानी जो बेहद दिलचस्प है जो शुरू हुई एक युद्ध से और जिसके अंत में दोनों एक ही दिन दुनिया को छोड़कर चले गए। जिस पर एक फिल्म भी बनाई गई लेकिन क्या आप इस प्रेम कहानी की रियल कहानी जानते हैं ।

यहां से शुरू हुई प्रेम-कहानी

साल 1728 बुंदेलखंड पर मुग़ल सूबेदार मोहम्मद खान बंगश ने हमला कर दिया। इस वक्त बुंदेलखंड पर हिंदू महराजा छत्रसाल बुंदेला का राज हुआ करता था। छत्रसाल के पास बड़ी संख्या में सेना नहीं थी। छत्रसाल को ये लगा कि कहीं उनका राज्य उनसे छीन ना लिया जाए। इस डर के कारण उन्होंने उस मराठाओं से मदद मांगी और उनको मदद का संदेश भेजा। ये संदेश लेकर मस्तानी खुद गईं।

कौन थी मस्तानी?

दरअसल ईरानी मूल की एक मुस्लिम महिला जिसका नाम रूहानी बाई था वो महाराजा छत्रसाल के दरबार में राजनर्तकी थीं। छत्रसाल ने रुहानी बाई से शादी की थी और उनकी 29 अगस्त साल 1699 को एक बेटी हुई। जिसका नाम प्यार से कंचनी रखा गया। और कंचनी ही बाद में मस्तानी के नाम से जानी गईं। बेहद खूबसूरत मस्तानी तलवारबाजी, घुड़सवारी, मार्शल आर्ट के साथ घर के सभी कामकाज भी कर लेती। कला और साहित्य की प्रेमी मस्तानी नाचती और गाती भी बहुत अच्छा थी।

कुछ इतिहासकार कहते हैं राजपूत घराने में पैदा होने के बाद मस्तानी ने मुस्लिम धर्म अपनाया था जबकि कुछ का मानना है कि वो हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के नायाब मेल का प्रतीक थीं। वो कृष्ण की भक्त थीं और नमाज भी पढ़तीं। पूजा भी करती थीं और रोजा भी रखती।

महाराजा छत्रसाल का मुगलों से रक्षा की मदद का संदेश लेकर मस्तानी जब मराठाओं के पास पहुंची तो वहां उसकी मुलाकात बाजीराव बल्लाल भट्ट से हुई।

कौन थे बाजीराव बल्लाल भट्ट?

18 अगस्त साल 1700 को एक भट्ट परिवार में बालाजी विश्वनाथ और राधाबाई के घर बाजीराव बल्लाल भट्ट का जन्म हुआ। बालाजी विश्वनाथ छत्रपति शाहूजी महाराज के पहले पेशवा थे। साल 1720 में बाजीराव के पिता की निधन के बाद शाहू जी ने 20 साल उम्र में बाजीराव को मराठा का पेशवा बना दिया।

जब बाजीराव पेशवा बने तब छत्रपति शाहू नाममात्र के शासक थे, वे ज्यादातर अपने महल में ही रहते। मराठा साम्राज्य चलता छत्रपति शाहू जी के नाम पर था, लेकिन इसे चलाने वाले ताकतवर हाथ पेशवा के ही होते थे।

अपने 20 साल के कार्यकाल में बाजीराव ने 44 युद्ध किए, जिसमें से एक भी नहीं हारा। बाजीराव अच्छे योद्धा होने के साथ-साथ, अच्छे सेनापति भी थे। थोड़े ही समय में उनका नाम पुरे देश में फैल गया। हर तरफ उनकी बहादुरी के चर्चे थे। दिल्ली में उस वक्त बादशाह अकबर का राज था और वो भी बाजीराव की बहादुरी और साहस को सम्मान देता था। इसी वजह से महाराजा छत्रसाल ने भी बाजीराव से मदद मांगी।

बाजीराव और मस्तानी की पहली मुलाकात

जब मस्तानी अपने पिता महाराजा छत्रसाल का संदेश लेकर बाजीराव से मिलीं तो बाजीराव ने मस्तानी को मदद का भरोसा दिया। और उनके साथ बुंदेलखंड चले गए।

इससे पहले की मुगल बुंदेलखंड पर आक्रमण करते और राजा छत्रसाल को पराजित करते, बाजीराव पेशवा की सेना उन पर बिजली की तरह टूट पड़ी और मुगलों का सफाया कर दिया।

राजा छत्रसाल बहुत खुश हुए और उन्होंने कई तरह के उपहार बाजीराव पेशवा को दिए जिनमें कई छोटे छोटे कस्बे भी शामिल थे। बाजीराव पेशवा को मस्तानी बहुत पसंद आई और मस्तानी भी बाजीराव पेशवा को पसंद करने लगी। जब इसकी थोड़ी सी भनक राजा छत्रसाल को पड़ी तो उन्होंने तुरंत मस्तानी का हाथ बाजीराव के हाथ में दे दिया। इतिहासकारों की मानें तो महाराजा छत्रसाल अपनी बेटी मस्तानी बेहद चाहते थे। मस्तानी की शादी में राजा ने इतना दहेज दिया था कि उस समय के राजा-महाराजाओं की आंखें चौंधिया गईं।

महाराजा छत्रसाल ने दहेज में क्या-क्या दिया?

विदाई के समय दहेज के रूप में उन्होंने हीरे की दो खदानें, सोने की 32 लाख मोहरें और सोने-चांदी के असंख्य बर्तन और गहने दिए। जानकारों के मुताबिक इस पूरे दहेज की तुलना अगर आज के समय से की जाए तो 50 हजार करोड़ रुपये के आसपास होगा।

ये बाजीराव पेशवा की दूसरी शादी थी। इससे पहले वे काशीबाई से शादी कर चुके थे। बाजीराव मस्तानी की प्रेम कहानी धीरे-धीरे आगे बढ़ती गई और दोनों एक दूसरे से इतना प्रेम करने लगे कि वो एक पल के लिए भी एक दूसरे से अलग नहीं होना चाहते थे। जब बाजीराव युद्ध करने के लिए महल से निकलते तो मस्तानी का घोड़ा भी उनके साथ साथ चलता था।

बाजीराव की दूसरी शादी से सभी थे नाराज 

बाजीराव की दूसरी शादी से सभी नाराज थे। ऐसा कहा जाता है कि बाजीराव मस्तानी से इतना प्रेम करते थे कि उनके लिए धीरे-धीरे उनका ध्यान अपनी प्रजा और साम्राज्य से हटने लगा। वो अपना ज्यादातर समय मस्तानी के साथ बिताते। उनकी पहली पत्नी काशीबाई को मस्तानी से कोई दुश्मनी नहीं थी और वो बाजीराव की खुशी के लिए दोनों को पति पत्नी के रूप में स्वीकार कर चुकी थी। लेकिन चिमाजी अप्पा जो बाजीराव पेशवा के छोटे भाई थे और उनके साथ बाजीराव पेशवा के बड़े बेटे बालाजी बाजी राव ने कभी भी मस्तानी को नहीं अपनाया। इतिहासकारों की मानें तो मस्तानी एक मुस्लिम थी जिसकी वजह से उसको कोई भी स्वीकार नहीं कर रहा था। बाजीराव की मां राधाबाई भी चाहती कि दोनों अलग हो जाए।

कैसे हुआ प्रेम-कहानी का अंत?

वक्त यूं ही गुजर रहा था कि साल 1740 में बाजीराव एमपी के खरगोन जगह है जो इंदौर के पास हैं वहां पर किसी काम के लिए जाना पड़ा। यहां पर बाजीराव की तबीयत खराब हो गई और उन्हें आराम करना पड़ा। उनकी पहली पत्नी काशीबाई चाहती थी कि मस्तानी को बाजीराव के पास ले जाया जाए, जिससे उनको खुशी मिलेगी।

बाजीराव पेशवा ने संदेश भिजवाया कि कैसे भी करके मस्तानी को उनके तक पहुंचा दिया जाए। ये बात नाना साहब और चिमाजी अप्पा को पसंद नहीं आई और उन्होंने मस्तानी को महल में कैद कर दिया। मस्तानी को कैद करने के बाद उसे नजरबंद भी रखा गया ताकि किसी भी तरह वो बाजीराव तक नहीं पहुंच सके। चिमाजी अप्पा और नाना साहब ने काशीबाई को बाजीराव के पास भेज दिया।

मस्तानी को अपने पास नहीं पाकर बाजीराव बहुत दुखी हुए और 28 अप्रैल 1740 को खरगोन में ही दुनिया को अलविदा कह दिया। उधर समाज और परिवार दोनों ने मस्तानी का तिरस्कार कर दिया। जैसे ही मस्तानी को बाजीराव के निधन का संदेश मिला वो भी सुध बुध भूल गई और बेहोश होकर गिर गईं। जिसके बाद उसी दिन 28 अप्रैल 1740 को ही उनका भी निधन हो गया। इस तरह से दोनों की प्रेम कहानी का अंत हुआ।

मस्तानी के निधन पर है मतभेद

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि बाजीराव के निधन का संदेश मिलने के बाद मस्तानी ने आत्महत्या कर ली थी और कुछ का मानना है कि मस्तानी बाजीराव की चिता पर ही सती हो गईं थी। 

कौन थे शमशेर बहादुर?

मस्तानी का एक बेटा हुआ। जिसका नाम बाजीराव पेशवा ने कृष्णाजीराव रखा, लेकिन उस समय पुणे के ब्राह्मणों ने मुस्लिम मां का पुत्र होने के कारण उनका जनेऊ नहीं होने दिया। तब मजबूरी में बाजीराव ने उन्हें इस्लाम अपनाने को कहा। कृष्णाजी बाद में शमशेर बहादुर के नाम से पहचाने गए। शमशेर को काशीबाई ने ही बड़ा किया था। शमशेर बहादुर ने आगे चलकर मराठा साम्राज्य के लिए युद्ध लड़े। और उन्हें बांदा की रियासत सौंपी थी।

कहानी पर चुकी है फिल्म

इस प्रेम कहानी पर बेस्ड टीवी सीरियल और फिल्म बन चुकी है। इसमें साल 2015 में डायरेक्टर संजय लीला भंसाली की फिल्म बाजीराव मस्तानी भी एक थी।

ये जगह दे रहीं प्रेम-कहानी की गवाही

बाजीराव ने मस्तानी के लिए पुणे में “मस्तानी महल” बनवाया। इंदौर से 100 किलोमीटर दूर नर्मदा के तट पर स्थित रावेरखेड़ी में बाजीराव और मस्तानी की याद में समाधि भी बनी हुई हैं। ये दोनों स्थल आज इस प्रेम की गवाही दे रहा हैं।

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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