BCCI कैसे बना दुनिया का सबसे अमीर बोर्ड?

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साल 1983, क्रिकेट विश्वकप का थर्ड एडिशन भी पिछले दोनों एडिशन की तरह इंग्लैंड में खेला जा रहा था, जिसे टीम इंडिया ने अपने नाम किया। टीम इंडिया उस जीतगी, उस समय ऐसी उम्मीदें कम ही थीं, कारण भी साफ था क्योंकि टीम और बोर्ड दोनों की ही छवि उन दिनों बेस्ट इन द वर्ल्ड जैसी नहीं थीं। लॉर्ड के मैदान पर विनिंग सेलिब्रेशन के लिए भी शैंपेन की बोतले वेस्टइंडीज के ही ड्रेसिंग रुम में ही रखी गईं थीं। भारतीय खिलाड़ियों से जीत की उम्मीद ही नहीं की थी, इसलिए उनके ड्रेसिंग रूम में एक भी शैंपेन की बोतल का इंतज़ाम नहीं था। जिसे बाद में विनिंग सेलिब्रेशन के लिए कपिल देव वेस्ट इंडीज़ के ड्रेंसिंग रूम से लाए थे। 

'द नाइन वेव्स- द एक्स्ट्राऑर्डिनरी स्टोरी ऑफ इंडियन क्रिकेट' बुक के राइटर मिहिर बोस इस पर लिखते हैं कि इस तरह भारतीय खिलाड़ियों ने न सिर्फ़ वेस्ट इंडीज़ को हराया, बल्कि उनकी शैंपेन भी पी थी।जीत की कहानी सभी को पसंद आई। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इतिहास बदलने वाली इस टीम के सम्मान के लिए बोर्ड के पास सम्मानराशि तक के पैसे नहीं थे?

जब टीम जीत के आई तो फैंस इस तादाद में उमड़ पड़ें कि रोड्स ब्लॉक हो गईं। तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने भी टीम का सम्मान किया, लेकिन बोर्ड की स्तिथी खराब थी। तब बोर्ड के अध्यक्ष एनकेपी साल्वे ने लता मंगेशकर से मदद मांगी थी। दिल्ली में लता मंगेशकर का कॉन्सर्ट हुआ। जिससे 20 लाख रुपये की कमाई हुई। इसके बाद खिलाड़ियों को 1-1 लाख रुपये इनाम के तौर पर दिए गए।

लता जी ने तो कॉन्सर्ट के लिए फीस नहीं ली थी, लेकिन बोर्ड ने निश्चित किया था कि उनके जीवनकाल तक, भारत के हर स्टेडियम में मैच देखने के लिए उनके लिए एक सीट रिजर्व रहेगी। लेकिन यहां एक सवाल उठता है कि 1983 में जिस बीसीसीआई के पास खिलाड़ियों को देने के लिए सम्मानराशि नहीं थी, वो आज दुनिया का सबसे अमीर बोर्ड कैसे है?

वैसे अगर हम कहे कि 1983 फाइनल के ठीक पहले इसकी नींव पड़ गई थी, तो गलत नहीं होगा। जैसा हम जानते ही हैं कि टीम इंडिया करिश्मे की तरह उभरती हुई फाइनल में पहुंची थी और जब अपनी टीम फाइनल में हो और अगर मुमकिन हो, तो लाइव मैच देखना किसे पसंद नहीं। तो 1983 में एक इंडियन मिनिस्टर, जोकि अपनी ऑफिशियल विजिट पर ऑलरेडी लंदन में थे। उन्होंने जब बीसीसीआई से दो पास या टिकट्स के मांगे और तब बीसीसीआई अध्यक्ष एन के पी साल्वे साहब ने होस्ट इंग्लैंड बोर्ड से दो सिर्फ दो पास मांगे, तो इग्लैंड क्रिकेट बोर्ड ने साफ इंकार कर दिया। वो भी तब, जब काफी स्टेडियम खाली था। खैर, पहली विश्वकप ट्रॉफी की जीत की खुशी खिलाड़ी, पूरे देश को थी, लेकिन इंग्लैंड बोर्ड की टिकट्स वाली बात एन के पी साल्वे को चुभ रही थी। अब तीनो विश्वकप इग्लैंड में ही हुए थे, तो अध्यक्ष जी ने सबसे पहलेविश्वकप इंग्लैंड से बाहर लाने की ठानी। 

एन के पी साल्वे और पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष एयर मार्शल नूर खान लंच के दौरान मिले, तो साल्वे साहब ने खान साहब से कहा- 'काश भारत में वर्ल्डकप जैसे बड़े टुर्नामेंट हो पाते है'।

नूर खान ने कहा 'हम वर्ल्डकप अपने देश में क्यों नहीं खेल सकते'?

नूर खान ने जैसे ही ये कहा- साल्वे साहब छट से बोले अगर 'भारत और पाकिस्तान मिलकर अगले वर्ल्डकप का आयोजन करें..तो कैसा रहेगा'। 

लेकिन फिर चुनौती वही कि वर्ल्डकप इंग्लैड के बाहर नहीं हुआ था। कारण, आईसीसी ने इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया को वीटो पावर दी थी। जिसके चलते इग्लैंड के बाहर वर्ल्डकप होना, करीब-करीब नामुमकिन था। लेकिन एन के पी साल्वे को तय कर बैठे थे कि उन्हें विश्वकप की मेजबानी चाहिए और अब तो पाकिस्तान हाथ मिला चुका था। विश्वकप आयोजन के लिए भारत-पाकिस्तान के क्रिकेट बोर्ड की एक सयुंक्त समिति बनाई गई और दोनों बोर्ड की सहमति के साथ साल्वे इसके अध्यक्ष बनें। लेकिन सामने आईसीसी को अपने हक में करने की चुनौती थी। 

उस समय आईसीसी के सदस्य तौर पर 28 देश शामिल थे। जिसमें 7 देश टेस्ट क्रिकेट खेलते थे। अब इग्लैंड की विश्वकप दावेदारी को पछाड़ने के लिए बड़ा दांव खेला गया और पैसों की जो बोली लगाई जाती थी, इसे जीत लिया गया। भारतीय बोर्ड ने टेस्ट खेलने और न खेलने वाली टीमों को गारंटी मनी देने का प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव को सुनकर आईसीसी भी हैरान रह गया। फिर वोटिंग का बारी आई और 16:12 के रेशियों से जीत हुई। लेकिन यहां वोटिंग जीतना आसान नहीं था, क्योंकि उन दिनों इंग्लैड, ऑस्ट्रेलिया और वेस्ट इंडीज का दबदबा था। यहां एक प्लस प्वाइंट बीसीसीआई के साथ ये हुआ था कि एशिया में उस समय भारत, पाकिस्तान के साथ ही श्रीलंका टेस्ट प्लेइंग कंट्री थी, जोकि भारत के विश्वकप आयोजन की समिति के साथ आ चुकी थी। 

वर्ल्डकप 1987 की मेजबानी साझेतौर पर भारत और पाकिस्तान को मिल गई। यहां भले ही बीसीसीआई ने अपने दबदबे की शुरूआत की लेकिन अभी आयोजन में लगने वाली रकम का इंतजान करना पूरी तरह से बाकी था। 1987 विश्वकप के लिए श्रीलंका औऱ पाकिस्तान ने पैसों के इंतजाम में मदद से पहले ही मना कर दिया था। तो सारा बंदोबस्त बीसीसीआई को ही करना था। यहां एंट्री हुई रिलायंस ग्रुप की, कई मिटिंग्स और कई बिजनेसमैन, गवर्नमेंट से बातचीत के बाद रिलायंस ग्रुप ने स्पॉनसरशिप को हामी भरी। लेकिन इसके लिए भी बीसीसीआई को शर्त पूरा करवाना था, वो भी देश के तत्कालीन पीएम राजीव गांधी से...

रिपोर्ट्स बताती है कि उस समय धीरूभाई अंबानी ने शर्त रखी कि वर्ल्डकप के ठीक पहले जो भारत और पाकिस्तान के बीच एक प्रदर्शनी मैच होने वाला था, वो इस प्रदर्शनी मैच को भारतीय प्रधानमंत्री के साथ बैठकर देखेंगे और ये मैच टीवी पर दिखाया जाए। इससे वो संदेश देना चाहते थे कि कंपनी रिलायंस के सरकार के साथ अच्छे संबंध हैं। इसमें रिलायंस ग्रुप ने बीसीसीआई का पूरा साथ दिया और पैसे का इंतजाम करने की बड़ी जिम्‍मेदारी अपने सिर लेकर आयोजन को सफल बनाया। आयोजन की सभी तरफ तारीफे हुई। यहां से ही पहली बार सिर्फ विश्व ही इग्लैंड से बाहर नहीं आया बल्कि आईसीसी में भी समीकरण बदले और मेजबानी के लिए रोटेशन का सिलसिला शुरू हुआ। इसके बाद 1993 का विश्वकप तीन देशों और फिर 1996 का वर्ल्डकप फिर से इंडिया और पाकिस्तान ने संयुक्त तौर पर किया। ये भारत की डिप्लोमैटिकली, दबदबे की जीत थी। भारतीय क्रिकेट विश्व क्रिकेट में तुरुप का इक्का है, इस बात की जीत थी। 

इसके बाद से शुरू हुआ बीसीसीआई का अमीर बनने का सफर, अगर आप क्रिकेट प्रेमी हैं, तो आपने जगमोहन डालमिया का नाम जरुर सुना होगा। क्रिकेट जगत से जुड़े कई लोगों का मानना है कि बीसीसीआई की जो मौजूदा फाइनेंशिल बादशाहत है, उसे हासिल करने में जगमोहन डालमिया के कौशल का भी महत्वपूर्ण योगदान है। यानी कि उनके कौशल ने बीसीसीआई को दुनिया में सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। 1990 के दशक में, दूरदर्शन का क्रिकेट के प्रसारण अधिकारों पर एकाधिकार था और बीसीसीआई को दूरदर्शन को हर लाइव प्रसारण के लिए 5 लाख रुपये का प्रसारण का पैसा देता था। जीं हां सही सुना आपने, आजकल हम हैडलाइंस में पढ़ते हैं कि इतने करोड़ में राइट्स बिके, लेकिन उस समय बीसीसीआई मैच दिखाने के पैसे देता था। 

पहली बार जब साउथ अफ्रीका टीम ने बीसीसीआई से ब्रॉडकास्टिंग चार्ज के बारे में पूछा, तब बीसीसीआई को अपनी ब्रॉडकास्टिंग राइट्स कितनी महत्वपूर्ण चीज है, इसका पता चला।BCCI के मैनेजर रहे अमृत माथुर ने एक पॉडकास्ट के दौरान बताया कि साल 1992 में जब जैसे ही दक्षिण अफ्रीका ने भारत दौरे पर आने की डील की, तो उन्होंने प्रसारण अधिकारों की कीमत की पुष्टि करने के लिए माथुर को फोन किया। उस समय बीसीसीआई में कोई भी ब्रॉडकास्टिंग राइट्स की बिक्री या खरीद का आदी नहीं था। दूरदर्शन ही भारत में क्रिकेट मैचों का राष्ट्रीय प्रसारक हुआ करता था और राइट्स की कोई बिक्री नहीं होती थी। डीडी के साथ जो सौदा होता, वो आसान था। विज्ञापन से होने वाला सारा मुनाफा उनके पास जाता था, जबकि बीसीसीआई ऑन-साइट विज्ञापन और टिकटिंग से कमाता था, यानी टिकटों की बिक्री और जमीन पर विज्ञापन से होने वाला मुनाफा बीसीसीआई को जाता था। उन्होंने बताया कि उस समय उन्हें ये भी नहीं पता था कि ये मैच उनकी संपत्ति हैं। जब साल 1992 में दक्षिण अफ़्रीकी लोगों ने पहली बार कीमत पूछी, तो हमें पता चला कि ये संपत्ति है।

लेकिन मजे की बात ये है कि क्या कीमत बतानी है, इसका भी अंदाजा नहीं था। तो दूरदर्शन को फोन किया गया, जिन्होंने $10,000 कीमत बताई। तो कम लगा तो हर मैच के लिए $25,000 मांगना तय किया गया। जब तारीख नजदीक आई और दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेट बोर्ड के अली बाचर ने कीमत के लिए कहा। तो पलटकर उनसे ही पूछा लिया गया कि आपके अनुसार सही कीमत क्या हो सकती है। उन्होंने झिझकते हुए कहा 'क्या 30,000 डॉलर काफी होंगे?' फिर आखिर में सौदा 40,000 डॉलर पर कीमत तय हुई। अगर आज के हिसाब देखें, तो ये करीब 31 लाख रुपये है। आखिरी मैच के बाद बीसीसीआई को 120,000 डॉलर का चेक मिला। जोकि किसी गेम के टीवी राइट्स की उनकी पहली बिक्री थी। फिर फाइनेंस को लेकर बीसीसीआई की तस्वीर ही बदल गई। लेकिन देश में खेल प्रसारण को निजी चैनलों के लिए खोलने का निर्णय डालमिया का था। उन्होंने ही ये अभियान शुरू किया था, फिर भारतीय क्रिकेट विश्व पर भी छाने लगा और क्रिकेट की लोकप्रियता बढ़ने लगी थी।

 वायकॉम के पास बीसीसीआई के टीवी और डिजिटल राइट्स 5,963 करोड़ में खरीदे थे। आज टीम इंडिया वर्ल्ड की क्रिकेट से जुड़ी बनने वाली सभी तरह की लिस्ट में टॉप पर होती है। अब तो जर्सी, लोगो स्पॉन्सर, ट्रेनिंग किट और स्टेडियम में बिकने वाली छोटी-छोटी चीजों के लिए भी लंबे-लंबे बजट बनते है। इसी के साथ टिकट्स सेल करके भी पैसा कमाना भी एक साधन हैं और फिर साल 2008 में इंडियन प्रीमियर लीग की शुरूआत ने तो आने वाले दशकों के लिए भी बाकी बोर्ड बीसीसीआई से पीछे छोड़ दिया। 

आईपीएल दुनिया भर में सबसे ज्यादा देखी जाने वाली लीग है। और तो और इसमें भी बीसीसीआई का दबदबा ऐसा है कि आईपीएल के दौरान एक विंडो दी जाती है। जिसमें न सिर्फ बाइलेट्रल सीरीज नहीं होती और तो और दुनियाभर के क्रिकेटर्स इसमें पार्टिशिपेट करने के लिए आगे बढ़ते हैं। बीसीसीआई की कुल वर्थ आज की डेट में 2.25 बिलियन से भी ज्यादा है। बीसीसीआई के बाद क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया सेकेंड रिचेस्ट बोर्ड है, लेकिन फिर भी वो बीसीसीआई के मुकाबले 28 गुना कम है। साल 2021-22 के फाइनेंशियल ईयर में बीसीसीआई का रेवेन्यू 7606 करोड़ का था, और इस समय में बीसीसीआई ने 1159 करोड़ का टैक्स पे किया है। वहीं अगर पिछले 5 सालों का लेखा-जोखा देंगे, तो बीसीसीआई ने 4298 करोड़ टैक्स पे किया है। वित्त राज मंत्री ने संसद में ये सारे आंकड़े सामने रखे थे। 

ये सारी चीजें पॉसिबल हुईं, इसका सबसे बड़ा कारण है व्यूअरशिप, यानी कि जनता-जर्नादन, इसी वजह से जब किसी बोर्ड की हालत कुछ गड़बड़ होती है, तो वो इंडिया से मैच कराने की कोशिश करता है। कि अगर इंडिया से मैच होगा तो व्यूज ज्यादा होंगे, व्यूज होंगे तो एड, स्पॉनसरशिप जिससे पैसा आएगा। यानी कि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड जोकि इन दिनों कुछ फाइनेशियल क्राइसेस झेल रहा है, अगर इंडिया के साथ मैच हो, उसकी चांदी हो सकती है।एक समय वो था कि साल 1983 में बीसीसीआई को सिर्फ दो टिकट्स के लिए मना कर दिया गया था और आज दुनिया का कोई बोर्ड बीसीसीआई के आगे आड़े नहीं आता। बीसीसीआई के अमीर होने से इंटरनेशनल लेवल पर ही नहीं डोमेस्टिक लेवल पर भी खेल बदला है और अब बीसीसीआई युवा टीम्स जैसे नेपाल, अफगानिस्तान की जरुरत पर मदद भी करती है।लेकिन कहीं न कहीं ये सारा खेल खिलाड़ियो के वर्ल्डक्लास होने पर भी निर्भर था। खिलाड़ियों ने बेस्ट परफॉर्मेंस करके दी और बीसीसीआई अपने डिसिजन से आगे बढ़ता गया, और एक बार और साबित कर दिया कि टीम गेम हो तो क्या नहीं बदल सकता।

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