भारत के भविष्य के फाइटर जेट को ताकत देने वाला इंजन फाइनल हो गया

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फाइटर जेट के इंजन को बनाने की तकनीक क्यों हैं मुश्किल, जिसकी वजह से भारत अभी तक इसे बनाने में कामयाब नहीं हो सकीं। अमेरिका, रूस ,फ्रांस और यूके की कंपनियों की क्या है प्लानिंग ?

आज भारत की सेना की ताकत ग्लोबल फायर पावर इंडेक्स में चौथे नंबर पर आती है। भारत की वायुसेना में एक से बढ़ कर एक फाइटर जेट हैं। भारत खुद ही फाइटर जेट का निर्माण भी कर रहा है,लेकिन इतनी तरक्की के बाद भी एक मामले में हमारे देश की तकनीक अभी भी फंसी हुई है। सालों की कोशिशों के बाद भी DRDO और HAL को इसमें सफलता नहीं मिल सकी है। यही वजह है कि एक कारण की वजह से भारत के भविष्य के फाइटर जेट के निर्माण में भी देरी हो रही है। हालाकि आत्मनिर्भर भारत की ताकत को देखते हुए अब कई विदेशी कंपनियां भारत को इस तकनीक को देने को तैयार हैं। साथ ही इसका निर्माण भी भारत में करने के लिए प्लांट भी लगा रही हैं। ये तकनीक है फाइटर जेट विमानों के इंजन बनाने की। जोकि अभी विश्व के 5 देशों के पास ही है। भारत अपना स्वदेशी फाइटर जेट इंजन बनाने के लिए सालों से प्रयास कर रहा है,लेकिन मौजूदा जरूरतों के हिसाब से उतना ताकतवर इंजन बनाने में कामयाब नहीं हो सका है। ऐसे में क्या है फाइटर जेट के इंजन बनाने को लेकर भविष्य का रास्ता और भविष्य के फाइटर जेट में कौन से ताकतवर इंजन लगाए जाएंगे।

अभी क्या है स्टेटस?

दरअसल भारत ने अपना पहला फाइटर जेट मारुत 1960 के दशक में बनाया था। तब भी भारत के पास उसका स्वदेशी जेट इंजन नहीं था। 1986 में भारत सरकार ने स्वदेशी फाइटर जेट इंजन की तकनीक को विकसित करने की कोशिशें फिर से शुरू कीं। इस दौरान कावेरी इंजन के 9 प्रोटोटाइप तैयार भी किए गए। हालाकि कैग ने 2011 में जारी अपनी रिपोर्ट में लिखा कि रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) का गैस टरबाइन रिसर्च एस्टैब्लिश्मेंट (GTRE) लागत में 642 करोड़ रुपए की भारी बढ़ोतरी और 13 साल की देरी के बावजूद एक ऐसा इंजन नहीं दे पाया जो LCA को ताकत दे सके. इसी वजह से तेजस के पहले वैरियेंट में HAL ने अमेरिकी F-404 इंजन का प्रयोग किया। जिसकी थ्रस्ट क्षमता 100kn से कम होने के चलते काॅम्बेक्ट रेंज और लोड कैरिंग कैपेसिटी सीमित है।

फाइटर जेट इंजन की तकनीक क्यों इतनी सीक्रेट ?

दरअसल फाइटर जेट इंजन को बनाने की तकनीक दुनिया के चुनिंदा देशों के पास ही हैं। फाइटर जेट को कई देश बनाते हैं,लेकिन उनमें लगने वाले जेट इंजन को ज्यादातर देश इन्हीं चुनिंदा देशों से ही खरीदते हैं। जैसे की GE के F-414 इंजन का इस्तेमाल न सिर्फ अमेरिकी F-18 फाइटर जेट्स में होता है। बल्कि कोरियन फाइटर KF-21,स्वीडिश साब ग्रिपन जेट और भारत के तेजस फाइटर जेट में होता है।

इन देशों के पास फाइटर जेट के इंजन बनाने की क्षमता

अमेरिका, रूस, फ्रांस, यूके और चीन

चीन ने भले ही स्टील्थ फाइटर जेट J-20 बना लिया हो,लेकिन उस फाइटर जेट के लिए ताकतवर इंजन उसे रूस से लेना पड़ा क्योंकि रिवर्स इंजीनियरिंग करके उसने जो जेट इंजन बनाए उसकी थ्रस्ट क्षमता बेहद कम थी। वहीं रूस के जेट इंजन तकनीक के मामले में अमेरिकी जेट इंजनों से कमतर माने जाते हैं दुनिया में फाइटर जेट के इंजन बनाने वाली प्रमुख कंपनियों में अमेरिकी कंपनी जीई, फ्रांसीसी कंपनी सफ्राॅन, यूके की कंपनी राॅल्स राॅयस शामिल हैं।

फाइटर जेट के इंजन बनाने की तकनीक कितनी पेचीदा है इसे इस बात से ही समझा जा सकता है कि एक पैसेंजर प्लेन के जेट इंजन में कुल 40 हजार कलपुर्जे लगते हैं फाइटर जेट का इंजन उड़ान के दौरान 1400 डिग्री तक गर्म हो जाता है जबकि लोहा 1538 डिग्री सेल्सियस पर पिघल जाता है। ऐसे में इंजन आफ्टर बर्नर के साथ की बेहद तेज गर्माहट में भी ठीक से काम कर सके ये एक बड़ी चुनौती होती है।

भारत को मिल रहे कौन से ऑफर ?

दरअसल इंडियन एयरफोर्स में लगातार फाइटर जेट की स्क्वाड्रन कम हो रही हैं। इनकी संख्या बनाए रखने के लिए भारत सरकार ने 190 के करीब तेजस MK-1 फाइटर जेट बनाने के आर्डर HAL को दिए हुए हैं। इसके अलावा तेजस के MK-2 वैरियेंट पर भी काम चल रहा है। इसके अलावा भारत पांचवी पीढी के स्टील्थ फाइटर जेट और नेवी के एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए डेक बेस्ड फाइटर जेट बनाने पर भी काम कर रहा हैं।

एयरफोर्स के मौजूदा फाइटर जेट भी पुराने पड़ रहे हैं ऐसे में समय के साथ उनके मेंनटेनेंस के लिए भी ज्यादा ताकतवर और नई तकनीक के जेट इंजन सेना को चाहिए होंगे। भारत अब अपने ज्यादा प्रोजेक्ट पर आत्मनिर्भर भारत योजना के तहत ही काम कर रहा है। इतने ज्यादा नंबर्स में फाइटर जेट बनाने के प्लान को देखते हुए कई विदेशी कंपनियों ने भारत को अपने जेट इंजन की टेक्नोलाॅजी ट्रांसफर कर देश में ही इनकी मैन्युफैक्चरिंग करने के लिए ऑफर किया है। अमेरिकी कंपनी GE 1986 से ही HAL के साथ मिल कर काम कर रही है। और तेजस MK-1 के लिए अब तक 75 F-404 जेट इंजन डिलीवर कर चुकी है । इसके अलावा MK-2 के लिए ज्यादा ताकतवर F-414 की 8 यूनिट भी डिलीवर की जा चुकी है। पिछले साल जून में भारत ने F-414 इंजन को लेकर GE के साथ समझौता किया। जिसके तहत GE इंजन की 80% टेक्नोलाॅजी भारत को देगी। इसके अलावा फ्रांसीसी कंपनी सफ्रान ने भी अपने जेट इंजन की तकनीक को भारत को देने का ऑफर किया है। अभी इस कंपनी के जेट इंजन भारत के राफेल और मिराज-2000 जेट विमानों में प्रयोग किए जाते हैं। रूसी कंपनी ने भी भारत को अपने जेट इंजन की तकनीक देने के लिए ऑफर किया हैं।  

अमेरिकी F-414 ही क्यों चुना ?

 भारत में अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिकल्स अपने F-414 इंजन के INS 56 वर्जन को बनाएगी। अभी तेजस MK-1 में F-404 INS20 इंजन को लगाया जाता है जिसका थ्रस्ट 98Kn(किलो न्यूटन) है। जबकि F-414 INS 56 में 110 किलो न्यूटन थ्रस्ट है। जिसकी वजह से तेजस मैक-2 की स्पीड से उड़ान भर सकेगा। साथ ही उसकी रेंज भी 1600 किमी तक हो जाएगी। डिफेंस एक्सपर्टस के मुताबिक ज्यादा पाॅवरफुल होने के साथ ही ये इंजन फ्यूल इफीशिएंट भी है। साथ ही इसका मेनटेनेंस भी आसान है। यही एक बड़ी वजह भी है। कि भारत के भविष्य के फाइटर जेटस के लिए सरकार ने इस इंजन को चुना है।

तो अब देखने वाली बात ये है कि भारत के भविष्य फाइटर जेट के लिए इंजन की दुविधा दूर हो चुकी है? क्योंकि एयरफोर्स से जुड़े बेहद अहम प्रोजेक्ट तेजस MK-2 और AMCA को लेकर लगातार देरी का नुकसान भी है। IAF की स्क्वाड्रन क्षमता लगातार कम हो रही है। उसे अपने मिग-21 फाइटर जेट को भी रिटायर करना है। ऐसे में फाइटर जेट की कमी को पूरा करने के लिए नए जेट के निर्माण की जो स्पीड है वो बेहद धीमी है। इसमें तेजी लाने के लिए जेट इंजन के निर्माण की स्पीड को भी बढाना होगा।

 

 

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