भारत को महाशक्ति बनाने वाली अग्नि मिसाइल का नया अवतार कितना खतरनाक ?

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भारत के टाॅप सीक्रेट प्रोजेक्ट AGNI-6 Missile को लेकर सामने आई ये नई जानकारी

एक आग का गोला धुएं के गुबार के बीच आसमान को चीरता हुआ निकल जाता है। यही आग का गोला भारत को दुनिया के चुनिंदा देशों की उस फेहरिस्त में शामिल करा देता है। जिनके पास अपनी इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल है। हम बात कर रहे हैं अग्नि मिसाइल की।

 जब रक्षामंत्री ने पीएम राजीव गांधी को फोन कर कहा बधाई हो 

इस मिसाइल टेस्ट की कमान थी इस प्रोजेक्ट के चीफ आर्किटेक्ट डाॅ.एपीजे कलाम के पास। 300 साइंटिस्ट की टीम चांदीपुर में ही मौजूद थी। टेस्ट सफल होने के तीन मिनट बाद यानी 7:20 बजे हाटलाइन से एक काॅल जाती है तत्कालीन डिफेंस मिनिस्टर की ओर से उस वक्त के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के आफिस में। इस काॅल में सिर्फ इतना ही कहा जाता है कि बधाई हो। राजीव गांधी समझ जाते हैं।

 

और शुरू हुआ भारत का मिसाइल प्रोग्राम

भारत परमाणु ताकत 1974 में ही बन गया था] लेकिन न्यूक्लियर डिटरेंस के लिए उसके पास अपनी मिसाइल टेक्नोलाॅजी उस वक्त नहीं थी। 1988 में भारत ने पृथ्वी मिसाइल का टेस्ट कर लिया था]लेकिन इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट की शुरुआत हुई थी 1983 में 400 करोड़ के बजट से। डीआरडीओ और हैदराबाद की डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैब को इसकी जिम्मेदारी मिली थी। अग्नि मिसाइल टेस्ट के सफल होने के साथ ही भारत ने पहली बार न्यूक्लियर वारहेड बनाना शुरू कर दिया।

 ये बात तो हुई अग्नि मिसाइल प्रोग्राम की शुरुआत की। अब आते हैं मई 2023 DRDO के एक सीनियर आफिसर प्रदीप कुरेलकर पाकिस्तान के हनीटैप में फंस जाते हैं। पुलिस की चार्जशीट के मुताबिक प्रदीप कुरेलकर ने DRDO के कुछ टाॅप सीक्रेट प्रोजेक्टस की डिटेल लीक कर दी थी जिसमें अग्नि मिसाइल प्रोग्राम की एक नई मिसाइल से जुड़ी डिटेल्स भी शामिल थी। दरअसल यहां पर अग्नि-6 मिसाइल से जुड़ी जानकारी की बात थी जिसे लीक किया गया था।

तो अब आते हैं अग्नि-6 मिसाइल पर। अभी तक जो जानकारियां सामने आई हैं उनके मुताबिक

 अग्नि-6 मिसाइल का वजन 70 टन, सालिड फ्यूल्ड मल्टीपल स्टेज ICBM,3 टन तक के वारहेड पैकेज के साथ 9 से 12 हजार किमी तक की रेंज,1.5 टन तक के वारहेड पैकेज के साथ 14 से 16 हजार किमी तक की रेंज,सरफेस और सबमरीन दोनों जगहों से लांच किए जाने की क्षमता, चीन के साथ पूरा यूरोप और नार्थ व साउथ अमेरिका अग्नि-6 मिसाइल की रेंज में हैं।

16 हजार किलोमीटर तक की मारक क्षमता 

Agni-6 मिसाइल एक तरह से Agni-5 का ही एक इंप्रूव्ड वर्जन होगा। जिसकी पेलोड कैपेसिटी और रेंज ज्यादा होगी। साथ ही इसमें काफी कंपोजिट मैटेरियल का भी यूज किया जाएगा। जिसका असर इस मिसाइल की स्पीड पर दिखेगा। DRDO इस मिसाइल का टेस्ट कभी भी कर सकता है। इस मिसाइल को लेकर जो जानकारियां सामने आई हैं उसके मुताबिक अग्नि-6 मिसाइल 10 न्यूक्लियर वारहेड ले जाने में सक्षम होगी। अग्नि-6 मिसाइल की जो रेंज है उस रेंज की मिसाइलें चुनिंदा देशों के पास ही हैं।

चीन की ICBM डान्गफाॅग-41 मिसाइल की पेलोड कैपेसिटी जहां 2.5 टन और रेंज 12 से 14 हजार किमी है वहीं अग्नि-6 पेलोड कैपेसिटी 3 टन और 1.5 टन के बीच हो सकती है और इसी हिसाब से इसकी रेंज भी होगी यानी कम पेलोड के साथ इस मिसाइल की रेंज 14 से 16 हजार किमी होगी। जबकि 3 टन तक के पेलोड के साथ इसकी रेंज 9 से 12 हजार किमी तक मार करने की होगी।

 हालांकि इतनी रेंज में भी चीन के साथ पूरा एशिया] यूरोप और अमेरिका तक मार करने की क्षमता भारत को मिल जाएगी। इसके साथ ही इस मिसाइल में एंटी बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम को चकमा देने की क्षमता भी होगी।

हर Agni Missile की अलग खूबी

दरअसल अग्नि मिसाइल प्रोग्राम के तहत बनी हर मिसाइल की अपनी एक खासियत रही है और हर एक मिसाइल दूसरी से बेहतर होती गई है। 8 दिसंबर 2023 को ही चांदीपुर में अग्नि-1 मिसाइल का टेस्ट किया था। ये एक ट्रेनिंग लांच था यानी कि कमांड फोर्स में आए नए सैनिकों की ट्रेनिंग के लिए हुई लंाचिंग। ये एक सिंगल स्टेड मिसाइल है जिसकी रेंज अब बढ कर 1200 किमी तक हो गई है। अग्नि प्रोग्राम के तहत बनी हर मिसाइल एवियोनिक्स और प्रिंसिशन के मामले में लगातार एडवांस होती गई है। मौजूदा समय में आधा दर्जन के करीब अग्नि मिसाइलें हैं। इनकी रेंज की अगर बात करें तो

प्रोजेक्ट अग्नि के तहत अब तक बनी ये मिसाइलें

मिसाइल--  रेंज

अग्नि-1  - 1200 किमी

अग्नि-2  - 2500 किमी

अग्नि-3  - 3500 किमी

अग्नि-4  - 4000 किमी

अग्नि-5  - 5500 किमी

अग्नि प्राइम- 2000 किमी

बेहद सीक्रेट है अग्नि-6 प्रोग्राम

दरअसल अग्नि-6 प्रोग्राम एक बेहद सीक्रेट प्रोग्राम है जिसे लेकर ज्यादा कुछ आफिशियली डिस्कोस नहीं हुआ है। हाल में आईआईटी बीएचयू में आए डीआरडीओ के चीफ ने तो इस प्रोजेक्ट को एक तरह से नकार ही दिया था। लेकिन भारत में मिसाइल टेक्नोलाॅजी के एक तरह से जनक भारत रत्न एपीजे अब्दुल कलाम का ब्रेन चाइल्ड ये अग्नि मिसाइल प्रोग्राम ने भारत की ताकत में कई गुना तक इजाफा किया है। डीआरडीओ के वैज्ञानिक लगातार अग्नि मिसाइलों के एक के बाद अपग्रेडेड वर्जन सामने लाएं हैं। मौजूदा समय में इंटर कांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल रखने वाले विश्व के सुपर पाॅवर्स में भारत भी शामिल है। भारत के अलावा अभी अमेरिका] रूस] चीन] फ्रांस और भारत के पास उनकी अपनी तकनीक से तैयार की गई आईसीबीएम हैं। नार्थ कोरिया के पास जो आईसीबीएम हैं ऐसा माना जाता है कि उसकी तकनीक उसे रुस या चीन से मिली है। अग्नि-6 मिसाइल के अलावा भारत एंटी सेटेलाइट मिसाइल भी बना चुका है, लेकिन भारत के बैलिस्टिक मिसाइल के सपने को पूरा करने में इसरो की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। इसी वजह से भारत मिसाइल टेक्नोलाॅजी के मामले आत्मनिर्भर भी हुआ है। भारत बैलिस्टिक मिसाइल के साथ ही शार्ट और लांग रेंज मिसाइल डिफेंस सिस्टम भी बना रहा है। भारत न्यूक्लियर सबमरीन से मिसाइल लांच करने की क्षमता रखने वाले एलीट देशों के क्लब में भी शामिल है। और अब वह और बड़ी न्यूक्लियर सबमरीन का निर्माण कर रहा है। जिनके जरिए आने वाले समय में आईसीबीएम को भी कहीं से भी लांच किया जा सकेगा

मिसाइल डेवलपमेंट में चीन आगे निकला

वैसे भारत के दो पड़ोसी देश यानी चीन और पाकिस्तान की बात करें तो भारत मिसाइल टेक्नोलाॅजी के मामले में पाकिस्तान से तो काफी आगे है]लेकिन चीन के मुकाबले मिसाइल टेक्नोलाॅजी में बराबरी हासिल करने के प्रयास में है।

साल 2020 में आई पेंटागन की एक रिपोर्ट में ये कहा गया कि चीन सरफेस से लांच की जाने वाली बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों के मामले में या तो अमेरिका के बराबर आ चुका है या उससे भी आगे निकल चुका है। चीन की मिसाइल क्षमता हमारे लिए चिंता की वजह बन सकती है। परेशानी की एक बात ये भी है कि चीन अपनी मिसाइल टेक्नोलाॅजी को पाकिस्तान के साथ साझा भी कर रहा है।

हाइपरसोनिक मिसाइल बना रहा भारत 

इस बीच भारत भी लगातार मिसाइल टेक्नोलाॅजी को बेहतर करने पर काम कर रहा है। डीआरडीओ ने सितंबर 2020 को सफलतापूर्वक हाइपरसोनिक तकनीक डिमोन्स्ट्रेटेड व्हीकल (HSTDV) का परीक्षण किया था. और इसकी हाइपरसोनिक एयर-ब्रीदिंग स्क्रामजेट तकनीक का प्रदर्शन किया था. ऐसा माना जाता है कि ऐसी टेक्नोलाॅजी प्रदर्शन अभी तक सिर्फ रूस ने ही किया है। चीन भी इस टेक्नोलाॅजी पर काम कर रहा है।

 

 

 

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