Bilkis Bano Case: SC का आदेश गुनहगारों को करना होगा 2 हफ्ते के अंदर सरेंडर

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बिलकिस बानो केस में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार के 11 दोषियों को रिहा करने के फैसले को रद्द कर दिया है, साथ ही टिप्पणी करते हुए कहा कि रिहाई पर फैसले का अधिकार गुजरात सरकार को नहीं था। ये अधिकार महाराष्ट्र सरकार के पास था। ये फैसला पीडिता बिलकिस बानो की याचिका के बाद हुआ है, जिसके बाद सभी 11 दोषियों को दो हफ्ते के भीतर गुनहगारों को सरेंडर होगा। 

बिलकिस बानों केस क्या है? 

27 फ़रवरी 2002 को कारसेवकों से भरी साबरमती एक्सप्रेस के कुछ डिब्बों में गोधरा के पास आग लगा दी गई थी, इसमें 59 लोगों की मौत हो गई थी। जिसके बाद गुजरात में भयंकर दंगे भड़क उठे थे। इन दंगों में 1,044 लोग मारे गए।  इन्हीं दंगों के दौरान बिलकिस बानो के साथ बलात्कार हुआ और उसके परिवार के 7 लोगों की हत्या कर दी गई थी। जिसमें उनकी तीन साल की बेटी भी शामिल थी, जिसकी पत्थर पर सिर पटककर हत्या कर दी गई थी। दरअसल, दंगाइयों के हमले से बचने के लिए बिलकिस बानो अपनी तीन साल की बेटी और 15 लोगों के साथ गांव से भाग गई थीं, उस वक्त वो पांच महीने की गर्भवती थीं।

3 मार्च, 2002 को बिलकिस का परिवार छप्परवाड़ गांव पहुंचा और खेतों मे छिप गया। इस मामले की जो चार्ज़शीट दायर की गई, उसके बताया कि 12 लोगों समेत 30 लोगों ने लाठियों और जंजीरों से बिलकिस और उसके परिवार के लोगों पर हमला किया। बिलकिस और चार महिलाओं को पहले मारा गया और फिर उनके साथ रेप किया गया, इनमें बिलकिस की मां भी शामिल थीं, इस हमले में सात लोग मारे गए, ये सभी बिलकिस के परिवार के सदस्य थे। इनमें बिलकिस की तीन साल की बेटी भी शामिल थीं। 

न्यूज18 की रिपोर्ट के मुताबिक, बिलकिस घटना के कम से कम तीन घंटे तक बेहोश रहीं, होश आने पर उन्होंने एक आदिवासी महिला से कपड़ा मांगा। फिर एक होमगार्ड से मिली, जो उन्हें शिकायत दर्ज कराने के लिए लिमखेड़ा थाने ले गया। बिलकिस को गोधरा रिलीफ़ कैंप पहुंचाया गया, वहां से मेडिकल जांच के लिए अस्पताल ले जाया गया।  घटना के बाद बिलकिस पुलिस के पास गईं, लेकिन पुलिस ने बयान में असंगति होने की बात कही और मजिस्ट्रेट ने केस बंद कर दिया।

फिर घटना के तीन हफ्ते बाद 25 मार्च, 2003 को बिलकिस ने National Human Rights Commission में अपील दायर की, सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली। दिसंबर, 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई जांच के आदेश दिए। केस के दौरान मिली धमकियां, 20 बार बदला घर  केस के दौरान बिलकिस बानो को लगातार जान से मारने की धमकी मिलती रही। धमकियों की वजह से उन्हें 2 साल में 20 बार घर बदलना पड़ा, बिलकिस ने न्याय के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। धमकियां मिलने और इंसाफ़ न मिलने की आशंका को देखते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अपना केस गुजरात से बाहर किसी दूसरे राज्य में शिफ़्ट करने की अपील की। 

2004 में बिलकिस एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं, कहा कि उन्हें गुजरात की अदालतों में न्याय मिलने की कोई उम्मीद नहीं है, गुजरात पुलिस के अधिकारी सहयोग नहीं कर रहे हैं। जिसके बाद अगस्त, 2004 में मामले को मुंबई की अदालत में शिफ्ट कर दिया। फिर साल 2008 में निचली अदालत ने फैसला सुनाया, 18 आरोपियों में से 11 को हत्या और बलात्कार के जुर्म में दोषी पाया गया और उम्रकैद की सजा सुनाई गई।  लेकिन बिलकिस CBI फैसले के फैसले से संतुष्ट नहीं थी, वो हाईकोर्ट पहुंची। 4 मई, 2017 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया, 11 दोषियों की उम्रकैद को बरकरार रखा। 23 अप्रैल, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को आदेश दिया कि बिलकिस बानो को मुआवजे के तौर पर 50 लाख रुपये दिए जाएं, साथ ही कोर्ट ने गुजरात सरकार को ये भी आदेश दिया कि बिल्किस बानो को सरकारी नौकरी और नियमों के मुताबिक घर मुहैया कराया जाए।

15 अगस्त,2022 को रिहा हो रहे दोषी

फिर 15 अगस्त, 2022 को गुजरात सरकार की माफी नीति के तहत बिलकिस बानो केस के 11 दोषियों को जेल से रिहा कर दिया गया। इन 11 दोषियों में जसवंत नाई, गोविंद नाई, शैलेश भट्ट, राधेश्याम शाह, विपिन चंद्र जोशी, केशरभाई वोहानिया, प्रदीप मोढ़वाडिया, बाकाभाई वोहानिया, राजूभाई सोनी, मितेश भट्ट और रमेश चांदना को गोधरा को रिहा कर दिया गया था।  साल 2008 में 11 दोषियों को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई गई थी, बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी साल 2017 में इस सज़ा पर मुहर लगाई थी। इस मामले के सभी दोषी 15 साल से ज्यादा की सज़ा काट चुके थे, इसी आधार पर उनमें से एक दोषी राधेश्याम शाह ने सज़ा में रियायत की गुहार लगाई थी। 

क्या कहता है नियम? 

उम्र क़ैद की सज़ा पाए क़ैदी को कम से कम 14 साल जेल में बिताने ही होते हैं, चौदह साल के बाद उसकी फ़ाइल को एक बार फिर रिव्यू में डाला जाता है।  उम्र, अपराध की प्रकृति, जेल में व्यवहार वगैरह के आधार पर उनकी सज़ा घटाई जा सकती है। अगर सरकार को ऐसा लगता है कि क़ैदी ने अपने अपराध के मुताबिक़ सज़ा पा ली है, तो उसे रिहा भी किया जा सकता है। कई बार क़ैदी को गंभीर रूप से बीमार होने के आधार पर भी छोड़ दिया जाता है, लेकिन ये ज़रूरी नहीं है और कई बार सज़ा को उम्र भर के लिए बरक़रार रखा जाता है। 

बिलकिस बानो ने जताया था दुख  सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को माफ़ी के मामले पर विचार करने को कहा था। इसके बाद एक कमिटी बनाई गई थी। क़ैदियों को माफ़ी देने की मांग पर विचार करने के लिए बनी कमिटी ने सर्वसम्मति से उन्हें रिहा करने का फ़ैसला किया। राज्य सरकार को सिफ़ारिश भेजी गई थी और फिर दोषियों की रिहाई के आदेश मिले। गुजरात सरकार के इस फ़ैसले की आलोचना हुई थी, कुछ राजनीतिक दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों ने इस फ़ैसले पर सवाल उठाए थे। 

बिलकिस बानो ने भी भावुक होते हुए कहा था कि, ''जब मैंने सुना कि मेरे परिवार और मेरा जीवन तबाह करने वाले और मेरी तीन साल की बेटी को मुझसे छीनने वाले 11 अपराधी मुक्त हो गए हैं तो मैं पूरी तरह से नि:शब्द हो गई। मैं बस इतना ही कह सकती हूं कि किसी भी महिला के लिए न्याय इस तरह कैसे खत्म हो सकता है?''

एक और लड़ाई , फिर सजा दिलाई 

गुनहगारों को रिहाह करने के फैसले पर भले ही वो निशब्द रह गईं, लेकिन उन्होंने 30 नवंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट में दो याचिकाएं दी। जिसमें पहली 11 दोषियों की रिहाई को चुनौती देते हुए उन्हें तुरंत वापस जेल भेजने की मांग और दूसरी दोषियों की रिहाई पर फैसला गुजरात सरकार कैसे कर सकती है, जब केस का ट्रायल महाराष्ट्र में चला था? ये सवाल था। 

जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार का फैसला पलटा है और सोमवार को मामले में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्‍ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की विशेष पीठ फैसला सुनाया। लाइव एंड लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, निर्णय लिखने वाली न्यायमूर्ति नागरत्ना ने यूनानी दार्शनिक प्लेटो का हवाला देते हुए अपनी कहा दंड प्रतिशोध के लिए नहीं बल्कि रोकथाम और सुधार के लिए दिया जाना चाहिए। एक महिला चाहे समाज में कितनी भी ऊंची या नीची क्यों न समझी जाए, चाहे वह किसी भी धर्म को मानती हो या किसी भी पंथ को मानती हो, सम्मान की पात्र है। क्या महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराधों में छूट दी जा सकती है? ये वो मुद्दे हैं जो उठते हैं। 

जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा- सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हमारा मानना है कि इन दोषियों को स्वतंत्रता से वंचित करना उचित है, एक बार उन्हें दोषी ठहराए जाने और जेल में डाल दिए जाने के बाद उन्होंने अपनी स्वतंत्रता का अधिकार खो दिया है। साथ ही, यदि वे दोबारा सजा में छूट चाहते हैं तो ये जरूरी है कि उन्हें जेल में रहना होगा, सुप्रीम कोर्ट ने सभी 11 दोषियों को 2 हफ्ते में सरेंडर करने के लिए कहा है। 

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