TDP, JDS, RLD और सुभासपा से बीजेपी को क्यों दिख रही उम्मीद?

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एक ओर जहां I.N.D.I.A गठबंधन बीजेपी को हराने के लिए रणनीति बना रहा है, तो वहीं बीजेपी कई क्षेत्रीय दलों को एनडीए में शामिल कर अपना कुनबा बढ़ा रही है।

देश में जल्द आम चुनाव होने वाले हैं और इस चुनाव से पहले देश में नया राजनीतिक समीकरण बन रहा है। एक ओर जहां I.N.D.I.A गठबंधन बीजेपी को हराने के लिए रणनीति बना रहा है, तो वहीं बीजेपी कई क्षेत्रीय दलों को NDA में शामिल कर अपना कुनबा बढ़ा रही है। इनमें वो दल भी शामिल हैं, जो अलग-अलग राज्यों में विरोधी दलों के साथ गठबंधन में रहे हैं और पहले बीजेपी के साथ भी गठबंधन में थे। आइए समझते हैं कि बीजेपी को इन क्षेत्रीय दलों से क्या फायदा हो सकता है?

सबसे पहले बात करते हैं यूपी की। क्योंकि कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर ही गुजरता है। यहां अपना दल एस और निषाद पार्टी के साथ राजभर को साधकर बीजेपी लोकसभा चुनाव 2024 के मिशन 80 को हासिल करने की कोशिश में है। 2019 लोकसभा चुनाव की बात करें तो बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में 78 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें 62 सीटों पर जीत दर्ज की थी। उसमें प्रदेश में बीजेपी की अकेली सहयोगी पार्टी ’अपना दल’ ने दो सीटों पर चुनाव लड़ा और दोनों जगह जीत दर्ज की थी। निषाद पार्टी के मुखिया संजय निषाद के बेटे प्रवीण कुमार निषाद को बीजेपी ने अपने सिंबल पर संत कबीर नगर से लड़ाया था। हालांकि, इस बार समीकरण बदले हुए नजर आ रहे हैं। अपना दल के अलावा, निषाद पार्टी और सुभासपा पर भी अब गठबंधन का हिस्सा है।  

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी

सबसे पहले बात करते हैं यूपी में एनडीए का गठबंधन साथी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी यानी सुभासपा की। सुभासपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर अति पिछड़ों की राजनीति करते हैं। यूपी में 17 अति पिछड़ी जातियां मानी जाती हैं। इनकी आबादी करीब 13.38 फीसदी से ज्यादा है। वहीं राजभर समाज की आबादी करीब 1.32 फीसदी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सुभासपा बलिया, चंदौली, जौनपुर और गाजीपुर समेत 5 से 6 सीटों पर गठबंधन में 2024 लोकसभा चुनाव लड़ने का दावा ठोक सकती है। यूपी में पूर्वांचल के 10 जिलों से 13 सांसद चुने जाते हैं। वहीं विधानसभा की 164 सीटें भी पूर्वांचल में आती हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में सुभासपा ने 8 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें वो चार सीटें जीतने में कामयाब रही थी। इन सीटों पर 34.14 फीसदी वोट मिले थे। इसके बाद 2022 में उन्होंने सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, 6 सीटें जीतीं। इन सीटों पर इन्हें 29.77 फीसदी वोट मिले। फिर सपा से भी रिश्ता तोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया। लोकसभा में सुभासपा का कोई सांसद नहीं है। लोकसभा चुनाव से राजभर बीजेपी के साथ भविष्य की संभावनाएं तलाश रहे हैं।

निषाद पार्टी 

अब बात करते हैं योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री संजय निषाद की निषाद पार्टी की। संजय निषाद का कहना है कि उनकी पार्टी 2024 लोकसभा चुनाव में दो दर्जन से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़े। हालांकि, एनडीए में ये समीकरण सेट होता हुआ नजर नहीं आ रहा है। पार्टी ने दावा किया है कि प्रदेश में दो दर्जन ऐसी सीटें हैं, जहां पर निषाद, केवट, मल्लाह और मछुआ समाज के वोटर चुनाव के परिणामों में असर डाल सकते हैं। निषाद पार्टी ने साल 2017 में सिर्फ एक सीट पर जीत दर्ज की थी। वहीं 2022 में ये संख्या बढ़कर 11 हो गई। हालांकि, इसमें पांच प्रत्याशियों ने बीजेपी के सिंबल पर चुनाव लड़ा था। संजय निषाद के परिवार की बात करें तो उनके यहां मंत्री, सांसद और विधायक तीनों हैं। संजय निषाद खुद यूपी में कैबिनेट मंत्री हैं। उनका बड़ा बेटा प्रवीण निषाद संत कबीर नगर से बीजेपी सांसद तो वहीं छोटा बेटा सरवन निषाद बीजेपी से चौरी चौरा से विधायक हैं।  

अपना दल (S)

यूपी में गठबंधन की सीटों के बारे में बात करें तो इस समय सबसे मजबूत दावा अपना दल का नजर आ रहा है। बीजेपी गठबंधन में पार्टी ने 2014 और 2019 लोकसभा चुनाव में दो-दो सीटों पर चुनाव लड़ा और दोनों जगह जीत दर्ज की थी। 100 पर्सेंट स्ट्राइक रेट के साथ चल रही ’अपना दल’ की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बढ़ी हुई नजर आ रही है। एनडीए में पार्टी इस बार मिर्जापुर, जौनपुर प्रतापगढ़ समेत 5- 6 लोकसभा सीटों पर दावा ठोक सकती है।

राष्ट्रीय लोक दल

पश्चिमी यूपी की बात करें तो राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के प्रमुख जयंत चौधरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े नेताओं में से एक हैं। पिछले दिनों बीजेपी ने किसानों के मसीहा कहे जाने वाले पूर्व पीएम चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देने की घोषणा कर जाटों को लुभाने का काम किया है। इसके बाद ही जयंत चौधरी ने एनडीए में शामिल होने का ऐलान कर दिया है। जयंत के पाला बदलने से I.N.D.I.A अलायंस को जोर का झटका लगा है। खासकर सपा को। क्योंकि इससे पश्चिमी यूपी में चुनावी समीकरण बदल गया है। पिछले दो लोकसभा चुनावों में एक भी सीट नहीं जीतने वाले जयंत बीजेपी के लिए क्यों जरूरी हैं। इसका हम आपको जवाब देते हैं।

बीजेपी की नजर पश्चिमी यूपी के जाटलैंड पर

पश्चिमी यूपी को जाट और मुस्लिम बाहुल्य इलाका माना जाता है। यूपी में रहने वाले 99 प्रतिशत जाट पश्चिमी यूपी के 27 लोकसभा क्षेत्रों में रहते हैं। इनमें से मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद मंडल की 14 सीटों पर जाटों का वोट ही जीत और हार तय करता है। 2019 लोकसभा चुनाव में इन 14 सीटों में से सिर्फ 7 सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी, जबकि 7 सीटों में से 4 पर बसपा और 3 पर सपा को जीत मिली थी। इस बार मिशन 370 के तहत बीजेपी पश्चिमी यूपी के जाटलैंड की सभी 14 सीटों को जीतना चाहती है। पश्चिम यूपी में करीब 18 प्रतिशत जाट आबादी है, जो सीधे चुनाव पर असर डालती है। यानी जाट समुदाय का एकमुश्त वोट पश्चिमी यूपी में किसी भी दल की हार-जीत तय करता आ रहा है। इसलिए बीजेपी को पता है कि जयंत चौधरी और उनकी पार्टी के समर्थन के बिना ये संभव नहीं है।

जननायक जनता पार्टी 

हरियाणा की जननायक जनता पार्टी के अध्यक्ष दुष्यंत चौटाला की पकड़ जाट वोट बैंक पर है। हरियाणा की सियासत में करीब 30 फीसदी जाट समुदाय किसी भी पार्टी को चुनाव जिताने और किसी भी सरकार को गिराने की ताकत रखते हैं। हरियाणा में बीजेपी-जेजेपी के साथ मिलकर फिलहाल सरकार चला रही है। 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में जेजेपी एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। हरियाणा की 10 की 10 सीटे बीजेपी ने जीती थी। हालांकि 2019 में हुए विधानसभा चुनाव में जेजेपी ने 90 में से 10 सीटें जीती थी। वहीं बीजेपी ने 40 सीटों पर जीत हासिल की थी। बाद में जेजेपी के साथ गठबंधन कर बीजेपी ने सरकार बनाई है। दुष्यंत चौटाला को डिप्टी सीएम बनाया गया था। जेजेपी चाहती है कि वो आगामी चुनावों में भी बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़े।  

लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास)

इसके अलावा बिहार की बात करें तो यहां लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) के चीफ चिराग पासवान एक प्रमुख युवा चेहरा हैं। अभी लोकसभा में लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) से चिराग पासवान एकमात्र सांसद हैं। हालांकि बिहार में उनका कोई विधायक नहीं है। ऐसा माना जाता है कि बिहार में 16 फीसदी दलित वोट बैंक में से 6 फीसदी वोट बैंक पर चिराग पासवान की पार्टी का एकाधिकार है। दरअसल ये पासवान समाज का वोट बैंक है। चिराग पासवान की पार्टी राज्य की उन सभी छह सीटों पर अपना दावा पेश करती रही है, जिस पर एलजेपी ने पिछली बार जीत हासिल की थी। वो रामविलास पासवान की पहचान रही हाजीपुर सीट भी चाहती है।  

हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा

बिहार की नई सरकार में चार विधायक और एक विधान परिषद सदस्य वाले हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा सेक्युलर के संस्थापक और बिहार के पूर्व सीएम जीतन राम मांझी के ‘हम’ को नीतीश मंत्रिमंडल में एक सीट दी गई है। जीतन राम मांझी दलित समाज की राजनीति करते हैं और बिहार में करीब 16 फीसदी दलित मतदाता हैं। बिहार में छह लोकसभा और 36 विधानसभा सीटें दलित समुदाय के लिए सुरक्षित हैं। अगर 2020 के विधानसभा चुनाव की बात की जाए तो हम ने सात सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिनमें से 4 सीटें जीती थी। इन सीटों पर उसे 32.28 फीसदी वोट मिले थे। वहीं 2015 के चुनाव में मांझी ने 21 सीटों पर चुनाव लड़ा था। लेकिन, वो एक सीट ही जीत पाए थे। तब उन्हें 26.90 फीसदी वोट मिले थे। हालांकि लोकसभा में उनका कोई नेता नहीं है। मांझी के बेटे संतोष समुन बिहार की महागठबंधन सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं।

जनता दल (सेक्युलर) 

बीजेपी के हाथ से उसका दक्षिण का एकमात्र दुर्ग कर्नाटक छिन गया। लोकसभा चुनाव से पहले इसे बीजेपी के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा। ऐसे में बीजेपी ने दक्षिण में अपने नए दोस्तों की तलाश शुरू कर दी। ऐसे में बीजेपी ने लोकसभा चुनाव से पहले जनता दल (सेक्युलर) पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देव गौड़ा से गठबंधन कर लिया। जेडीएस ने बीजेपी से लोकसभा चुनाव के लिए चार सीटों की मांग की है। हालांकि जेडीएस का अभी केवल एक ही सांसद है। एचडी देवगौड़ा वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं, इसलिए ये समुदाय उनका कोर वोट बैंक माना जाता है। प्रदेश में इस समुदाय के लोगों की आबादी करीब 12 फीसदी है। इस बार हुए विधानसभा चुनाव में उनकी 19 प्रत्याशी ही चुनाव जीतने में सफल रहे। जबकि इससे पहले वाले चुनाव में जेडीएस ने 37 सीटें जीती थीं। वहीं बीजेपी की सीटें भी 104 से घटकर 66 हो गई हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि कर्नाटक में लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए दोनों पार्टियों को एक-दूसरे के साथ की जरूरत थी।  

तेलुगू देशम पार्टी 

इसके अलावा दक्षिण में बीजेपी की नजर अपने पुराने साथी चंद्रबाबू नायडू पर भी हैं। लोकसभा चुनाव से पहले दोनों दलों के बीच गठबंधन की पूरी संभावना है। दरअसल टीडीपी 2014 में एनडीए का ही हिस्सा था, लेकिन आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने के मुद्दे पर टकराव के बाद टीडीपी 2018 में एनडीए से नाता तोड़ दिया था। इसका नतीजा ये हुआ था कि आंध्र प्रदेश के विधानसभा चुनाव में टीडीपी को 23 तो लोकसभा में तीन सीटें मिली थीं। जबकि बीजेपी के खाते में एक भी सीट नहीं आई थी। वहीं तेलंगाना के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा था। 2019 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने टीडीपी से अलग दूसरी पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था, लेकिन वो केवल एक सीट ही जीत पाई थी। बीजेपी को 5.53 प्रतिशत वोट तो वहीं टीडीपी ने 23 सीटों पर जीत दर्ज कराई थी और उसे 39.17 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे। इसी तरह पिछले लोकसभा चुनाव में टीडीपी के खाते में तीन सीटें आई थीं और उसे 39.59 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि बीजेपी को एक प्रतिशत से भी कम वोट मिला था। ऐसे में साफ है कि टीडीपी को अपनी राजनीतिक ताकत वापस पाने के लिए जिनती बीजेपी की जरूरत है, उससे कहीं ज्यादा बीजेपी को टीडीपी की जरूरत है।

महाविकास अघाड़ी 

अब महाराष्ट्र को देखा जाए तो वहां भी बीजेपी अपनी मजबूत जीत की दिशा में कदम आगे बढ़ा रही है। पहले शिवसेना में टूट की और एकनाथ शिंदे खेमे को एनडीए में शामिल किया और राज्य में सरकार बनाई। उसके बाद एनसीपी खेमे से अजित पवार भी 30 से ज्यादा विधायकों के साथ एनडीए में आ गए। महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी में टूट होने से बीजेपी को सीधा फायदा मिला है और उद्धव ठाकरे और शरद पवार अलग-थलग पड़ गए हैं। 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद उद्धव ने एनडीए का साथ छोड़ दिया था और महाविकास अघाड़ी के साथ मिलकर राज्य में सरकार बना ली थी। महाराष्ट्र में कुल 48 सीटें हैं और 2019 के चुनाव में एनडीए ने 41 सीटों पर कब्जा किया था। यूपीए को 5 सीटें मिली थीं। बीजेपी ने 23, शिवसेना ने 18, एनसीपी ने चार सीटें जीती थीं।  हालांकि इन सबके बीच गठबंधन के साथियों के बढ़ते कद और महत्वाकांक्षाओं के बीच बीजेपी की मुश्किलें बढ़ाने वाली हैं। 

पिछले 10 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं। वैश्विक और राजनीतिक के साथ-साथ ऐसी खबरें लिखने का शौक है जो व्यक्ति के जीवन पर सीधा असर डाल सकती हैं। वहीं लोगों को ‘ज्ञान’ देने से बचता हूं।

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