2024 लोकसभा चुनाव के लिए विपक्ष के ‘चुनावी चक्रव्यूह’ में फंसेगी BJP, जानें क्या है खास प्लान?

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2024 लोकसभा चुनाव से पहले जहां एक तरफ सभी विपक्षी पार्टियां एक दूसरे के साथ गठबंधन कर बीजेपी को चुनौती देने की तैयारी में हैं, लेकिन विपक्षी एकजुटता इतनी आसान नहीं है, क्योंकि, कई राज्यों में विपक्षी दल एक-दूसरे के सामने हैं। वहीं, कुछ राज्यों में क्षेत्रीय दलों का मुकाबला सीधे कांग्रेस से है। 

क्षेत्रीय दल और कांग्रेस के बीच कई मौकों पर न सिर्फ विरोध रहा है बल्कि क्षेत्रीय दल भी कांग्रेस से दूरी बनाए रखने में ही अपना फायदा समझ रहे हैं। इसके पीछे उनकी अपनी वजह भी है। अधिकतर क्षेत्रीय दल चाहे तेलंगाना में हों या आंध्र प्रदेश में, पश्चिम बंगाल में हों या महाराष्ट्र में, कांग्रेस के पतन की कीमत पर ही उभरे हैं। जिन-जिन राज्यों में कांग्रेस कमजोर होती गई वहां-वहां क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ता गया। बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और झारखंड जैसे राज्य में कांग्रेस से जो वोट बैंक निकला, उस पर ही अपनी पकड़ बनाकर क्षेत्रीय दल स्थापित हुए। महाराष्ट्र में कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना (उद्धव ठाकरे) में गठबंधन है, लेकिन पश्चिम बंगाल में टीएमसी और कांग्रेस को एक मंच पर लाना आसान नहीं है। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में टीएमसी की 22 में 11 सीट पर जीत का अंतर दस फीसदी से कम था। ऐसे में ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ हाथ मिलाती हैं,तो टीएमसी सहित कांग्रेस को भी इसका फायदा मिल सकता है। क्योंकि, कांग्रेस के पास छह फीसदी वोट के साथ सिर्फ दो सीट हैं। कांग्रेस-वामदलों के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ती है। ओडिशा में भी मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के लिए लड़ाई आसान नहीं है। लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी एकता में उत्तर प्रदेश की भूमिका सबसे अहम है। प्रदेश में लोकसभा की 80 सीट हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 62 सीट पर जीत दर्ज की थी। 2019 के चुनाव में बीजू जनता दल यानी बीजेडी और बीजेपी के बीच सिर्फ चार फीसदी वोट का फर्क था, जबकि बीजेडी की 12 में से सात सीट पर जीत का अंतर दस फीसदी से कम था। वहीं, कांग्रेस के पास 13 प्रतिशत वोट है। अगर बीजेडी-कांग्रेस साथ आते हैं तो बीजेपी के लिए लड़ाई मुश्किल हो जाएगी।

कांग्रेस- बीजेपी और क्षेत्रीय दलों के बीच त्रिकोणीय मुकाबला

दरअसल, सात राज्यों में कांग्रेस, बीजेपी और क्षेत्रीय दलों के बीच त्रिकोणीय मुकाबला है, जबकि चार राज्यों में एनडीए और यूपीए के घटक दलों के बीच चुनावी टक्कर होती है। वहीं 8 राज्यों में कांग्रेस और बीजेपी के बीच अक्सर सीधा सामना होता है। ऐसे में विपक्षी खेमे में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है। ऐसे में कांग्रेस के बगैर विपक्षी एकता बेमानी होगी, यही वजह है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सभी दलों से बात कर गठबंधन की संभावना तलाश रहे हैं।

क्षेत्रीय दलों के नेताओं के साथ चर्चा कर रहे नीतीश 

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और वरिष्ठ नेता राहुल गांधी से विपक्षी एकता पर चर्चा के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब उन क्षेत्रीय दलों के नेताओं के साथ चर्चा कर रहे हैं, जो अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस को प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखते हैं। इनमें तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव शामिल हैं। वहीं, कांग्रेस दूसरे दलों से बात कर रही है। अब देश में कुल 6 राष्ट्रीय राजनीतिक दल हैं। इनमें भारतीय जनता पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), नेशनल पीपुल्स पार्टी, आम आदमी पार्टी है।

कांग्रेस और बीजेपी में सीधा मुकाबला 

कर्नाटक, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और असम सहित कई ऐसे राज्य हैं, जहां कांग्रेस और बीजेपी में सीधा मुकाबला होता है, लेकिन पिछले दो चुनाव में कांग्रेस कमजोर साबित हुई है। साल 2014 के चुनाव में 189 सीट पर दोनों पार्टियों के बीच मुकाबला था। इनमें से 166 सीट पर बीजेपी जीती थी। पिछले चुनाव में 192 सीट पर दोनों पार्टियों के बीच हुए सीधे मुकाबले में बीजेपी 176 सीट जीतने में सफल रही। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, विपक्षी एकता के लिए जिस राज्य में क्षेत्रीय दलों की बीजेपी से सीधी लड़ाई है, वहां लोकसभा चुनाव में कांग्रेस छोटे भाई की भूमिका में रह सकती है। पार्टी ने उदयपुर संकल्प में भी कहा था कि वो राजनीति परिस्थितियों के हिसाब से जरूरी गठबंधन के रास्ते खुले रखेगी। 2019 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 196 सीट पर दूसरे नंबर पर रही थी। इनमें से 17 सीट पर कांग्रेस सिर्फ पांच फीसदी के अंतर से हारी थी। 54 सीट पर हार का अंतर पांच से 15 प्रतिशत के बीच रहा। बाकी 125 सीट पर हार-जीत का अंतर 15 फीसदी से ज्यादा रहा था। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस कई राज्यों में अपना खाता तक नहीं खोल पाई। इनमें दिल्ली, गुजरात, आंध्र प्रदेश, हिमाचल, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, ओडिशा, त्रिपुरा, मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम, दमन दीव, दादर नगर हवेली, लक्षद्वीप, और चंडीगढ़ शामिल है।

सीट बंटवारे का फॉर्मूला

विपक्षी एकता की कोशिशों में सबसे अहम भूमिका सीट फॉर्मूला निभाएगा समान विचारधारा वाले दल एक-दूसरे से चर्चा कर सीट बंटवारे का फॉर्मूला तलाशने में सफल रहते हैं, तो गठबंधन में मुश्किल नहीं होगी। माना जा रहा कि विपक्षी दल 1 सीट 1 उम्मीदवार को आधार बनाकर एकजुट हो चुनाव लड़ने की संभावना तलाश रहे हैं। अगर थर्ड फ्रंट की कवायद होती है तो कांग्रेस की जरूरत पड़ेगी। हालांकि विपक्षी एकता की कोशिशों के बीच बीजेपी लोकसभा की हर सीट के हिसाब से रणनीति तैयार कर रही है। मोदी फैक्टर पर ही उसे भरोसा है। अब विपक्ष इसकी काट निकाल भी पाएगा या नहीं ये देखने वाली बात होगी।

पिछले 10 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं। वैश्विक और राजनीतिक के साथ-साथ ऐसी खबरें लिखने का शौक है जो व्यक्ति के जीवन पर सीधा असर डाल सकती हैं। वहीं लोगों को ‘ज्ञान’ देने से बचता हूं।

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