Bollywood Actress Smita Patil की मोहब्बत के सामने कैसे अड़चन बन गई उन्हीं की Personality?

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पिछले दिनों एक इंटरव्यू में बॉलीवुड एक्टर नवाजुद्धीन सिददकी से उनके काॅप्लेक्शन को लेकर एक सवाल पूछा गया। जिसमें यह भी कहा गया कि फेयर स्किन के प्रति | ऑब्सेस्ड बाॅलीवुड में क्या आपके लिए यह एक चैलेंज नहीं था। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि उनके मुताबिक ऑन स्क्रीन सुंदरता के मामले में स्मिता पाटिल खूबसूरत अभिनेत्री थीं। 

ऑन स्क्रीन ब्यूटी रियल वल्र्ड में खूबसूरती से बेहद अलग होती है। यहां हम बात तो नवाजुद्धीन सिद्दकी के इंटरव्यू की कर रहे हैं, लेकिन यह स्टोरी स्मिता पाटिल की है। जिनकी अदाकारी और खूबसूरती के कदरदान आज भी हैं। स्मिता की मौत 36 साल पहले  13 दिसंबर 1986 हो हुई थी।

साल 1982 में महेश भटृ की एक फिल्म आई। फिल्म का नाम था अर्थ जिसमें एक सीन था। जहां स्मिता पाटिल ने दूसरी औरत के डर और उसके अंदर की असुरक्षा व मेंटल हेल्थ को बेहद संजीदगी से पर्दे पर उतारा था। फिल्म में मनो चिकित्सक की सलाह पर शबाना स्मिता के घर उनसे मिलने आती हैं। ताकि स्मिता अपने काल्पनिक डर का सामना कर सकें।

दोनों के बीच बेहद मार्मिक संवाद होता है, ग्लानि में घुलती जा रही स्मिता शबाना से कहती हैं कि मैं इंदर को चाहती हूं, तुम्हारे पति को नहीं। मैं अपना घर बसाना चाहती थी। तुम्हारा घर उजाड़ना नहीं। इसके बाद शबाना उसे दिलासा देते हुए कहती हैं कि मेरा घर था ही नहीं, तुमने कुछ नहीं उजाड़ा।

इसी साल एक और फिल्म आती है भीगी पलके। जिसकी शूटिंग के दौरान स्मिता और राज बब्बर की मुलाकात होती है। जो पहली नजर में प्यार में बदल बदल जाती है। राज बब्बर शादीशुदा थे, और दो बच्चों के पिता भी। लेकिन फिर भी दोनों एक-दूसरे पर दिल हार बैठे। और राज बब्बर अपनी पत्नी नादिरा को छोड़कर स्मिता के साथ लिव इन में रहने लगे। उस वक्त बिना शादी के एक कपल का साथ रहना समाज में बहुत बड़ी बात होती थी। कुछ समय बाद दोनों ने शादी कर ली। इस लव स्टोरी का जिक्र लेखिका मैथिली राव ने स्मिता की बायोग्राफी में भी किया है। साथ ही अर्थ फिल्म के उस सीन के जैसी बात भी इस किताब में लिखी जाती है। जिसमें शबाना और स्मिता पाटिल के बीच घर तोड़ने की बात होती है। किताब में यह लिखा जाता है कि स्मिता की मां इस रिश्ते के खिलाफ थीं और उनका कहना था कि महिलाओं के लिए लड़ने वाली स्मिता किसी और का घर कैसे तोड़ सकती हैं।

17 अक्टूबर 1955 को पुणे में जन्मी स्मिता के पिता शिवाजीराव पाटिल महाराष्ट्र सरकार में मंत्री और मां विद्या ताई पाटिल सामाजिक कार्यकर्ता थीं। फिल्मों आने से पहले वे दूरदर्शन पर न्यूज रीडर के तौर पर काम करतीं थी। स्मिता ने 1975 में श्याम बेनेगल की फिल्म ‘चरणदास चोर‘ से करियर की शुरुआत की। अगर कुछ फिल्मों की बात करें तो

1976 में ‘मंथन’ और साल 1977 में आई भूमिका में औरत के जटिल मनोविज्ञान को बड़े पर्दे पर साकार किया। 1980 में आई मराठी के प्रसिद्ध साहित्यकार जयवंत दलवी की कृति पर आधारित चक्र में झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाली अम्मा का रोल किया। बाजार में एक मुस्लिम लड़की का किरदार निभाया, जो अपनी आँखों के सामने ही औरत के सौदा होने की गवाह बनी। वहीं जब्बार पटेल की ‘सुबह’ में उन्होंने एक ऐसे अधिकारी की पत्नी का रोल अदा किया जो पत्नी की गैर-मौजूदगी में एक दूसरी औरत से रिश्ता कायम कर लेता है। मंथन में उन्होंने दलित महिला का रोल किया। रविन्द्र पीपट की वारिस में उन्होंने बे-औलाद विधवा का रोल बखूबी से अदा किया। 1985 में फिल्म ‘मिर्च-मसाला‘ में उन्होंने सांमतवादी व्यवस्था के बीच पिसती औरत के संघर्ष की कहानी बयां की।

औरतों के सब्जेक्ट पर इतनी सारी फिल्में करने का साथ वे रियल लाइफ में महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ती रहती थीं। इसी कारण शायद स्मिता को नादिर का दिल तोड़ने की सजा भी मिली तभी शादी के कुछ समय बाद ही स्मिता और राज के बीच मनमुटाव होने लगे। स्मिता ने बेटे प्रतीक जन्म दिया। जिसके बाद से उनकी तबीयत खराब होने लगी। बच्चे के जन्म के 15 दिन बाद ही मात्र 31 साल की उम्र में 13 दिसंबर साल 1986 को उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद राज बब्बर भी अपनी पहली पत्नी नादिरा के पास वापस चले गए। अपने 10 साल के करियर में स्मिता ने आर्ट फिल्मों के साथ बॉलीवुड मसाला फिल्मों में काम किया। उन्हें ‘पद्म श्री‘ के साथ दो बार बेस्ट एक्ट्रेस का नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिल चुका है। पांच बार फिल्म फेयर से सम्मानित हो चुकीं स्मिता पाटिल एक ऐसी अदाकारा थीं जिनके नाम पर बॉलीवुड में अवॉर्ड भी दिए जाते हैं।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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