बॉलीवुड का वो 'पठान' जिसने सबको डराया, रुलाया और हंसाया

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‘रॉबर्ट सेठ, पहचाना इस इकन्नी को ये वही इकन्नी है जिसे बरसों पहले उछालकर तुमने मेरा मजाक उड़ाया था। आज मैं तुम्हारी जगह पहुंच गया हूं, और तुम मेरे कदमों में’

‘इस इलाके में नए आए हो बरखुरदार, वर्ना यहां शेर खान को कौन नहीं जानता’। 

ऐसे न जाने कितने दमदार डायलॉग बोलने वाले सदी के खलनायक प्राण, जिनकी फिल्में देखकर लोग उनसे इतनी नफरत करते थे राह चलते उन्हें गालियां मिलती थी। आज कहानी बॉलीवुड के उस पठान की कहानी जो अपने दौर के सभी हीरो पर भारी पड़ जाया करते थे।

बॉलीवुड को 400 से भी ज्यादा फिल्मों का तोहफा देने वाले प्राण की जिंदगी में झांके तो ढेरों किस्से और कहानी नजर आएंगी। 12 फरवरी साल 1920 को एक सरकारी ठेकेदार लाला केवल कृष्ण सिंकद के घर दिल्ली में पैदा हुए प्राण ने एक प्राण ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था-

साल 1967 में रिलीज हुई फिल्म 'उपकार' से पहले सड़क पर मुझे देखकर लोग कहते 'अरे बदमाश', 'ओ लफंगे', 'ओ गुंडे' कहा करते थे। उन दिनों जब मैं परदे पर आता था तो बच्चे अपनी मां की गोद में दुबक जाया करते थे और मां की साड़ी में मुंह छुपा लेते।

उनके फिल्मों में आने का एक दिलचस्प किस्सा है। कि कैसे वे पान की दुकान से फिल्मी स्टूडियो तक जा पहुंचे। बंटवारे से पहले उन्होंने अपना करियर बतौर फोटोग्राफर शुरू किया था।

वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे बताते है कि

प्राण 12 साल की उम्र से ही सिगरेट पीने लगे थे। इसी कारण शहर की कई पान की दुकान वालों से उनकी पहचान-सी हो गई थी। पान वाला उनकी शक्ल देखते ही उनके ब्रांड की सिगरेट निकालकर सामने रख दिया करता था। ऐसे ही एक दिन जब वे सिगरेट पीने पान की दुकान पर गए तो वहां उन्हें स्क्रीनप्ले राइटर वली मोहम्मद वली मिले। वली मोहम्मद ने उनको देखा, तो ध्यान से घूरने लगे। वली मोहम्मद ने वहीं एक छोटे से कागज पर अपना पता लिखकर प्राण को दिया और मिलने को कहा। मगर प्राण ने वली मोहम्मद और उस कागज के टुकड़े को कोई भी तवज्जो नहीं दी। कुछ दिनों के बाद जब वली मोहम्मद प्राण से फिर टकराए तो उन्होंने प्राण को याद दिलाया। आखिर प्राण ने चिड़चिड़ा कर उनसे पूछ ही लिया कि वे क्यों उनसे मिलना चाहते हैं। जवाब में वली मोहम्मद ने फिल्म वाली बात बताई। दिलचस्प बात ये है, तब भी प्राण ने उनकी बात को ज्यादा गंभीरता से नहीं लियामगर मिलने को तैयार हो गए। आखिरकार, जब मुलाकात हुई तो वली मोहम्मद ने प्राण को राजी कर लिया। इस तरह प्राण पंजाबी में बनी अपने करियर की पहली फिल्म साल 1940 में रिलीज हुई यमला जट्ट में दिखे। इसके आठ साल बाद साल 1948 में देवानंद की फिल्म जिद्दी से उनका बालीवुड डेब्यू हुआ। 

वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे बताते हैं कि

प्राण साहब ने 40 के दशक के हीरो अशोक कुमार से लेकर 90 के दशक के हीरो सलमान खान तक के साथ काम किया है। वे  भारी पड़ जाया करते थे। वैसे कहने को तो प्राण विलेन का रोल करते थे लेकिन उनकी शख्सियत, ड्रेसिंग स्टाइल, डायलॉग डिलीवरी, सिगरेट पकड़ने का जुदा अंदाज ऐसा था कि वो बड़े-बड़े हीरो को टक्कर दे देते थे- फिर वो देवानंद हो, राजकपूर या फिर दिलीप कुमार। अपने समय की इस मशहूर त्रिमूर्ति के साथ प्राण ने साल 1958 में रिलीज हुई 'मधुमति' और साल 1967 में आई 'राम और श्याम' जैसी कई हिट फिल्में कीं। उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ दोस्त से लकर उनके पिता का भी रोल किया। बालीवुड में प्राण ही एक अकेले एक्टर थे कपूर खानदान की तीन पीढ़ी के साथ काम किया। चाहे वो शशी कपूर हो या फिर करिश्मा कपूर ।

वे एक ऐसे एक्टर थे जिनके चेहरे पर हमेशा भावनाओं का तूफान और आंखों में ही उनके रोल का कैरेक्टर नजर आता है जो अपने हर रोल को निभाते हुए ये अहसास करा जाता है कि उनके बिना ये किरदार अधूरा है।

बात चाहे साल साल 1960 में रिलीज हुई फिल्म 'जिस देश में गंगा बहती है' के 'डाकू राका' की हो या फिर साल 1967 में रिलीज हुई 'उपकार' के अपाहिज 'मलंग चाचा' का किरदार या फिर साल 1973 में रिलीज हुई 'जंजीर' में 'शेरखान' का पठान का रोल उनकी डायलाग डिलीवरी आज भी लोगों के जेहन में हैं।

दादा साहब फाल्के अवॉर्ड के साथ कई सारे सम्मान पाने वाले प्राण ने 12 जुलाई साल 2013 को दुनिया से अलविदा कह दिया। एक इंटरव्यू में प्राण से पूछा गया कि आप अगले जन्म में क्या बनना चाहते हैं? तो वे बोले - प्राण, प्राण और केवल प्राण।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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