बायकॉट अब बन रहा ट्रेंड, पीएम मोदी ने भी Reactions पर दे दी हिदायत

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बायकॉट बॉलीवुड, फ़िल्म या एक्टर के किसी चुनिंदा पक्ष पर बयान और फिर हंगामा। पिछले कुछ सालों में फ़िल्म रिलीज से पहले ये एक सेट पैटर्न बनता नज़र आ रहा है। ये ट्रेंड शायद आने वाले दिनों में मैनेजमेंट बुक्स में एनी पब्लिसिटी इज गुड पब्लिसिटी का उदाहरण हो। इसपर इतनी बात हुई कि अब देश के मुखिया पीएम मोदी को भी अप्रत्यक्ष तौर पर बेतुकी बयानबाजी न करने की हिदायत तक देनी पड़ी।

फ़िल्म के बायकॉट के लिए कभी किसी एक्टर की कही हुई पुरानी बात को निशाना बनाया गया, तो कभी फ़िल्म में दिखाई गई चीजों को भावनाओं को आहत पहुचाने वाला या आपत्तिजनक बनाता गया। पदमावत से लेकर लाल सिंह चड्डा तक कभी धार्मिकता पर सवाल तो कभी एक्टर तक सवाल के घेरे में रहे। हालांकि फिल्मों से कोई गलत संदेश न जाए, इसके सर्टिफिकेटशन के लिए देश में सेंसर बोर्ड है, लेकिन कई बार तो सेंसर बोर्ड भी निशाने पर होता है। बीते साल फिल्म काली के पोस्टर जिसमें देवी काली को सिगरेट पीते हुए दिखाया गया, इस पर सवाल उठे।

खैर, फिल्मों के बायकॉट पर बॉलीवुड से दो पक्ष सामने हैं। एक पक्ष कहता है कि बायकॉट से फिल्मों और डायरेक्टर्स को फायदा मिलता है। तो दूसरी ओर कई बार कई एक्टर्स ये भी कह चुके हैं कि आप किसी व्यक्ति विशेष को बायकॉट करने के चक्कर सब को सजा नहीं दे सकते हैं। फ़िल्म बनने में एक्टर-डायरेक्टर्स के अलावा, पर्दें के पीछे भी कई लोग होते हैं। एक फ़िल्म के बायकॉट होने पर कई लोगों को निराशा हासिल होती है। बार्डर फिल्म का रेफरेंस देते हुए फ़िल्म के एक्टर सुनील सेट्टी ने भी हाल में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी बॉलीवुड बायकॉट को लेकर बात की थी।

हालांकि बायकॉट पर राइटर्स-डायरेक्टर्स का एक पक्ष ये भी है कि हम अगर विवाद के डर से पर्दे पर चीजों को बैन या बायकॉट करने में ही लगे रहेगें। तो, कई बार सिनेमा से अच्छा विषय, देश में कहीं किसी सच्चाई को दिखाने की कोशिश या कई बेहेतरीन फिल्मों से दूर रह जाएंगे। हैसटैग बायकॉट की शुरुआत कहां से हुई, ये कहना तो मुमकिन मालूम नहीं पड़ता और ये भी नहीं कहा जा सकता कि ये कब थमेगा। हैसटैग बायकॉट पर वर्तमान परिप्क्षेय में जान एलिया की दो लाइंस याद हैं कि

सब दलीले तो मुझे याद रही

लेकिन बहस क्या थी मैं ये ही भूल गया

वैसे, दर्शको के पास अब वर्ल्ड सिनेमा के वाइड एक्सपीरीसंय से दूरी महज कुछ क्लीक्स पर होती है। ऐसे में साफ है कि दर्शक स्टोरी हो, एक्टिंग हो या वीएफएक्स बेहतर मापदंड में ही चाहते हैं। हर दूसरी फ़िल्म का बायकॉट होना क्या कोई स्ट्रेटेजी हैं, फ़िल्म के डायरेक्टर-एक्टर्स को इस विरोध का फायदा होता है या नुकसान। ज्यादातर चीजें कंटेंट पर आकर थमती हैं। अगर बायकॉट पर लोगों के रिएक्शन की बात करें तो मिले-जुले रिएक्शन होते हैं।

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